पुरानी दिल्ली में शिक्षा की नई रोशनी जगा रहे मकसूद

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 30-06-2026
Maqsood is bringing the new light of education to Old Delhi.
Maqsood is bringing the new light of education to Old Delhi.

 

आमना फारूकी | नई दिल्ली

पुरानी दिल्ली की तंग गलियों, ऐतिहासिक इमारतों और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत के बीच एक ऐसा नाम भी है, जिसने पिछले लगभग तीस वर्षों से शिक्षा, समाज सेवा और सांप्रदायिक सद्भाव को अपना जीवन समर्पित कर रखा है। यह नाम है मकसूद अहमद का। वे अल्लामा रफीक ट्रस्ट के संस्थापक हैं और आज हजारों लोगों के लिए उम्मीद, प्रेरणा और बदलाव का प्रतीक बन चुके हैं।

मकसूद अहमद की कहानी किसी बड़े कारोबारी घराने या प्रभावशाली परिवार से शुरू नहीं होती। उनका बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता। शुरुआती शिक्षा उन्होंने एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने एक मंदिर संचालित विद्यालय में पढ़ाई की। यही अनुभव उनके व्यक्तित्व को आकार देने वाला साबित हुआ।

पुरानी दिल्ली में शिक्षा का दीपक जलाना: मकसूद अहमद

वे बताते हैं कि उनका पूरा शैक्षणिक जीवन हिंदू शिक्षण संस्थानों में गुजरा। वहां उन्हें कभी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। प्रार्थना के समय मंदिर के पुजारी उन्हें सम्मानपूर्वक अपनी धार्मिक प्रार्थना करने की अनुमति देते थे। मकसूद अहमद मानते हैं कि यही भारत की गंगा जमुनी तहजीब की असली पहचान है। इसी माहौल ने उनके भीतर धार्मिक सहिष्णुता, सामाजिक सद्भाव और मानव सेवा की भावना को मजबूत किया।

साल 1996 में उन्होंने अल्लामा रफीक ट्रस्ट की स्थापना की। ट्रस्ट का नाम प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान और समाजसेवी अल्लामा रफीक के नाम पर रखा गया। संस्था की शुरुआत एक छोटे प्रयास के रूप में हुई थी, लेकिन इसका उद्देश्य बड़ा था। शिक्षा को बढ़ावा देना, समाज के कमजोर वर्गों को अवसर देना, न्याय और समानता की भावना को मजबूत करना तथा सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ाना इसका मुख्य लक्ष्य था।

शुरुआती दौर आसान नहीं था। पुरानी दिल्ली के कई इलाकों में शिक्षा को लेकर जागरूकता सीमित थी। लोगों को सामाजिक और शैक्षिक गतिविधियों के महत्व को समझाने में काफी समय लगा। कई बार विरोध भी झेलना पड़ा। संसाधनों की कमी भी एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन मकसूद अहमद ने हार नहीं मानी।

धीरे धीरे लोगों का भरोसा बढ़ा और संस्था का दायरा भी फैलता गया। आज अल्लामा रफीक ट्रस्ट शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

ट्रस्ट का सबसे प्रभावशाली काम कौशल विकास कार्यक्रमों को माना जाता है। यहां कंप्यूटर शिक्षा, अंग्रेजी बोलना सीखने के कोर्स, सिलाई प्रशिक्षण, मेहंदी कला, ब्यूटी एंड वेलनेस प्रशिक्षण और कई अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों का सबसे अधिक लाभ महिलाओं और युवाओं को मिला है।

मकसूद अहमद बताते हैं कि संस्था से प्रशिक्षण लेने वाली कई महिलाएं आज आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। वे एक महिला का उदाहरण देते हैं जिनके पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई थी। उस महिला ने ट्रस्ट में सिलाई का प्रशिक्षण लिया। आज वह अपने बच्चों की शिक्षा और परिवार का पूरा खर्च स्वयं उठा रही हैं। उन्हें किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती।

