नई दिल्ली
जमीयत उलमा-ए-हिंद के केंद्रीय निर्देशानुसार, जमीयत उलमा दिल्ली की मजलिस-ए-इंतजामिया (कार्यकारिणी) की पहली बैठक और एक दिवसीय प्रशिक्षण सभा का आयोजन आज राजधानी दिल्ली के मस्जिद झील पियाऊ, आईटीओ में संपन्न हुआ। इस महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता जमीयत उलमा दिल्ली के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद मुस्लिम क़ासमी ने की, जिसकी शुरुआत कुरआन-ए-पाक की तिलावत से हुई।
बैठक में दिल्ली की विभिन्न जिला इकाइयों के अध्यक्षों और पदाधिकारियों ने भाग लिया और अपनी-अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। मौलाना मुस्लिम क़ासमी ने अपने संबोधन में कार्यकारिणी के सभी सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जमीयत के मंच से काम करना खुदा की एक बड़ी नेअमत और सौभाग्य की बात है। उन्होंने सभी सदस्यों से अपील की कि वे निय्यत में खलूस और ईमानदारी रखते हुए जमीयत के मिशन को पूरी ताक़त और निष्ठा के साथ आगे बढ़ाएं।
कार्यक्रम का सबसे अहम हिस्सा रहा मौलाना सैयद अज़हर मदनी (नाज़िम इस्लाहे मआशरा, जमीयत उलमा-ए-हिंद) का प्रेरणादायक भाषण, जिसमें उन्होंने समाज सुधार की आवश्यकता को मौजूदा दौर की सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह समय केवल जोश से नहीं, बल्कि होश से काम करने का है। "फितनों से भरे इस दौर में हालात का बारीकी से जायज़ा लेकर, जमीयत के नज़रिया और तरीक़े के मुताबिक समाज सुधार का कार्य पूरे राज्य में प्राथमिकता के तौर पर किया जाना चाहिए।" उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि अगर हम दीन की उस बुनियादी जिम्मेदारी – 'अम्र बिल मारूफ़ व नहीं अनिल मुनकर' – को नजरअंदाज़ करेंगे, तो क़यामत के दिन अल्लाह की पकड़ से नहीं बच सकेंगे।
इस अवसर पर बतौर मेहमान-ए-ख़ुसूसी, जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मुफ्ती सैयद मअसूम साक़िब ने भी सभा को संबोधित किया। उन्होंने अपने ओजपूर्ण भाषण में जमीयत की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि जमीयत हमेशा उन प्रतीकों की हिफाज़त में सबसे आगे रही है, जिन्हें आम मुसलमान इस्लामी पहचान के तौर पर मानते हैं, चाहे शरीअत में उनका दर्जा कुछ भी हो और चाहे उस विषय पर मुसलमानों के बीच मतभेद क्यों न हों।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जमीयत एक मजहबी और समाजी मंच है, इसलिए इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। हाँ, यदि किसी समय राजनीतिक ज़रूरत महसूस हो, तो राजनीतिक दलों से सहयोग लिया जा सकता है, लेकिन जमीयत के मंच का प्रयोग केवल दीन और समाज की भलाई के लिए होना चाहिए।
कार्यवाही का संचालन मुफ्ती अब्दुर रज़्ज़ाक (नाज़िम आला, जमीयत उलमा दिल्ली) ने किया। उन्होंने बैठक में जमीयत की वर्तमान टर्म में किए गए कार्यों की विस्तृत सचिव रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें समाज सुधार, तालीम, दीन की दावत और विभिन्न समाजसेवी कार्यक्रमों का विवरण दिया गया।
बैठक के दौरान चार अहम प्रस्ताव भी पारित किए गए, जो देश और मुसलमानों से जुड़े मौजूदा ज्वलंत मुद्दों को दर्शाते हैं। पहला प्रस्ताव यूनिफॉर्म सिविल कोड के खिलाफ था, जिसे कारी इसरारुल हक़ (संयोजक, इस्लाहे मआशरा) ने प्रस्तुत किया। यह प्रस्ताव इस बात को लेकर था कि यूसीसी देश की विविधता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए खतरा है, और इसका विरोध संवैधानिक और सामाजिक स्तर पर जरूरी है।
दूसरा प्रस्ताव मदारिस-ए-इस्लामिया की हिफाज़त के संबंध में था, जिसे मुफ्ती कफ़ीलुर्रहमान ने पेश किया। इस प्रस्ताव में धार्मिक शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता, उनकी भूमिका और सरकार की तरफ से बढ़ती दखलअंदाजी पर चिंता जताई गई। तीसरा प्रस्ताव भारतीय संविधान की हिफाज़त से संबंधित था, जिसे मुफ्ती इसरारुल हक़ ने पेश किया। इसमें संविधान की धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यकों के अधिकार और न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा का संकल्प लिया गया।
चौथा प्रस्ताव इस्राईली ज़ुल्म और जारिहत के खिलाफ था, जिसे मुफ्ती शमीम (नाज़िम, जमीयत उलमा चांदनी चौक) ने पेश किया। इसमें फिलिस्तीन में जारी इस्राईली अत्याचारों की निंदा करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से संज्ञान लेने की मांग की गई।
बैठक में कई प्रमुख वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे, जिनमें शामिल थे मौलाना मोहम्मद फ़रक़ान क़ासमी (ख़ाज़िन), कारी दिलशाद अहमद मजाहिरी और मुफ्ती निज़ामुद्दीन (नायब सदर), मौलाना इंतिज़ार हुसैन मजाहिरी, मौलाना जमी़ल अहमद क़ासमी, मुफ्ती मुस्तकीम अहमद क़ासमी, मुफ्ती मोहम्मद अयाज़ मजाहिरी, मुफ्ती मोहम्मद क़ासिम क़ासमी, अल्हाज सलीम रहमानी, मौलाना मोहम्मद राशिद और मौलाना मिसबाहुद्दीन।
बैठक का समापन एक रूहानी माहौल में मुफ्ती सैयद मअसूम साक़िब की दुआ के साथ हुआ। यह सभा न केवल एक सांगठनिक समीक्षा का अवसर रही, बल्कि इसमें दीन, समाज और देश के लिए जमीयत की जिम्मेदारियों को नए सिरे से समझने और आगे की रणनीति तय करने की ठोस कोशिश भी देखने को मिली। कुल मिलाकर, यह आयोजन जमीयत उलमा दिल्ली के कार्य को नई ऊर्जा और दिशा देने वाला सिद्ध हुआ।