चंडीगढ़ की नीरजा भनोट से मुंबई के स्मित मच्छर तक: 40 साल, दो हवाई हमले और दो साहसी चेहरे

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 01-10-2026
From Chandigarh’s Neerja Bhanot to Mumbai’s Smit Machhar: 40 years, two aerial attacks, and two courageous faces.
From Chandigarh’s Neerja Bhanot to Mumbai’s Smit Machhar: 40 years, two aerial attacks, and two courageous faces.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

चार दशक का फासला। दो अलग दौर। दो अलग विमानन घटनाएं। लेकिन दोनों घटनाओं के बीच एक ऐसी समानता है, जो 40 साल बाद भी लोगों को जोड़ती है—मुश्किल की घड़ी में अपनी जान की परवाह किए बिना यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना। 1986 में चंडीगढ़ की नीरजा भनोट ने कराची में अपहृत विमान में यात्रियों की जान बचाने के लिए असाधारण साहस दिखाया था। 2026 में मुंबई के कैप्टन स्मित मच्छर ने दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान में कॉकपिट के भीतर हुई गंभीर घटना के दौरान घायल होने के बावजूद विमान का दरवाजा खोलने में मदद की, जिससे यात्रियों और चालक दल को हस्तक्षेप करने का मौका मिला। दोनों घटनाओं का संदर्भ और परिस्थितियां अलग हैं, लेकिन दोनों में विमानन पेशेवरों के सामने एक ऐसा क्षण आया, जब कुछ सेकंड के फैसले सैकड़ों लोगों की जिंदगी पर असर डाल सकते थे।
 
1986 में पैन एम की फ्लाइट 73 कराची में एक भयावह अपहरण की घटना का सामना कर रही थी। नीरजा भनोट इस विमान में वरिष्ठ फ्लाइट अटेंडेंट थीं। जब हथियारबंद अपहरणकर्ताओं ने विमान पर कब्जा कर लिया, तब उन्होंने यात्रियों को सुरक्षित रखने और स्थिति को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विमान में बड़ी संख्या में यात्री सवार थे और हालात लगातार तनावपूर्ण होते जा रहे थे। अपहरण के दौरान नीरजा ने अपनी ड्यूटी को केवल एक औपचारिक जिम्मेदारी की तरह नहीं देखा, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उन्होंने यात्रियों को आपातकालीन स्थिति में मदद पहुंचाई और कई लोगों को विमान से बाहर निकलने में सहायता की।
 
घटना के अंतिम चरण में अपहरणकर्ताओं ने यात्रियों को निशाना बनाना शुरू किया। नीरजा ने खतरे के बावजूद यात्रियों की मदद जारी रखी। उन्होंने विमान के आपातकालीन निकास खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे कई यात्रियों को विमान से बाहर निकलने का रास्ता मिला। इसी दौरान उन्होंने तीन बच्चों को गोलियों से बचाने की कोशिश की और खुद भी हमले की चपेट में आ गईं। नीरजा भनोट की मृत्यु 22 वर्ष की उम्र में हुई, लेकिन उनके साहस और कर्तव्यनिष्ठा की कहानी भारतीय विमानन इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।
 
चार दशक बाद, 2026 में फ्लाईदुबई की उड़ान FZ1073 में एक अलग तरह का संकट सामने आया। दुबई से तेल अवीव जा रही इस उड़ान के कॉकपिट में दोनों पायलटों के बीच कथित तौर पर हिंसक झड़प हुई। इस दौरान भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद विमान को सऊदी अरब के तबुक की ओर मोड़ दिया गया और वह वहां सुरक्षित उतरा।
 
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद कैप्टन मच्छर ने कॉकपिट का दरवाजा खोलने में सफलता हासिल की। इससे यात्रियों और चालक दल के अन्य सदस्यों को कॉकपिट में पहुंचने और स्थिति को नियंत्रित करने का अवसर मिला। घटना के दौरान विमान में मौजूद लोगों ने मिलकर हमलावर को काबू करने और विमान को स्थिर करने में मदद की। बाद में यात्रियों को दूसरे विमान से तेल अवीव भेजा गया।
 
