भक्ति चालक/ छत्रपति संभाजीनगर
स्वच्छता, सद्भाव और विकास जब एक साथ मिलते हैं, तो बदलाव की एक नई कहानी लिखी जाती है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में स्थित नारायणपुर बुद्रुक गांव आज इसी बदलाव का जीता-जागता प्रतीक बन चुका है। लगभग 90 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इस गांव ने देश के सामने सामाजिक एकता और ग्रामीण विकास का एक बेहतरीन मॉडल पेश किया है।
यह गांव आज धार्मिक रूढ़ियों को चुपचाप पीछे छोड़कर देश के आदर्श गांवों की सूची में शामिल हो गया है।

समावेशी संस्कृति की पहचान: प्रवेश द्वार पर हनुमान मंदिर
छत्रपति संभाजीनगर जिले के गंगापुर तालुका में स्थित नारायणपुर बुद्रुक की जनसांख्यिकी बेहद दिलचस्प है। यहां की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम है। गांव के सरपंच और उप सरपंच दोनों ही मुस्लिम समुदाय से आते हैं।
इसके बावजूद, गांव के प्रवेश द्वार पर जो सबसे पहली और भव्य संरचना दिखाई देती है, वह एक खूबसूरती से पुनर्निर्मित हनुमान मंदिर है। यह मंदिर इस गांव की समावेशी और गंगा-जमुनी तहजीब का एक जीवंत उदाहरण है।
गांव में मुस्लिम समुदाय के अलावा एक छोटी आबादी दलित समुदाय की भी है। यहां मराठा समुदाय के निवासी लगभग नहीं के बराबर हैं। अपनी इस अनूठी जनसांख्यिकीय संरचना के बावजूद गांव ने सभी समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

दशकों पुराने खंडहर मंदिर का ग्रामीणों ने किया जीर्णोद्धार
नारायणपुर बुद्रुक में स्थित यह प्राचीन हनुमान मंदिर दशकों से जर्जर और खंडहर अवस्था में था। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, बहुत पहले मंदिर की छत गिर गई थी। इसके बाद केवल एक खुले चबूतरे पर भगवान हनुमान की मूर्ति बची रह गई थी।
ग्रामीणों ने इस स्थिति को बदलने का फैसला किया। गांव की बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास हुआ कि मंदिर का पुनर्निर्माण कराया जाएगा। इसके बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों ने धार्मिक नेताओं से चर्चा की।
सभी ने मिलकर चंदा इकट्ठा किया और मंदिर के गर्भगृह का पुनर्निर्माण करवाकर उस पर एक मजबूत छत बनवाई। इस तरह ग्रामीणों ने अपने प्रयासों से मंदिर को उसकी पुरानी गरिमा और पहचान वापस लौटाई।

यह मंदिर हमारा है, मस्जिद हमारी है
इस जीर्णोद्धार का एक वीडियो सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हुआ है। वीडियो में मंदिर के सामने खड़े मुस्लिम ग्रामीण गर्व से कहते नजर आते हैं कि यह मंदिर हमारा है, यह मस्जिद हमारी है और यहां लगी बाबासाहेब अंबेडकर की प्रतिमा भी हमारी है।
"हम बचपन से इस हनुमान मंदिर को देखते आ रहे हैं। जब इसकी इमारत जर्जर हो गई, तो हम सभी ग्रामीणों ने मिलकर सार्वजनिक दान से इसका पुनर्निर्माण कराया। मंदिर पर छत नहीं थी। काम शुरू करने से पहले हमने महाराज से पूरी चर्चा की थी। हमारे गांव में हमेशा से ही आपसी सहमति और सांप्रदायिक सद्भाव का बोलबाला रहा है।" — नासिर पटेल, सरपंच, नारायणपुर बुद्रुक

