ईमान सकीना
जब भी जलवायु परिवर्तन या पर्यावरण संकट पर बात होती है, तो अक्सर हमारा ध्यान वैज्ञानिक आंकड़ों, वैश्विक तापमान, पिघलते ग्लेशियरों या अंतरराष्ट्रीय संधियों पर जाता है। इन राजनीतिक और आर्थिक बहसों के बीच हम अक्सर इस संकट के सबसे महत्वपूर्ण पहलू को भूल जाते हैं। यह पहलू नैतिक, मानवीय और आध्यात्मिक जिम्मेदारी से जुड़ा है।
पर्यावरण कार्यकर्ता ईमान साकिब के अनुसार, मुस्लिम समाज के लिए जलवायु संकट केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर 'हकूक-उल-इबाद' ( Haqooq-ul-Ibad ) यानी बंदों के अधिकारों का मामला है।
क्या है हकूक-उल-इबाद और पर्यावरण का संबंध?
इस्लामी शिक्षाओं में दो तरह के अधिकार बताए गए हैं। पहला 'हकूक-अल्लाह' यानी अल्लाह के प्रति इंसान के कर्तव्य और दूसरा 'हकूक-उल-इबाद' ( Haqooq-ul-Ibad ) यानी समाज और दूसरे इंसानों के प्रति हमारे कर्तव्य।
इस्लाम में नमाज, रोजा और जकात जैसी इबादतों को जितना जरूरी माना गया है, उतना ही महत्व इस बात को भी दिया गया है कि हमारे किसी काम से दूसरे इंसान को तकलीफ न पहुंचे। किसी का हक मारना या दूसरों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना एक गंभीर गुनाह माना गया है।
जलवायु संकट आज ठीक यही काम कर रहा है। प्रदूषण और अंधाधुंध उपभोक्ता संस्कृति के कारण आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों का जीवन, स्वास्थ्य और आजीविका खतरे में है। इसलिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना सीधे तौर पर दूसरे इंसानों के अधिकारों का हनन है।
पर्यावरण विनाश की सबसे बड़ी मार झेल रहे हैं गरीब
जलवायु परिवर्तन का सबसे कड़वा सच यह है कि इसका असर सब पर एक जैसा नहीं पड़ता। पर्यावरण को सबसे कम नुकसान पहुंचाने वाले लोग ही इसके सबसे बड़े शिकार बन रहे हैं। गरीब बस्तियां, छोटे किसान, समुद्र के किनारे रहने वाले लोग और विकासशील देश आज बाढ़, सूखे, भीषण गर्मी और खाद्यान्न संकट का सामना कर रहे हैं।
जब सूखे के कारण किसी किसान की फसल बर्बाद होती है या समुद्र का जलस्तर बढ़ने से किसी का घर डूब जाता है, तो यह सिर्फ पर्यावरण का नुकसान नहीं रह जाता। यह पूरी तरह से सामाजिक न्याय का सवाल बन जाता है।
पवित्र कुरान में धरती पर असंतुलन और बिगाड़ पैदा करने की सख्त मनाही की गई है। सुरह अल-अराफ में कहा गया है कि धरती पर सुधार के बाद इसमें बिगाड़ पैदा मत करो। यह आदेश केवल सामाजिक बुराइयों के लिए नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के उस संतुलन को बनाए रखने के लिए भी है जिसे ईश्वर ने बनाया है।
'मीजान' यानी प्रकृति का अनूठा संतुलन
इस्लामी नजरिए में 'मीजान' यानी संतुलन की अवधारणा बहुत महत्वपूर्ण है। कुरान की सुरह अर-रहमान में जिक्र है कि अल्लाह ने आसमान को ऊंचा किया और एक संतुलन (मीजान) कायम किया, ताकि तुम उस संतुलन का उल्लंघन न करो।
प्रकृति की यह व्यवस्था इंसानों के बेतरतीब इस्तेमाल के लिए नहीं है, बल्कि यह एक अमानत है। जब इंसान लालच, फिजूलखर्ची और संसाधनों के अत्यधिक दोहन से इस संतुलन को बिगाड़ता है, तो उसका खामियाजा पूरी मानवता को भुगतना पड़ता है।
