हेल्पर से संत कबीर राज्य पुरस्कार तक: चोलापुर के बुनकर जमालुद्दीन ने बढ़ाया वाराणसी का मान

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 07-08-2026
From Helper to Sant Kabir State Award: Cholapur Weaver Jamaluddin Brings Honor to Varanasi
From Helper to Sant Kabir State Award: Cholapur Weaver Jamaluddin Brings Honor to Varanasi

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली 
 
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर देश अपनी समृद्ध हथकरघा विरासत और लाखों बुनकरों के योगदान को याद कर रहा है। ऐसे में वाराणसी के चोलापुर निवासी प्रसिद्ध हथकरघा बुनकर जमालुद्दीन की सफलता की कहानी इस परंपरा को नई पहचान दे रही है। उत्कृष्ट जामदानी एवं रंगकट साड़ी निर्माण के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार के संत कबीर राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राजधानी लखनऊ में आयोजित समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें सम्मानित किया। इस अवसर पर उन्हें एक लाख रुपये की पुरस्कार राशि भी प्रदान की गई। 

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बनारस की हथकरघा परंपरा की विरासत

वाराणसी का हथकरघा उद्योग भारत की सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित शिल्प परंपराओं में से एक माना जाता है। मुगल काल से विकसित हुई बनारसी साड़ी अपनी बारीक जरी, जामदानी, कटवर्क, तंचोई और रंगकट जैसी जटिल बुनाई तकनीकों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। हजारों बुनकर परिवार पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। बनारसी साड़ी को जीआई (Geographical Indication) टैग मिलने के बाद इसकी वैश्विक पहचान और मजबूत हुई है। बावजूद इसके, मशीन निर्मित कपड़ों और बदलते बाजार के कारण हथकरघा उद्योग कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में पारंपरिक तकनीकों को संरक्षित करने वाले बुनकर इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
 
90 दिन में तैयार होती है विशेष साड़ी

जमालुद्दीन, पुत्र मोहम्मद इस्लाम, वर्षों से व्यक्तिगत हथकरघा बुनकर के रूप में कार्य कर रहे हैं। उन्होंने पुरस्कार के लिए जामदानी जंगल रंगकट साड़ी प्रस्तुत की, जिसे तैयार करने में लगभग 90 दिन का समय लगता है। इस साड़ी में रियल जरी, कोरा ताना, कॉटन बाना और पारंपरिक रंगकट तकनीक का प्रयोग किया गया है। साड़ी की लंबाई 5.65 मीटर तथा ब्लाउज पीस 122 सेंटीमीटर का है। इसकी अनुमानित कीमत 1.80 लाख रुपये है।
 
 
हेल्पर से पुरस्कार विजेता बनने तक का सफर

जमालुद्दीन की सफलता संघर्ष और समर्पण की मिसाल है। उन्होंने महज 14 वर्ष की उम्र में अपने पिता मोहम्मद इस्लाम के साथ काम शुरू किया और अपने ही कारखाने में हेल्पर के रूप में बुनाई की बारीकियां सीखीं। लगातार मेहनत और नवाचार के बल पर उन्होंने अपनी पहचान बनाई। वर्ष 2009 में उन्हें उनकी उत्कृष्ट हस्तशिल्प कला के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
 
आज उनके पास कई हैंडलूम हैं, जिन पर करीब 30 कारीगर कार्य करते हैं। उनका परिवार भी इस पुश्तैनी व्यवसाय को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
 
विदेशों तक पहुंचाने का सपना

पुरस्कार प्राप्त करने के बाद जमालुद्दीन ने कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि वाराणसी के सभी बुनकरों का सम्मान है। उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य बनारसी हथकरघा और हस्तशिल्प को अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान दिलाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस विरासत को गर्व के साथ आगे बढ़ा सकें।
 
जमालुद्दीन की उपलब्धि यह संदेश देती है कि परंपरागत कला, मेहनत और नवाचार के मेल से न केवल व्यक्तिगत सफलता हासिल की जा सकती है, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को भी नई पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचाया जा सकता है।