पर्यावरण और स्वच्छता में जिले में नंबर वन
नारायणपुर बुद्रुक ने केवल सामाजिक मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के क्षेत्र में भी अपनी एक अलग पहचान बनाई है। महाराष्ट्र सरकार के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा चलाए जा रहे 'माझी वसुंधरा अभियान 5.0' के तहत इस ग्राम पंचायत को छत्रपति संभाजीनगर जिले में पहला स्थान मिला है।
सरकारी मूल्यांकन दल ने गांव के वनरोपण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, स्वच्छता, जन जागरूकता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का गहन निरीक्षण किया। इस उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए गांव को सरकार की तरफ से 50 लाख रुपये की पुरस्कार राशि दी गई है।
30 साल से एक ही सरपंच: विकास की निरंतरता
इस गांव के विकास और अनुशासन के पीछे सरपंच नासिर पटेल का कुशल नेतृत्व है। वह लगातार पिछले 30 वर्षों से निर्विरोध या भारी बहुमत से सरपंच चुने जा रहे हैं। उनके लंबे कार्यकाल ने गांव को ग्रामीण शासन का एक बेहतरीन मॉडल बना दिया है।
आज गांव में प्रवेश करते ही पक्की सीमेंट कंक्रीट की सड़कें दिखाई देती हैं। पानी की निकासी के लिए पूरी तरह से भूमिगत जल निकासी व्यवस्था बनाई गई है। ग्रामीणों को शुद्ध पीने का पानी देने के लिए एक आधुनिक आरओ वाटर प्लांट लगाया गया है।
कचरा मुक्त गांव और जल संरक्षण की बड़ी पहल
नारायणपुर बुद्रुक आज पूरी तरह से कूड़ा-मुक्त गांव बन चुका है। यहां गीले और सूखे कचरे को अलग करने के लिए घर-घर से कचरा संग्रह की ठोस व्यवस्था है। प्लास्टिक कचरे को एक जगह व्यवस्थित रूप से इकट्ठा किया जाता है और रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जाता है। स्वच्छता के क्षेत्र में इस बेहतरीन काम के लिए गांव को पहले भी प्रतिष्ठित 'संत गाडगे बाबा ग्राम स्वच्छता पुरस्कार' से सम्मानित किया जा चुका है।
इसके साथ ही गांव ने जल संरक्षण के क्षेत्र में भी बड़ा कदम उठाया है। सरपंच नासिर पटेल, उप सरपंच माजिद पटेल और ग्राम पंचायत अधिकारी स्वप्निल घरमोडे के मार्गदर्शन में ग्रामीणों ने गांव के पास से बहने वाली खाम नदी के जीर्णोद्धार का अभियान शुरू किया। नदी की जल संचयन क्षमता बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर गाद निकाली गई। नदी के किनारों को सुंदर बनाया गया है और वहां पैदल चलने के लिए पाथवे का निर्माण किया गया है।

हरित क्रांति की ओर बढ़ते कदम और बाबासाहेब के आदर्श
गांव को पूरी तरह से हरा-भरा बनाने के लिए नदी के किनारों और सार्वजनिक स्थानों पर वृक्षारोपण का काम तेजी से चल रहा है। वर्तमान में गांव में 1,000 आम के पौधे लगाए जा चुके हैं। सरपंच नासिर पटेल ने आने वाले समय में नारायणपुर बुद्रुक में 10,000 पेड़ लगाने की एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है।
गांव की यह प्रगतिशील सोच केवल पर्यावरण और धर्म तक सीमित नहीं है। सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए गांव के दलित बहुल इलाके में डॉ. बी.आर. अंबेडकर की एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। नासिर पटेल कहते हैं कि हमारा उद्देश्य केवल एक प्रतिमा खड़ी करना नहीं था, बल्कि हम नई पीढ़ी को बाबासाहेब के महान विचारों और उनके सामाजिक आदर्शों से परिचित कराना चाहते थे।
नारायणपुर बुद्रुक में सभी राष्ट्रीय त्योहार और विभिन्न समुदायों के धार्मिक उत्सव पूरे उत्साह के साथ सामूहिक रूप से मनाए जाते हैं। देश के महापुरुषों की जयंतियों और स्मृति दिवसों पर विशेष कार्यक्रम होते हैं ताकि युवा पीढ़ी उनके योगदान को याद रख सके। यह गांव साबित करता है कि इच्छाशक्ति हो तो विकास और सामाजिक सद्भाव को एक साथ हासिल किया जा सकता है।