फौजिया दास्तांगो: पुरानी दिल्ली की बेटी, जिसने किस्सों को फिर से ज़िंदा कर दिया

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  onikamaheshwari | Date 30-06-2026
Fauzia Dastango: A daughter of Old Delhi who breathed new life into storytelling.
Fauzia Dastango: A daughter of Old Delhi who breathed new life into storytelling.

 

मलिक असगर हाशमी

पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में एक खास महक है। यहाँ कबाब की खुशबू और उर्दू के अल्फाजों की खनक हवा में घुली रहती है। इन्हीं गलियों के बीच जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर कभी किस्सागोई की महफिलें जमती थीं। वक्त बदला और ये महफिलें खामोश हो गईं। लेकिन आज उसी खामोशी को अपनी आवाज से तोड़ने वाली एक शख्सियत का नाम है फौजिया दास्तानगो। वे न सिर्फ भारत की पहली महिला दास्तानगो हैं, बल्कि उस सदियों पुरानी कला की मशालची भी हैं जिसे कभी पुरुषों का एकाधिकार माना जाता था।

तकदीर का खूबसूरत इत्तेफाक

फौजिया का जन्म पुरानी दिल्ली के पहाड़ी भोजला इलाके में हुआ। यह महज इत्तेफाक नहीं था। यह वही मोहल्ला है जहाँ दास्तानगोई परंपरा के आखिरी चिराग मीर बाकर अली रहते थे। फौजिया जब अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से पुरानी दिल्ली की धूप को निहारती हैं, तो उन्हें लगता है कि उनका इस कला से जुड़ना खुदा का फैसला था। वे कहती हैं कि उनकी जड़ें उसी मिट्टी में हैं जहाँ इस कला ने दम तोड़ा था, और शायद इसीलिए इसे दोबारा जिंदा करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं के हिस्से आई।

उनका बचपन कहानियों के साये में बीता। पिता मोटरबाइक मैकेनिक थे। वे घर पर जो भी किताबें लाते, नन्ही फौजिया उन्हें चाट जाती थीं। मां जब उर्दू की क्लासिक कहानियां सुनातीं, तो वे घंटों मंत्रमुग्ध होकर सुनती रहतीं। इतवार के दिन मां के साथ किताबों के बाजार जाना और नंदन, चंपा और खिलौना जैसी पत्रिकाएं खरीदना उनका सबसे पसंदीदा शौक था। स्कूल में वे वही कहानियां अपने दोस्तों को सुनाती थीं। उनके दोस्त उनकी शैली के कायल थे। वे अक्सर कहते थे कि फौजिया जब सुनाती है, तो कहानी आँखों के सामने तैरने लगती है।

एक मोड़ जिसने जिंदगी बदल दी

फौजिया का सफर सीधा नहीं था। उन्होंने पहले शिक्षा के क्षेत्र में अपना करियर बनाया। वे एससीईआरटी (SCERT) में लेक्चरर के पद पर तैनात थीं। लेकिन कला के प्रति उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ। साल 2006में एक घटना ने उनकी जिंदगी का रुख मोड़ दिया। वे दयाल सिंह कॉलेज में एक दास्तानगोई परफॉर्मेंस देखने गईं। वहां दानिश हुसैन और महमूद फारूकी मंच पर थे। उस एक शाम ने फौजिया के भीतर सोई हुई कलाकार को जगा दिया। उन्हें लगा कि यही वह काम है जिसके लिए वे बनी हैं।

उन्होंने अपनी पक्की सरकारी नौकरी छोड़ दी। यह एक जोखिम भरा फैसला था, लेकिन उनका जुनून बड़ा था। उन्होंने दानिश और महमूद को अपना उस्ताद माना और इस बारीकी को सीखना शुरू किया। दास्तानगोई महज कहानी सुनाना नहीं है। यह शब्दों, लहजे, शारीरिक भाषा और भावनाओं का एक जटिल मेल है। इसमें कलाकार को घंटों एक ही जगह बैठकर केवल अपनी आवाज और हाथों के इशारों से पूरी कायनात रचनी होती है।

चुनौतियों का पहाड़ और जीत का जज्बा

एक महिला के लिए इस क्षेत्र में आना आसान नहीं था। दास्तानगोई 16वीं सदी की कला है जो मुगल दरबारों में फली-फूली। इसमें हमेशा पुरुषों का बोलबाला रहा। समाज की नजर में एक औरत का मंच पर बैठकर ऊंचे स्वर में बोलना या भाव-भंगिमाएं बनाना 'अजीब' था। फौजिया को शुरुआत में आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। लोग उनकी महफिलों में नहीं आते थे। कई बार उन्हें हतोत्साहित किया गया।

