साकिब सलीम
2अक्टूबर 1904को जन्मे लाल बहादुर शास्त्री ने अपने करियर में अत्यंत गरीबी से उठकर देश के प्रधानमंत्री पद तक का सफर तय किया—और वह भी बिना किसी सिद्धांत से समझौता किए। उन्हें जानने वाले हर व्यक्ति ने एक ही बात पर ज़ोर दिया: सत्ता उन्हें बदल नहीं सकी। गांधी जी का वह मूलमंत्र, जिसे शास्त्री जी दोहराना पसंद करते थे, यही था: "पद पर रहते हुए हमेशा निर्लिप्त (हल्के होकर) बैठो, कभी उससे चिपककर (कसकर) मत बैठो।"
शास्त्री जी के पिता, जो एक शिक्षक थे, का निधन तब हो गया था जब वे बमुश्किल डेढ़ साल के थे। मुगलसराय में अपने नाना के घर बड़े होते हुए उनकी माँ उन्हें प्यार से 'नन्हें' कहती थीं। बचपन में पैसों की तंगी थी, लेकिन प्यार की कोई कमी न थी।
हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए शास्त्री जी जब वाराणसी गए, तो वहाँ रिश्तेदारों ने उनसे घर के काम-काज करवाए और कभी बराबरी का दर्जा नहीं दिया। हरिश्चंद्र हाई स्कूल में उनके शिक्षक निष्कामेश्वर प्रसाद मिश्र का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। जब मिश्र जी की पत्नी ने अपने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के बदले शास्त्री जी को पैसे देने चाहे, तो उन्होंने सीधे पूछा कि क्या कोई अपने ही भाइयों को पढ़ाने के पैसे लेता है?

सोलह साल की उम्र में, गांधी जी के आह्वान पर शास्त्री जी ने अपनी स्कूली परीक्षा छोड़ दी। उनके शिक्षक ने समझाया कि उनकी विधवा माँ और शादी के योग्य बहनों की ज़िम्मेदारी उन्हीं पर है। इस पर शास्त्री जी ने जवाब दिया कि देश ने पुकारा है। उनकी माँ भी सहमत हो गईं;उन्हें अपने बेटे पर विश्वास था और बस इतना ही चाहा कि वे सोच-समझकर कदम उठाएँ और एक बार जो राह चुन लें, उससे कभी पीछे न हटें।
1926 में शास्त्री जी ने काशी विद्यापीठ से दर्शनशास्त्र में 'शास्त्री' की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद, वे लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित 'सर्वेंट्स ऑफ द पीपल सोसाइटी' में शामिल हो गए, जिसके आजीवन सदस्य प्रति माह मात्र 60रुपये के गुज़ारा भत्ते पर रहते थे। 1928में अपनी शादी में, शास्त्री जी ने दहेज के रूप में केवल एक चरखा और कुछ गज़ खादी स्वीकार की, जबकि उनकी ससुराल वाले भारी दहेज दे सकते थे।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, शास्त्री जी ने कुल मिलाकर लगभग नौ साल जेल में बिताए और सात बार जेल गए। यहाँ भी उन्होंने ऐसा नैतिक चरित्र दिखाया जिसकी मिसाल कम ही मिलती है।जब फैज़ाबाद जेल में उनसे मिलने आईं उनकी पत्नी ने कपड़ों में छिपाकर दो आम उन्हें देने चाहे, तो शास्त्री जी ने इस नियम- उल्लंघन के लिए उन्हें डांट दिया (हालाँकि बाद में उन्होंने पत्र लिखकर उनसे माफी भी माँगी)।
जब शास्त्री जी का छोटा बेटा टाइफाइड से गंभीर रूप से बीमार था, तो अधिकारियों ने पैरोल की शर्त के रूप में राजनीति से दूर रहने का लिखित वचन माँगा। उन्होंने साफ इंकार कर दिया, जिसके बाद उन्हें एक सप्ताह की पैरोल दी गई। सप्ताह खत्म होने पर, जब बुखार से तपता बच्चा उनसे रुकने की मिन्नतें कर रहा था, तब भी वे वापस जेल लौट गए।
