शाह-ए-हमदान की निशानी, अब फिर सजेगी त्राल की खानकाह

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 06-08-2026
A legacy of Shah-e-Hamdan: The Khanqah of Tral set to be adorned once again.
A legacy of Shah-e-Hamdan: The Khanqah of Tral set to be adorned once again.

 

एहसान फाजिली/श्रीनगर

दक्खिनी कश्मीर के पुलवामा जिले में स्थित त्राल कस्बा सूफी साधना का प्रमुख केंद्र है। श्रीनगर से लगभग 45 किलोमीटर दूर बसा यह शहर अपनी रूहानी आबोहवा के लिए जाना जाता है। त्राल शहर के ठीक बीचोंबीच खानकाह ए फैज पनाह स्थित है। यह इबादतगाह कश्मीर घाटी की सबसे प्रमुख और ऐतिहासिक खानकाहों में गिनी जाती है। यह खानकाह प्रसिद्ध सूफी संत मीर सैय्यद अली हमदानी को समर्पित है। लोग उन्हें शाह ए हमदान के नाम से भी जानते हैं।

कश्मीर से लेकर काशगर तक शाह ए हमदान ने अपने बेटे मीर मोहम्मद हमदानी के सहयोग से कुल 51 खानकाह बनवाई थीं। त्राल की यह खानकाह भी उन्हीं 51 महत्वपूर्ण इबादतगाहों में शामिल है। इसके अलावा कश्मीर घाटी में मीर मोहम्मद हमदानी की निगरानी में 16 खानकाहें बनाई गई थीं। इनमें से कई इमारतों का निर्माण शाह ए हमदान के विसाल के बाद पूरा हुआ था।

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खानकाह ए फैज पनाह त्राल का इतिहास सदियों पुराना है। इस ऐतिहासिक ढांचे का निर्माण सुल्तान सिकंदर के शासनकाल में हुआ था। दुर्भाग्य से 16 दिसंबर 1997 को एक रहस्यमयी अग्निकांड में यह बहुमूल्य लकड़ी की इमारत जलकर राख हो गई थी।

इस दुखद हादसे के बाद से ही इसके पुनर्निर्माण की कोशिशें जारी हैं। पिछले लगभग तीन दशकों में इस काम में कई तरह की रुकावटें आईं। बजट की कमी और प्रशासनिक ढिलाई के कारण निर्माण कार्य काफी लंबे समय तक अटका रहा।

अब इसका पुनर्निर्माण अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड की अध्यक्ष डॉ सैयद दरख्शां अंद्राबी के अनुसार बोर्ड ने साल 2025 में इस काम को तेज गति से आगे बढ़ाया है।

निर्माण और सौंदर्यीकरण का काम इस साल सितंबर तक पूरा होने की उम्मीद जताई गई है। इससे पहले इस परियोजना की जिम्मेदारी जम्मू कश्मीर पर्यटन विभाग के पास थी। इसका निष्पादन जम्मू कश्मीर प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन यानी जेकेपीसीसी कर रहा था। फंड की कमी के कारण योजना बार बार अटकती रही। अब वक्फ बोर्ड इसे अंतिम रूप देने में जुटा है।

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1997 के विनाशकारी अग्निकांड के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था कभी कम नहीं हुई। हर दिन सैकड़ों की संख्या में अकीदतमंद यहां दुआ मांगने आते हैं। सालाना उर्स और अन्य धार्मिक अवसरों पर तो यहां हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है। लोग महान सूफी संत का आशीर्वाद लेने दूर दूर से पहुंचते हैं।

त्राल के स्थानीय इतिहासकार और लेखक डॉ निसार अहमद भट ने अपनी पुस्तक आइना ए त्राल में इस स्थान का विस्तृत वर्णन किया है। इस किताब में त्राल के भूगोल, इतिहास और प्रमुख हस्तियों का प्रामाणिक ब्योरा दिया गया है। डॉ निसार के अनुसार इस खानकाह में सालाना उर्स जिल हिज्जा महीने की 6 तारीख को मनाया जाता है।

श्रीनगर की प्रसिद्ध खानकाह ए मोअल्ला में उर्स का आयोजन जिल हिज्जा के शुरुआती छह दिनों तक चलता है। वहीं त्राल में मुख्य कार्यक्रम 6 जिल हिज्जा को ही केंद्रित रहता है। श्रीनगर की खानकाह ए मोअल्ला के बाद त्राल की यह इमारत इकलौती ऐसी पवित्र जगह है, जहां शाह ए हमदान का तबर्रुक यानी पवित्र अवशेष मौजूद है। यहां संत की मुबारक छड़ी यानी असा ए शरीफ रखी गई है। इस मुकद्दस छड़ी को उर्स के विशेष अवसर पर ही श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है।

डॉ निसार अहमद भट के अनुसार कश्मीर की ज्यादातर पुरानी खानकाहें या तो आग की भेंट चढ़ गईं या फिर समय के साथ जर्जर हो गईं। त्राल की खानकाह ए फैज पनाह भी 16 दिसंबर 1997 की दुखद रात को आग की लपटों में समा गई थी।

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि शाह ए हमदान ने कश्मीर की अपनी तीसरी और अंतिम यात्रा के दौरान त्राल के कौसरबल इलाके में कुछ समय बिताया था। यह यात्रा 1383 से 1384 ईस्वी के दौरान हुई थी और वह लगभग छह महीने ही कश्मीर में रहे थे। कौसरबल में जहां उन्होंने विश्राम किया था, वह जगह आज मीर मोहम्मद हमदानी की जियारत के नाम से जानी जाती है।

