सार्वजनिक हित में धार्मिक स्थलों का अधिग्रहण वैध: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 03-07-2026
Acquisition of religious sites in public interest is valid: Allahabad High Court
Acquisition of religious sites in public interest is valid: Allahabad High Court

 

प्रयागराज

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी के दालमंडी क्षेत्र में प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण परियोजना को चुनौती देने वाली एक महत्वपूर्ण याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि राज्य अपने संप्रभु अधिकारों के तहत सार्वजनिक हित के लिए धार्मिक स्थलों का अधिग्रहण कर सकता है और यह न तो असंवैधानिक है और न ही कानून के विरुद्ध।

यह फैसला न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारत के धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक ढांचे में मंदिर, मस्जिद, चर्च या अन्य कोई भी धार्मिक स्थल अधिग्रहण से पूर्ण रूप से मुक्त नहीं है, बशर्ते अधिग्रहण सार्वजनिक उद्देश्य और कानून के तहत किया जा रहा हो।

यह याचिका दालमंडी बाजार के छह दुकानदारों द्वारा दायर की गई थी, जो संबंधित दुकानों के किरायेदार हैं। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि उन्हें जबरन बेदखल किया जा रहा है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया था कि प्रशासन को पुलिस या अन्य सुरक्षा बलों की तैनाती से रोका जाए और क्षेत्र की छह प्राचीन मस्जिदों को संरक्षण प्रदान किया जाए। इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने दालमंडी में मौजूदा मार्ग को चौड़ा करने के बजाय वैकल्पिक मार्ग विकसित करने की मांग भी की थी।

अपने विस्तृत फैसले में अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता केवल किरायेदार हैं और संबंधित संपत्तियों पर उनका स्वामित्व अधिकार नहीं है। ऐसे में वे संपत्ति के मालिकों की तरह अधिकारों का दावा नहीं कर सकते। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने सामान्य किरायेदारी विवाद को धार्मिक स्थलों की सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे से जोड़ दिया, जिससे उनकी याचिका कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं रह गई।

खंडपीठ ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाने से पहले सक्षम प्राधिकारी के समक्ष कोई औपचारिक मांग या प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया था, जबकि कानूनन ऐसा करना आवश्यक था।

छह प्राचीन मस्जिदों के संभावित अधिग्रहण को लेकर अदालत ने 'पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991' की व्याख्या करते हुए कहा कि इस कानून का उद्देश्य केवल किसी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को एक धर्म या संप्रदाय से दूसरे में बदलने से रोकना है। यह अधिनियम राज्य को सार्वजनिक हित में भूमि अधिग्रहण करने से नहीं रोकता।

अदालत ने अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले डॉ. एम. इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ का भी हवाला दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कोई भी धार्मिक स्थल अधिग्रहण से पूर्ण रूप से सुरक्षित नहीं है और सार्वजनिक उद्देश्य के लिए उसका अधिग्रहण किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि राज्य सरकार और संबंधित प्राधिकरण कानून के दायरे में रहते हुए दालमंडी सड़क चौड़ीकरण परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं और यह परियोजना व्यापक जनहित में है।

इसके साथ ही अदालत ने कहा कि न्यायसंगत मुआवजा और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 प्रभावित परिवारों के लिए मुआवजा और पुनर्वास के पर्याप्त प्रावधान उपलब्ध कराता है। इसलिए याचिकाकर्ताओं की आशंकाएं निराधार हैं।

हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस फैसले से संबंधित वक्फ बोर्ड या मस्जिदों के मुतवल्लियों के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे। यदि वे भविष्य में किसी सक्षम मंच पर कानूनी उपाय अपनाना चाहें, तो उन्हें ऐसा करने की स्वतंत्रता होगी।