दार्जिलिंग के हिमालयी मेंढक जेनेटिक खतरे में

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 03-10-2026
Darjeeling's Himalayan frog population genetically isolated, faces hunting pressure: Study
Darjeeling's Himalayan frog population genetically isolated, faces hunting pressure: Study

 

वाराणसी (उत्तर प्रदेश) 
 
एक नई स्टडी के अनुसार, हिमालय बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट के दार्जिलिंग और कलिम्पोंग इलाकों में पाए जाने वाले मार्बल्ड कैस्केड फ्रॉग (Amolops marmoratus) को जेनेटिक आइसोलेशन (आनुवंशिक रूप से अलग-थलग होने) और पारंपरिक शिकार से दोहरे खतरे का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय रूप से 'सिसने पहा' या 'सिसने पा' के नाम से जाने जाने वाले इस मेंढक का इस्तेमाल स्थानीय समुदाय पीढ़ियों से भोजन और पारंपरिक दवा के तौर पर करते आ रहे हैं। कलकत्ता यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, ज़ूलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया, दार्जिलिंग गवर्नमेंट कॉलेज और ताम्रलिप्त महाविद्यालय के 12 वैज्ञानिकों की एक टीम ने पहली बार इस प्रजाति का विस्तृत DNA विश्लेषण किया है।
 
इंटरनेशनल जर्नल BMC जीनोमिक्स में प्रकाशित नतीजों से पता चला है कि दार्जिलिंग इलाके में इनकी आबादी जेनेटिक रूप से अलग-थलग है और एशिया के दूसरे इलाकों की आबादी की तुलना में इनमें जेनेटिक विविधता काफी कम है। रिसर्च टीम ने दार्जिलिंग पहाड़ी इलाके में 57 जगहों से सैंपल इकट्ठा किए। 200 से 2,400 मीटर की ऊंचाई पर झरनों, तेज़ी से बहने वाली धाराओं और पथरीली छोटी नदियों में सर्वे किए गए। टीम ने 60 मेंढकों का मॉर्फोलॉजिकल (शारीरिक बनावट के आधार पर) अध्ययन किया, जबकि 35 नमूनों के DNA का विश्लेषण किया गया। ज़ूलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ZSI), कोलकाता ने इस प्रजाति की पहचान की पुष्टि की।
 
रिसर्चर्स ने जेनेटिक विश्लेषण के लिए दो स्टैंडर्ड जीन, 16S rRNA और COI का इस्तेमाल किया। दुनिया भर के DNA सीक्वेंस के साथ तुलना करने पर पता चला कि दार्जिलिंग की आबादी में जेनेटिक विविधता सबसे कम थी, जबकि म्यांमार, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन की आबादी में तुलनात्मक रूप से ज़्यादा विविधता देखी गई। दार्जिलिंग और चीन की आबादी के बीच जेनेटिक दूरी सबसे ज़्यादा थी, जबकि म्यांमार और दक्षिण-पूर्व एशियाई आबादी के बीच यह सबसे कम थी, जिससे पता चलता है कि दार्जिलिंग की आबादी जेनेटिक रूप से अलग है और दूसरे इलाकों की आबादी से अलग-थलग है।
 
वैज्ञानिकों ने DNA डेटा का इस्तेमाल करके इस प्रजाति के अलग होने के समय का भी अनुमान लगाया। विश्लेषण से पता चला कि एशिया में इस प्रजाति के पूर्वज लगभग 17.4 मिलियन साल पहले रहते थे। दक्षिण एशियाई या दार्जिलिंग वंशावली लगभग 1.12 करोड़ साल पहले अलग हुई थी, जबकि मौजूदा दार्जिलिंग वंशावली लगभग 9.4 लाख साल पहले इस इलाके में फैली थी। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अलगाव हिमालय में एक स्थिर इकोसिस्टम बनने के बाद हुआ था। इससे पता चलता है कि प्रजातियों का बंटवारा तब शुरू हुआ जब हिमालयी क्षेत्र में संसाधन भरपूर मात्रा में थे।
 