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान शास्त्री जी ने भूमिगत होकर काम किया, जब तक कि उन्होंने इलाहाबाद (प्रयागराज) में एक प्रतिबंधित सभा को संबोधित करके खुद की गिरफ्तारी नहीं दे दी। भाषण के अभी कुछ ही वाक्य हुए थे कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
On this Gandhi Jayanti and Lal Bahadur Shastri Ji's birthday let's pledge for justice, equality, fraternity and liberty. Jai Hind. pic.twitter.com/HJjSBWaSqL
— सुशांत सिंह sushant singh سشانت سنگھ (@sushant_says) October 2, 2024
जेल में उनसे मिलने का किराया बचाने के लिए उनकी पत्नी बच्चों को भुने हुए गेहूँ के गोले खिलाकर गुज़ारा करती थीं। जब एक मुस्लिम पड़ोसी की पत्नी को यह बात पता चली, तो उन्होंने यह कहते हुए राशन और ईंधन भेजा कि अगर लाल बहादुर देश के लिए इतना बड़ा त्याग कर सकते हैं, तो कम से कम वे उनके परिवार की मदद तो कर ही सकती हैं।
शास्त्री जी ने 1937में संयुक्त प्रांत (U.P.) की विधानसभा में प्रवेश किया और संयोजक के रूप में भूमि सुधार रिपोर्ट तैयार की, जो आगे चलकर क्रांतिकारी कानूनों का आधार बनी। 1945में जेल से रिहा होने के बाद, गोविंद वल्लभ पंत उन्हें लखनऊ ले आए,पहले संसदीय सचिव के रूप में और फिर उन्होंने पुलिस और परिवहन मंत्री के रूप में सेवा दी।
उन्होंने पुलिस को कम से कम बल प्रयोग करने का निर्देश दिया और लाठी के बजाय वॉटर कैनन (पानी की बौछार) का विकल्प चुना। विभाजन के आसपास सांप्रदायिक तनाव के उन कठिन वर्षों में, शास्त्री जी ने हर तरह के पक्षपात से ऊपर उठकर काम करने का नाम कमाया।
सादगी शास्त्री जी के लिए एक जीता-जागता सिद्धांत थी; वे एक पुराने अखबार पर परोसे गए पराठे और सब्जी खा लिया करते थे। जब एक मित्र ने उन्हें रसोइया रखने की सलाह दी, तो उनका सवाल था कि नौकर के पैसे कहाँ से आएँगे? एक बार उनके शिक्षक की पत्नी ने उन्हें खाली हाथ घर आने पर डांटा, तो उन्होंने जवाब दिया, "मैं बड़ा नहीं बन गया हूँ, मुझे बस बड़े काम करने हैं।"
1951में शास्त्री जी कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव बने और 1952में रेल मंत्री। उन्होंने ट्रेनों में पुराना फर्स्ट क्लास समाप्त किया, सेकेंड क्लास को बेहतर बनाया और थर्ड क्लास के डिब्बों में पंखे लगवाए। रेल मंत्री के रूप में उन्होंने अपने लिए विशेष सलोन (शाही डिब्बे) का इस्तेमाल करने से इंकार कर दिया। जब अधिकारियों ने बिना पूछे उनके डिब्बे में कूलर लगवा दिया, तो उन्होंने पूछा कि क्या बाकी यात्रियों को गर्मी नहीं लगती? और उन्होंने उसे तुरंत हटवा दिया।
नवंबर 1956में अरियालूर रेल दुर्घटना में 144लोगों की मौत के बाद शास्त्री जी ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने इसके लिए खुद को नैतिक रूप से ज़िम्मेदार माना। जवाहरलाल नेहरू ने अनिच्छा से उनका इस्तीफा स्वीकार किया और उनके नैतिक साहस व ईमानदारी की खुलकर तारीफ की।