कैप्टन मच्छर की भूमिका की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई भारतीय और विदेशी नेताओं ने सराहना की है। प्रधानमंत्री ने उन्हें 'हीरो' बताते हुए कहा कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने दूसरों की जान बचाने के लिए असाधारण साहस और दृढ़ संकल्प दिखाया। मच्छर के पूर्व नियोक्ता स्पाइसजेट के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक अजय सिंह ने भी कहा कि घायल होने के बाद कॉकपिट का दरवाजा खोलना बेहद साहसिक कदम था और इससे यात्रियों को बचाने में मदद मिली।
 
हालांकि, 2026 की घटना को लेकर जांच अभी जारी है और इसके पीछे की पूरी परिस्थितियां आधिकारिक जांच के बाद ही स्पष्ट होंगी। फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स के अध्यक्ष कैप्टन सी.एस. रंधावा ने इसे कॉकपिट रिसोर्स मैनेजमेंट की गंभीर विफलता बताया है और दोनों पायलटों के बीच झड़प की परिस्थितियों की जांच की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि विमान को वास्तव में किस पायलट ने उतारा, यह जांच के बाद स्पष्ट होगा।
 
इन दोनों घटनाओं को चार दशक के अंतराल के बावजूद एक साथ देखने पर विमानन पेशेवरों की जिम्मेदारी का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। नीरजा भनोट के सामने हथियारबंद अपहरणकर्ताओं का खतरा था, जबकि स्मित मच्छर के सामने कॉकपिट के भीतर अचानक पैदा हुई गंभीर स्थिति थी। नीरजा ने यात्रियों को सुरक्षित निकालने में मदद की और अपनी जान गंवाई। मच्छर गंभीर रूप से घायल हुए, लेकिन संकट के बीच ऐसी कार्रवाई की जिससे अन्य लोगों को कॉकपिट तक पहुंचकर स्थिति संभालने का अवसर मिला।
 
दोनों घटनाओं के बीच एक और महत्वपूर्ण अंतर है। नीरजा भनोट की घटना का अंत जानलेवा अपहरण और गोलीबारी में हुआ, जबकि फ्लाईदुबई की घटना में विमान सुरक्षित रूप से सऊदी अरब में उतर गया। 1986 की घटना के बाद नीरजा को मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक वीरता सम्मान अशोक चक्र प्रदान किया गया। 2026 की फ्लाईदुबई घटना में अभी जांच जारी है और घटना से जुड़े सभी तथ्यों का आधिकारिक निष्कर्ष सामने आना बाकी है।
 
फिर भी, चार दशक के अंतराल में सामने आई ये दोनों कहानियां विमानन में 'ड्यूटी' शब्द के अर्थ को अलग-अलग परिस्थितियों में सामने रखती हैं। विमान में मौजूद यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल तकनीक, प्रक्रियाओं और नियमों पर निर्भर नहीं करती; संकट के क्षण में इंसानी निर्णय और साहस भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। नीरजा भनोट ने 1986 में यह मिसाल कायम की थी और 2026 में कैप्टन स्मित मच्छर की घटना ने एक बार फिर इस सवाल को सामने ला दिया कि जब आसमान में कुछ ही सेकंड में सब कुछ बदल जाए, तब एक विमानन पेशेवर का निर्णय कितनी जिंदगियों पर असर डाल सकता है।
 
चंडीगढ़ की नीरजा भनोट और मुंबई के स्मित मच्छर की घटनाओं के बीच 40 साल का अंतर जरूर है, लेकिन दोनों मामलों में एक बात समान दिखाई देती है—यात्रियों की सुरक्षा को अपनी सुरक्षा से ऊपर रखना। यही वह पहलू है, जो इन दोनों विमानन पेशेवरों की कहानियों को अलग-अलग दौर से निकलकर एक साझा मानवीय कहानी में जोड़ता है।