स्टडी के अनुसार, भौगोलिक अलगाव, सीमित जीन फ्लो और आबादी से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएं दार्जिलिंग की आबादी में कम जेनेटिक विविधता के मुख्य कारण हैं। शोधकर्ताओं ने स्थानीय स्तर पर मेंढकों को खाने को एक आधुनिक दबाव के तौर पर भी पहचाना है, जिससे जेनेटिक विविधता और कम हो सकती है। मॉनसून के मौसम में रात के समय चट्टानों और झाड़ियों पर बैठे मेंढकों को पकड़ना दार्जिलिंग की पहाड़ियों में आम बात है।
इस इलाके में मुख्य रूप से दो तरह के मेंढक खाए जाते हैं - अमोलॉप्स मार्मोरेटस (Amolops marmoratus) और नैनोरना लीबिगी (Nanorana liebigii)। इनमें से अमोलॉप्स मार्मोरेटस ज़्यादा जगहों पर पाए जाते हैं, इसलिए उन पर स्थानीय स्तर पर शिकार का दबाव ज़्यादा है।
 
इस रिसर्च का नेतृत्व करने वाले कलकत्ता यूनिवर्सिटी के ज़ूलॉजी विभाग के डॉ. राकेश तमांग ने कहा, "यह दार्जिलिंग पहाड़ी इलाके की इस प्रजाति के मॉर्फोलॉजिकल और जेनेटिक विश्लेषण को मिलाकर की गई पहली स्टडी है। इसकी आबादी अलग है और इसमें विविधता कम है; संरक्षण नीतियां बनाते समय इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।" डॉ. कुमारेश मंडल के अनुसार, यह आबादी 'फाउंडर इफ़ेक्ट' के ज़रिए एक छोटे समूह से शुरू हुई और बाद में तेज़ी से बढ़ी। नतीजतन, दार्जिलिंग के सैंपल फाइलोजेनेटिक ट्री की एक अलग शाखा पर दिखाई देते हैं, जिनकी छोटी शाखाएं सीमित विविधता को दर्शाती हैं।
 
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि पूर्वी हिमालय के इकोलॉजिकल संतुलन को बनाए रखने के लिए इन जेनेटिक रूप से अनोखी हिमालयी आबादी, उनके जलधारा वाले आवासों और उनकी लंबे समय की विकासवादी क्षमता की रक्षा करना ज़रूरी है। BHU के जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा, "हिमालय में मेंढकों की विविधता पर अब तक बहुत कम काम हुआ है; इस मामले में पूर्वी हिमालय पश्चिमी घाट से पीछे है। कम जेनेटिक विविधता वाली आबादी जलवायु परिवर्तन, बीमारियों और इनब्रीडिंग (आपस में प्रजनन) के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होती है।"
 
उन्होंने आगे कहा, "स्थानीय समुदायों में जागरूकता बढ़ाए बिना संरक्षण के प्रयास अधूरे रहेंगे।" इस रिसर्च के तहत पहली बार, दार्जिलिंग में पाए गए इस प्रजाति के नमूनों से COI जीन सीक्वेंस तैयार किए गए हैं। रिसर्च करने वालों का कहना है कि ये सीक्वेंस भविष्य में बारकोडिंग और एनवायरनमेंटल DNA (eDNA) मॉनिटरिंग के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। टीम ने सुझाव दिया कि बिना नियम वाली शिकार गतिविधियों पर रोक लगाई जाए, स्थानीय समुदायों में जागरूकता बढ़ाई जाए और मेंढकों के रहने की जगहों, खासकर कम से मध्यम ऊंचाई वाली धाराओं को सुरक्षित किया जाए। मेंढक पानी की गुणवत्ता और इकोलॉजिकल हेल्थ के संकेतक होते हैं, और उनकी संख्या में कमी पहाड़ों के बड़े जलीय इकोसिस्टम पर दबाव का संकेत हो सकती है।