गृह मंत्री (1961से 1963) के रूप में शास्त्री जी ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और भ्रष्टाचार के खिलाफ संथानम आयोग की स्थापना की। कामराज योजना के तहत पद छोड़ने का प्रस्ताव देने वाले वे सबसे पहले नेताओं में से थे, और कहा जाता है कि उन्होंने नेहरू जी पर अपना इस्तीफा स्वीकार करने का दबाव बनाया था।
1964 में शास्त्री जी को बिना विभाग के मंत्री के रूप में वापस बुलाया गया। उन्होंने कश्मीर में हज़रतबल दरगाह से पवित्र अवशेष (मोए-मुकद्दस) की चोरी के संकट को शांत करने में मदद की। इसके लिए वे आंदोलनकारियों द्वारा नामित सत्रह मौलवियों और पीरों द्वारा पवित्र अवशेष की सार्वजनिक पहचान (तस्दीक) कराने पर सहमत हुए थे।
सर्वसम्मति से चुने जाने के बाद, 9जून 1964को लाल बहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके घर में तब भी वही मोटा-खुरदरा कपड़ा इस्तेमाल होता था, और वे अपने कोट के नीचे कॉलर व कफ से घिसे हुए कुर्ते पहनते थे। उनके वेतन का एक हिस्सा 'सर्वेंट्स ऑफ द पीपल सोसाइटी' को जाता था।
सरकारी इंपाला कार केवल विदेशी राजकीय अतिथियों के लिए आरक्षित थी। एक बार उनके बेटों ने उसे किसी डिनर पर जाने के लिए इस्तेमाल कर लिया। शास्त्री जी ने उनसे पूछताछ की, ड्राइवर को बुलाया और लॉग बुक में "14किलोमीटर, निजी इस्तेमाल" दर्ज करने का आदेश दिया और अपनी जेब से 7पैसे प्रति किलोमीटर की दर से पैसे जमा करवाए।
शास्त्री जी के निधन के समय उनके पास कोई बचत नहीं थी, और किश्तों पर खरीदी गई एक छोटी कार का भुगतान उनकी मृत्यु के तीन साल बाद तक चलता रहा। प्रधानमंत्री बनने पर उनकी माँ की उनसे बस यही हिदायत थी कि भले ही उनकी जान चली जाए, लेकिन देश की उन्नति होनी चाहिए और वे ऐसा कुछ न करें जिससे गरीबों को दुख पहुँचे।
शास्त्री जी की विचारधारा तरीकों में गांधीवादी और लक्ष्यों में व्यावहारिक थी। उन्होंने समाजवाद को बातों से नहीं बल्कि कर्मों से परिभाषित किया—आम जनता को भोजन, कपड़ा, मकान, चिकित्सा और रोज़गार में आत्मनिर्भर बनाकर तथा अमीर और गरीब के बीच की खाई को पाटकर।

परामर्श और विचार-विमर्श से शासन चलाने की नीति के जरिए, शास्त्री जी ने कैबिनेट को संयुक्त ज़िम्मेदारी की संस्था के रूप में पुनर्जीवित किया और विपक्ष को भी साथ लेकर चलने का प्रयास किया।
खाद्यान्न संकट का सामना करते हुए,जब 18 महीनों में अनाज की कीमतें 22 प्रतिशत बढ़ चुकी थीं,वे चाहते थे कि देश भोजन और रक्षा के मामले में अपने पैरों पर खड़ा हो। इसी सोच को उन्होंने अपने मशहूर नारे "जय जवान, जय किसान" में पिरोया। उन्होंने देशवासियों से महीने में एक दिन चावल छोड़ने की अपील की और मंत्रियों को सादगी से रहने का निर्देश दिया, यहाँ तक कि अपने आवास के लिए नए साज़-सामान खरीदने पर भी रोक लगा दी।
1965 के युद्ध के दौरान शास्त्री जी ने अपने बेटे से कहा था कि लड़ाई दो सरकारों के बीच है, दो देशों की जनता के बीच नहीं, और आम नागरिकों को कम से कम तकलीफ होनी चाहिए। उन्होंने भारत को पाकिस्तान पर एक ऐतिहासिक विजय दिलाई।