आज की आधुनिक उपभोक्ता संस्कृति इंसान को जरूरत से ज्यादा चीजें खरीदने और बर्बाद करने के लिए उकसाती है। एक तरफ बड़े पैमाने पर खाना बर्बाद होता है, तो दूसरी तरफ दुनिया में लाखों लोग भूखे पेट सोते हैं। पानी और ऊर्जा का बेवजह इस्तेमाल आम बात हो गई है। इस्लाम जीवन के हर क्षेत्र में सादगी और संतुलन की सीख देता है। पैगंबर मोहम्मद साहब ने इबादत के लिए वूजू करते समय भी पानी को बर्बाद न करने की हिदायत दी थी।

आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों का हनन
पर्यावरण संकट का एक सबसे चिंताजनक पहलू हमारी आने वाली नस्लों से जुड़ा है। हम आज जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों को खत्म कर रहे हैं, नदियां प्रदूषित कर रहे हैं और जंगलों को काट रहे हैं, उससे हम अपनी आने वाली पीढ़ी के हिस्से का जीवन छीन रहे हैं।
बच्चे उस पर्यावरण ऋण को चुकाने के लिए मजबूर होंगे, जिसके जिम्मेदार वे खुद नहीं हैं। इस्लामी दृष्टिकोण से आने वाली पीढ़ियों को एक बीमार और प्रदूषित धरती सौंपना उनके हकूक का सबसे बड़ा उल्लंघन है।
इस संदर्भ में पैगंबर मोहम्मद साहब की एक बेहद मशहूर हदीस पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी को साफ करती है। उन्होंने कहा था कि अगर कयामत की घड़ी बिल्कुल करीब आ जाए और तुममें से किसी के हाथ में पौधे की एक छोटी सी कलम (seedling) हो, तो उसे भी जमीन में लगा देना चाहिए। यह सीख बताती है कि भविष्य चाहे कितना भी अनिश्चित क्यों न हो, एक इंसान के रूप में हमें धरती को हरा-भरा और बेहतर बनाने का प्रयास आखिरी समय तक छोड़ना नहीं चाहिए।

व्यक्तिगत जिम्मेदारी से लेकर वैश्विक जवाबदेही तक
जलवायु परिवर्तन को 'हकूक-उल-इबाद' के चश्मे से देखने पर यह किसी पर्यावरण वैज्ञानिक या नीति निर्माताओं का वैकल्पिक काम नहीं रह जाता। यह हर नागरिक की नैतिक और धार्मिक जिम्मेदारी बन जाता है। हमारी तरफ से प्रदूषित की गई एक नदी दूर रहने वाले किसी दूसरे समुदाय के पानी को खराब करती है। हमारी हर छोटी लापरवाही किसी न किसी रूप में इंसानी तकलीफ को बढ़ाती है।
इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि केवल व्यक्तिगत प्रयासों से ही इतनी बड़ी वैश्विक समस्या का हल निकल जाएगा। बड़ी सरकारों, कॉर्पोरेट घरानों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की जवाबदेही सबसे बड़ी है।
लेकिन बदलाव की शुरुआत हर स्तर पर होनी चाहिए। व्यक्तियों को अपनी उपभोग की आदतों को सुधारना होगा, समाजों को पर्यावरण के प्रति जागरूक होना होगा और नेताओं को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो पृथ्वी और इंसान दोनों की रक्षा कर सकें।
धरती पर मौजूद तमाम संसाधन ईश्वर की देन हैं और इंसान को इसका रखवाला बनाया गया है। जलवायु संकट आज के दौर में मुसलमानों के लिए अपनी आस्था और नैतिकता को साबित करने की एक बड़ी परीक्षा है।
जब हम संसाधनों को बचाते हैं या पर्यावरण की रक्षा के लिए आवाज उठाते हैं, तो असल में हम दूसरों के अधिकारों को बहाल कर रहे होते हैं। यह संकट केवल मौसम बदलने का नहीं है, बल्कि यह हमारे ईमान और न्याय के प्रति हमारी प्रतिबद्धता की परीक्षा है।