ऐसी कहानियां इस संस्था की सफलता को केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहने देतीं। यह बदलाव सीधे लोगों के जीवन में दिखाई देता है।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी ट्रस्ट महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। समय समय पर मुफ्त स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाते हैं। इनमें मरीजों की जांच, स्वास्थ्य परीक्षण और दवाओं की व्यवस्था की जाती है। कई प्रतिष्ठित अस्पताल और चिकित्सा संस्थान इन अभियानों में सहयोग करते हैं। इससे आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को बड़ी राहत मिलती है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी संस्था ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। यहां से पढ़कर निकले कई छात्र सरकारी विद्यालयों में शिक्षक बन चुके हैं। कुछ युवाओं ने फार्मेसी, चिकित्सा और अन्य पेशेवर क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है। हालांकि अभी तक कोई छात्र संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी में सफलता हासिल नहीं कर पाया है, लेकिन मकसूद अहमद को भरोसा है कि वह दिन भी दूर नहीं है।

उनका मानना है कि किसी भी समाज और राष्ट्र की प्रगति का सबसे मजबूत आधार शिक्षा होती है। वे युवाओं को शिकायत करने के बजाय जिम्मेदारी उठाने की सलाह देते हैं। उनके अनुसार कठिन मेहनत, सकारात्मक सोच और समाज के प्रति संवेदनशीलता ही सफलता की असली कुंजी है।

लेकिन मकसूद अहमद का सबसे बड़ा सपना अभी अधूरा है।वे पुरानी दिल्ली की बेटियों के लिए एक आधुनिक शिक्षण संस्थान स्थापित करना चाहते हैं। ऐसा संस्थान जहां केवल किताबों की पढ़ाई न हो, बल्कि व्यक्तित्व विकास, डिजिटल शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, नेतृत्व क्षमता और आत्मविश्वास पर भी समान रूप से ध्यान दिया जाए।

उनका कहना है कि पुरानी दिल्ली में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। जरूरत केवल अवसर और बेहतर शैक्षिक वातावरण की है। यदि लड़कियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक सुविधाएं और सुरक्षित माहौल मिले तो वे अपने परिवारों के साथ पूरे समाज का भविष्य बदल सकती हैं।

मकसूद अहमद इस परियोजना को सिर्फ एक स्कूल निर्माण योजना नहीं मानते। उनके लिए यह एक सामाजिक आंदोलन है। वे ऐसा भविष्य देखना चाहते हैं जहां आर्थिक कमजोरी किसी लड़की की शिक्षा में बाधा न बने। जहां पुरानी दिल्ली की गलियों से डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी और समाजसेवी निकलकर देश की प्रगति में योगदान दें।

वे यह भी मानते हैं कि शिक्षा सामाजिक दूरियों को कम करने का सबसे प्रभावी माध्यम है। जब बच्चे साथ पढ़ते हैं तो वे एक दूसरे को बेहतर समझते हैं। इससे समाज में विश्वास बढ़ता है और सांप्रदायिक सद्भाव मजबूत होता है।

करीब तीन दशक से शिक्षा और समाज सेवा में सक्रिय मकसूद अहमद आज भी उसी ऊर्जा के साथ काम कर रहे हैं। उनका विश्वास है कि जब एक बच्चा शिक्षित होता है तो पूरा परिवार बदलता है। और जब एक लड़की शिक्षित होती है तो आने वाली पूरी पीढ़ी बदल जाती है।

इसी विश्वास के साथ वे पुरानी दिल्ली में ज्ञान का दीप जलाए हुए हैं। उनकी उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में यह छोटा सा दीपक शिक्षा की बड़ी रोशनी बनकर हजारों घरों का भविष्य उज्ज्वल करेगा।शायद यही वजह है कि मकसूद अहमद का सपना केवल एक स्कूल बनाने का सपना नहीं है। यह एक बेहतर समाज, मजबूत राष्ट्र और शिक्षित भविष्य की परिकल्पना है।