यूनुस अल्वी/राजूद्दीन जंग/गांधीग्राम घासेड़ा/ नूह ( हरियाणा )
देश की राजधानी दिल्ली से सिर्फ पचास किलोमीटर दूर हरियाणा का नूंह ज़िला बसा है।इसी ज़िले की गोद में स्थित है गांधीग्राम घासेड़ा गाँव।इस ऐतिहासिक गाँव का नाम महात्मा गांधी के आगमन की याद में रखा गया था।बंटवारे के भयानक दौर में बापू यहाँ आए थे। आज 80साल बाद भी घासेड़ा बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है।
पीने के साफ़ पानी का संकट यहाँ रोज़ का काम है। बिजली की आँख-मिचौली गाँव वालों को परेशान करती है। टूटी सड़कें और चरमराई शिक्षा व्यवस्था इस आदर्श गाँव की ज़मीनी सच्चाई बयान करती हैं।

जब मेवात की मिट्टी में उथल-पुथल मची थी
साल 1947 का वह दौर बेहद खौफनाक था।देश विभाजन की आग में जल रहा था।अलवर, भरतपुर और जयपुर की रियासतों से करीब डेढ़ लाख मुसलमानों को खदेड़ दिया गया था।अपनी जान बचाते लोग बदहवास भाग रहे थे।लोग अपने घरों पर ताले लगाकर निकल पड़े थे।घोड़ा-गाड़ियों, बैलगाड़ियों और पैदल जत्थों का कारवां दिल्ली की तरफ बढ़ रहा था।
मेवात क्षेत्र के नगीना, नूंह, सोहना और गुरुग्राम में रिफ्यूजी खेमे बन चुके थे। लाखों मेवाती मुसलमान स्वतंत्रता सेनानी चौधरी मोहम्मद यासीन खान के संदेश का इंतज़ार कर रहे थे। उसी बीच 18 दिसंबर की शाम खबर फैली कि महात्मा गांधी उनसे मिलने आ रहे हैं।इंतज़ार में लोग पूरी रात सो नहीं सके।

19 दिसंबर 1947: घासेड़ा की धरती पर बापू के कदम
आखिरकार 19 दिसंबर 1947 का ऐतिहासिक दिन आया।बापू पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपी चंद भार्गव और रणबीर सिंह हुड्डा के साथ घासेड़ा पहुँचे।तब तक कुछ काफिले पाकिस्तान की तरफ बढ़ चुके थे।लेकिन घासेड़ा के कुएँ पर बने मंच से बापू ने जो कहा, उसने पूरे मेवात का रुख मोड़ दिया।
"तुम्हें अगर पाकिस्तान जाना है तो मेरी लाश के ऊपर से गुज़रकर जाना होगा। यह देश तुम्हारा भी है। मेरे कहने पर यहीं रुक जाओ।"
— महात्मा गांधी (19 दिसंबर 1947, घासेड़ा)
बापू ने एकत्र भीड़ के सामने कहा कि मेव कौम भारत की रीढ़ की हड्डी है।उन्होंने पंजाब और केंद्र सरकार की तरफ से मेवातियों के जान-माल की हिफ़ाज़त की पूरी गारंटी दी। बापू के इस भरोसे पर लाखों मेवातियों ने अपनी बनी-बनाई योजना रद्द कर दी।लोगों ने वतन छोड़कर न जाने का अटल फैसला किया।

बापू का शहादत दिवस और मेवात दिवस
गांधी जी के घासेड़ा आने के करीब चालीस दिन बाद 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या कर दी गई।इस शहादत की खबर ने मेवातियों को अंदर तक तोड़ दिया था।हर साल 19 दिसंबर को मेवाती इस दिन को 'मेवात दिवस' के रूप में मनाते हैं।वहीं 30 जनवरी को शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है।
गांधी जी की याद में साल 2007 में इस गाँव का नाम आधिकारिक तौर पर गांधीग्राम घासेड़ा किया गया।राज्य सरकार ने इसे आदर्श गाँव बनाने की घोषणा की थी।

कागज़ों में आदर्श, ज़मीन पर बदहाली
गांधीग्राम घासेड़ा का इतिहास भले ही गौरवशाली रहा हो, लेकिन वर्तमान बेहद फीका है।नीति आयोग की अति-पिछड़े ज़िलों की सूची में शामिल नूंह का यह गाँव आज भी मूलभूत ढाँचे के लिए तरस रहा है।
गाँव के बुज़ुर्ग मियाजी नूर मोहम्मद और हाजी ईसा बताते हैं कि बापू ने इस मुल्क को एक ऐसा बग़ीचा कहा था जहाँ हर तरह के फूल खिलते हैं। मगर साइबर सिटी गुरुग्राम के बगल में बैठा यह गाँव आज सरकारी उपेक्षा का जीता-जागता प्रमाण है।
यहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, पक्की सड़कों, पेयजल आपूर्ति और रोज़गार की स्थिति अब भी बेहद चिंताजनक है। सरकारें बदलती रहीं, वादे होते रहे, पर घासेड़ा के लोगों को आज भी उस असली विकास का इंतज़ार है जिसकी उम्मीद उन्हें 1947 में दिखाई गई थी।