कौसरबल में स्थान काफी छोटा था। वहां नए धर्मांतरित लोगों को धार्मिक शिक्षा देने के लिए जगह कम पड़ने लगी। इसके बाद एक बड़े स्थान की तलाश शुरू हुई। खोज के बाद वही जगह चुनी गई, जहां आज वर्तमान खानकाह स्थित है। सुल्तान सिकंदर ने खानकाह के निर्माण में पूरा सहयोग दिया। उन्होंने कारीगरों और मजदूरों के लिए सभी तरह के रसद की व्यवस्था कराई।

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यह पूरा निर्माण कार्य मीर मोहम्मद हमदानी की सीधी देखरेख में संपन्न हुआ। इसका निर्माण कार्य 880 हिजरी में पूरा हुआ था। इस खानकाह को श्रीनगर की खानकाह ए मोअल्ला की तर्ज पर ही बनाया गया था। इसकी नींव बेहद मजबूत थी। पूरी इमारत मुख्य रूप से देवदार की लकड़ी और नक्काशीदार लकड़ी के लट्ठों से बनाई गई थी। इसमें मिट्टी, चूने और ईंटों का इस्तेमाल नाममात्र के लिए हुआ था।

देवदार की लकड़ी की सिल्लियों को आपस में इस तरह जोड़ा गया था कि उसमें कोई जोड़ नजर नहीं आता था। लकड़ी पर की गई खूबसूरत नक्काशी इसे बेहद आकर्षक रूप देती थी। मूल संरचना का आकार 40 गुना 60 फीट था।

इसके बीचोंबीच चार बड़े लकड़ी के खंभे थे। इसके अलावा इसमें 12 छोटी चिल्ला कोठरियां भी बनाई गई थीं। रमजान के महीने में एतिकाफ यानी एकांत इबादत के लिए इन कोठरियों का इस्तेमाल किया जाता था।

पुरानी इमारत की छत दो सौ साल से भी ज्यादा पुरानी मानी जाती थी। इसकी छत पर पारंपरिक बर्ज़ा पाश यानी भोजपत्र की परत चढ़ाई गई थी। भोजपत्र के ऊपर मिट्टी की मोटी तह बिछाई जाती थी, जिस पर प्राकृतिक रूप से सुंदर फूल खिलते थे।

यह कश्मीर की पार पारंपरिक वास्तुकला का बेजोड़ नमूना था। साल 1953 में जम्मू कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद के कार्यकाल के दौरान इस छत को बदल दिया गया। भोजपत्र की जगह टीन की छत लगाई गई और बीच में एक गोल गुंबदनुमा मीनार बनाई गई।

आग में जलने के बाद अब जो नई इमारत बनकर तैयार हो रही है, वह तीन मंजिला है। इसकी वास्तुकला में आधुनिकता और परंपरा का संगम देखा जा सकता है। भूतल यानी ग्राउंड फ्लोर पर एक समय में एक हजार से अधिक श्रद्धालुओं के बैठने की क्षमता है। दूसरी मंजिल पर तीन तरफ बालकनीनुमा खुला गलियारा रखा गया है, जबकि बीच का हिस्सा नीचे की तरफ खुला रहता है। सबसे ऊपरी मंजिल पर पूरा हॉल बनाया गया है।

पुरानी इमारत की तरह नई संरचना में रमजान के लिए अलग से चिल्ला कोठरियां नहीं बनाई गई हैं। परिसर के सेवादार बताते हैं कि नए नक्शे में विशालता पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। मुख्य प्रवेश द्वार के ठीक सामने एक विशेष कक्ष बनाया गया है। इस कक्ष को हुजरा ए खास कहा जाता है। यहां पुरुष और महिला श्रद्धालु पंक्तिबद्ध होकर प्रार्थना करते हैं।

हुजरा ए खास बेहद सुरक्षित कांच और मजबूत दीवारों से घिरा है। इसी कक्ष के भीतर कपड़े में लिपटा हुआ मुकद्दस असा ए शरीफ रखा गया है। कक्ष की सामने वाली दीवार पर सूफी संत द्वारा रचित प्रसिद्ध दुआ औराद ए फतहिया अंकित की गई है। श्रद्धालु दीवार पर लिखे इन पवित्र छंदों को देखकर इबादत करते हैं।

खानकाह में मौजूद असा ए शरीफ यानी पवित्र लाठी पिछले पांच दशकों से भी ज्यादा समय से यहीं सुरक्षित है। इससे पहले यह मुकद्दस अवशेष कार परिवार की कस्टडी में था। कार परिवार के पूर्वज क्रिशन कार थे, जिन्होंने शाह ए हमदान के हाथों प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार किया था।

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क्रिशन कार के वंशज ही पीढ़ी दर पीढ़ी इस अवशेष की देखभाल करते आ रहे थे। लगभग पचास साल पहले कार परिवार ने इस पवित्र छड़ी को आधिकारिक रूप से खानकाह की प्रबंध समिति के सुपुर्द कर दिया था।

त्राल की खानकाह ए फैज पनाह सिर्फ एक इमारत नहीं है। यह दक्खिनी कश्मीर की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक पहचान का मुख्य आधार है। अग्निकांड के इतने सालों बाद भी लोगों का जुड़ाव कम नहीं हुआ है।

पुनर्निर्माण कार्य पूरा होने से न सिर्फ श्रद्धालुओं को सहूलियत मिलेगी, बल्कि सूफी वास्तुकला का यह ऐतिहासिक प्रतीक एक बार फिर अपने पुराने वैभव के साथ चमक उठेगा। वक्फ बोर्ड की नई पहल से स्थानीय लोगों में काफी उम्मीद जगी है कि जल्द ही खानकाह अपने पूरे शबाब के साथ अकीदतमंदों के लिए खोल दी जाएगी।