खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होगा भारत, जानिए कौन संभालेगा कमान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 30-06-2026
India to attend Khamenei's funeral; find out who will take charge.
India to attend Khamenei's funeral; find out who will take charge.

 

आवाज द वाॅयस /नई दिल्ली

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को लेकर भारत का रुख पूरी तरह साफ हो गया है। बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि क्या भारत इस आयोजन में हिस्सा लेगा। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने खुद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस भावुक मौके पर शामिल होने का औपचारिक न्योता भेजा था। हालांकि अपनी पहले से तय अंतरराष्ट्रीय व्यस्तताओं के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कार्यक्रम में सीधे शामिल नहीं हो पा रहे हैं।

उनकी जगह भारत सरकार ने एक बेहद मजबूत और रणनीतिक संदेश देने वाला उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ईरान भेजने का फैसला किया है। इस प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सेवानिवृत्त सैयद अता हसनैन और केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा करेंगे। यह दल ४ जुलाई से तेहरान में शुरू होने वाले मुख्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेगा। यह पूरा आयोजन ९ जुलाई तक चलेगा और अंत में मश्हद में दफन प्रक्रिया के साथ संपन्न होगा।

भारत की नुमाइंदगी के पीछे की खास रणनीति

भारत ने इस बेहद संवेदनशील मौके के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव बहुत सोच-समझकर किया है। बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन भारतीय सेना के एक बेहद सम्मानित और अनुभवी पूर्व अधिकारी हैं। उन्हें मध्य पूर्व के मामलों और चरमपंथ विरोधी रणनीतियों का गहरा अनुभव है। इसके साथ ही वह देश के उन गिने-चुने शिया चेहरों में शामिल हैं जो वर्तमान में एक बड़े संवैधानिक पद पर बैठे हैं। ऐसे में ईरान जैसे शिया बहुल देश के लिए उनका चयन भारत की ओर से एक बड़ा सांस्कृतिक और कूटनीतिक सम्मान माना जा रहा है।

वहीं दूसरी तरफ विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा की मौजूदगी यह साफ करती है कि भारत सरकार ईरान के साथ अपने राजनायिक संबंधों को कितना महत्व देती है। इस प्रतिनिधिमंडल में विदेश मंत्रालय के कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल रहेंगे जो वहां मौजूद विभिन्न देशों के नेताओं के साथ अनौपचारिक चर्चा का हिस्सा बन सकते हैं। भारत का यह कदम साल २०२४ के उस फैसले की तरह ही है जब तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के निधन पर भारत ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को तेहरान भेजा था।

तेहरान से मश्हद तक छह दिनों का कार्यक्रम

अमेरिकी और इजरायली हवाई हमले में सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत के बाद पैदा हुए क्षेत्रीय तनाव के कारण यह अंतिम संस्कार मार्च महीने में नहीं हो सका था। युद्धविराम के बाद अब इसे आधिकारिक तौर पर आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम की शुरुआत ४ और ५ जुलाई को तेहरान के ग्रैंड मोसल्ला परिसर में होगी जहां उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। इसके बाद तेहरान और पवित्र शहर कोम में विशाल शोक जुलूस निकाले जाएंगे।

अंतिम संस्कार का मुख्य और आखिरी पड़ाव ९ जुलाई को मश्हद शहर में होगा। यहाँ इमाम रजा दरगाह परिसर में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। ईरान सरकार को उम्मीद है कि इस छह दिवसीय कार्यक्रम में देश-विदेश से लाखों की संख्या में लोग जुटेंगे। इस ऐतिहासिक विदाई में हिस्सा लेने के लिए इराक पाकिस्तान अफगानिस्तान रूस चीन और मध्य एशियाई देशों के कई बड़े प्रतिनिधिमंडल भी तेहरान पहुंच रहे हैं। ईरान इस मौके का इस्तेमाल अपनी राष्ट्रीय एकता और मजबूती को दुनिया के सामने दिखाने के लिए कर रहा है।

चाबहार और पुराने रिश्तों की नई इबारत

भारत और ईरान के संबंध सदियों पुराने और सांस्कृतिक रूप से बेहद गहरे हैं। ईरान ने कई मुश्किल मौकों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का साथ दिया है। मौजूदा समय में जब पश्चिम एशिया के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं तब भारत का यह कदम दूरगामी परिणाम ला सकता है। हाल के दिनों में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम करने के प्रयासों से वैश्विक बाजारों में उम्मीद जगी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले समय में ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील मिलती है तो भारत के लिए वहां से कच्चे तेल का आयात फिर से शुरू करना आसान हो जाएगा। इसके अलावा रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह के विकास कार्य को भी नई रफ्तार मिल सकती है। चाबहार पोर्ट के जरिए भारत मध्य एशिया और यूरोप तक अपनी सीधी पहुंच बनाना चाहता है। ऐसे में संकट के इस दौर में ईरान के साथ खड़े रहना भारत के आर्थिक और कूटनीतिक हितों के लिहाज से बेहद जरूरी है।

बदलती कूटनीति के बीच भारत का संतुलन

पश्चिम एशिया में इस समय संतुलन बनाना किसी भी देश के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। एक तरफ जहां भारत के संबंध इजरायल और अमेरिका के साथ काफी मजबूत हुए हैं वहीं दूसरी तरफ वह ईरान जैसे अपने पारंपरिक दोस्तों को भी नहीं छोड़ सकता। प्रधानमंत्री मोदी का सीधे न जाकर अपने एक केंद्रीय मंत्री और एक वरिष्ठ शिया राज्यपाल को भेजना इसी संतुलन को दर्शाता है। इससे भारत ने ईरान को सम्मान भी दे दिया और वैश्विक स्तर पर किसी विवाद का हिस्सा बनने से भी खुद को बचा लिया।

यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत अपने विस्तारित पड़ोस की नीति पर अडिग है। तेहरान की गलियों में होने वाली यह कूटनीतिक हलचल आने वाले दिनों में भारत की विदेश नीति को एक नई दिशा दे सकती है। पूरी दुनिया इस समय ईरान में जुटने वाले वैश्विक नेताओं के रुख और भारत की मौजूदगी के मायने तलाशने में जुटी है।