लेकिन फौजिया ने हार नहीं मानी। वे कहती हैं कि महिलाएं स्वभाव से ही बेहतरीन कहानीकार होती हैं। हमारी दादी-नानी ने सदियों से घरों के आंगनों में बैठकर हमें किस्से सुनाए हैं। उन्होंने बस उस घरेलू हुनर को मंच तक पहुँचाया। उन्होंने पुरुषों के इस गढ़ में अपनी जगह बनाई और यह साबित किया कि कला का कोई लिंग नहीं होता। वे एक शो की तैयारी के लिए महीनों मेहनत करती हैं। उनकी कहानियों में सिर्फ राजा-रानी नहीं होते। वे आम इंसान, उनकी छोटी-छोटी खुशियां और उनके संघर्षों को अपनी दास्तानों का हिस्सा बनाती हैं।

पुरानी दिल्ली की रूह और 'जुबान-ए-दिल्ली'

फौजिया की कला में पुरानी दिल्ली की रूह बसती है। वे जब बोलती हैं, तो उसमें 'कारखाने की जुबान' का पुट होता है। यह वह भाषा है जो शाहजहानाबाद के कारीगर, कसाई और आम लोग बोलते हैं। इसमें एक खास लय है, एक संगीत है। वे जब 'घुम्मी कबाब' जैसी कहानियां सुनाती हैं, तो सुनने वालों को गलियों की चहल-पहल और कबाब की दुकान पर होने वाली नोक-झोंक महसूस होने लगती है।

उनके लिए पुरानी दिल्ली सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती तहजीब है। वे आज भी रोशनपुरा की संकरी गलियों और पुराने मकानों के आंगनों में सुकून तलाशती हैं। उनका मानना है कि आज के दौर में लोग एक-दूसरे को सुनना भूल गए हैं। लोग सोशल मीडिया और गैजेट्स में खोए हैं। ऐसे में दास्तानगोई लोगों को वापस जोड़ने का काम करती है। यह इंसान होने के उस बुनियादी अहसास को जगाती है जिसमें हम दूसरों की तकलीफ और खुशी को महसूस कर पाते हैं।

उपलब्धियों का आसमान

आज फौजिया दास्तानगो एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी हैं। वे देश-विदेश में 400से ज्यादा शो कर चुकी हैं। उन्होंने सिर्फ पुरानी दास्तानों को ही नहीं सुनाया, बल्कि आधुनिक विषयों पर भी काम किया। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य, सांप्रदायिक सौहार्द और नारीवाद जैसे गंभीर मुद्दों को अपनी दास्तानगोई में पिरोया है। उनकी इस मेहनत को सरकार ने भी सराहा। साल 2018में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने उन्हें "भारत की पहली महिला दास्तानगो" के रूप में सम्मानित किया। उन्हें 'फर्स्ट लेडीज' के उस चुनिंदा समूह में शामिल किया गया जिन्होंने अपने क्षेत्र में मील का पत्थर गाड़ा है।

इसके अलावा उन्हें टैगोर वेटरन आर्टिस्ट अवार्ड और कर्मवीर चक्र जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिले हैं। लेकिन फौजिया के लिए सबसे बड़ा सम्मान उनके दर्शकों की आँखों में चमक और उनकी तालियां हैं। वे आज जामिया मिलिया इस्लामिया और अशोका यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों में नई पीढ़ी को यह कला सिखा रही हैं। वे चाहती हैं कि यह विरासत कभी खत्म न हो।

विरासत को बचाने की जंग

फौजिया आज भी अकेली हैं। उन्होंने शादी नहीं की और अपनी पूरी जिंदगी इस कला को समर्पित कर दी। वे कहती हैं कि आज की संस्कृति सिर्फ स्मारकों की सैर या महंगी पेंटिंग्स तक सिमट गई है। लेकिन असली संस्कृति तो लोगों की बोलियों और उनके जीने के तरीके में है। अगर हमने अपनी भाषा और किस्से खो दिए, तो हमारी पहचान भी खत्म हो जाएगी। वे अक्सर जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठती हैं, जहाँ से कभी यह सफर शुरू हुआ था। वहां की भीड़, वहां का शोर उन्हें परेशान नहीं करता। उन्हें वहां भी कहानियां सुनाई देती हैं। वे चाहती हैं कि हर घर में, हर आंगन में फिर से किस्से गूंजें। फौजिया की दास्तानगोई सिर्फ एक परफॉर्मेंस नहीं है, बल्कि यह उस मरती हुई सभ्यता को बचाने की एक जिद है।

उनकी कहानी हर उस महिला के लिए प्रेरणा है जो समाज की बेड़ियों को तोड़कर अपनी पसंद का रास्ता चुनना चाहती है। फौजिया ने साबित कर दिया कि अगर आवाज में सच्चाई हो और दिल में जुनून, तो दुनिया की कोई भी दीवार आपको अपनी दास्तान कहने से नहीं रोक सकती। आज जब वे मंच पर सफेद लिबास पहनकर बैठती हैं और अपनी बात शुरू करती हैं, तो वक्त ठहर जाता है। लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनते हैं, क्योंकि वे सिर्फ एक कहानी नहीं सुन रहे होते, बल्कि वे अपने ही इतिहास और संस्कृति से रूबरू हो रहे होते हैं। फौजिया का सफर जारी है, और उनकी दास्तान अभी बहुत लंबी है।