आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
करीब 50 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर जीवन के विकास के दौरान एक बेहद विचित्र घटना घटी प्रतीत होती है।
कैम्ब्रियन युग के जीवाश्म रिकॉर्ड में इतिहास का एक पूरा अध्याय ही गायब दिखाई देता है। जीवाश्म वैज्ञानिक इसे “फुरोंजियन गैप” कहते हैं। यह इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि इस अंतराल के ठीक पहले और बाद के जीवाश्म रिकॉर्ड में जैव-विविधता का असाधारण विस्तार देखने को मिलता है।
अब तक इसे एक वास्तविक जैविक संकट का प्रमाण माना जाता रहा है। अनुमान है कि इसके पीछे पर्यावरणीय अस्थिरता, समुद्र के रासायनिक स्वरूप में बदलाव, जलवायु का ठंडा होना, प्राचीन समुद्रों में ऑक्सीजन स्तर की कमी या इन सभी कारणों का मिला-जुला असर था।
लेकिन ‘बीएमसी बायोलॉजी’ पत्रिका में प्रकाशित हमारे नए अध्ययन से एक वैकल्पिक सोच के समर्थन में नए प्रमाण मिले हैं। संभव है कि ‘फुरोंजियन’ वास्तव में जैव-विविधता के पतन का दौर न रहा हो, बल्कि यह उन स्थानों और चट्टानों से जुड़ा अंतराल हो जहां वैज्ञानिकों ने अब तक पर्याप्त खोजबीन नहीं की।
यह हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी के इतिहास को लेकर हमारी समझ अभी भी कितनी अधूरी है।
जीवाश्मों का एक दुर्लभ समूह
हमने कनाडा के क्यूबेक से 50 करोड़ वर्ष पुराने एक नए ‘आर्थ्रोपोड’ का वर्णन किया है। आर्थ्रोपोड ऐसे जीव होते हैं जिनके शरीर के बाहर कठोर कंकाल यानी ‘एक्ज़ोस्केलेटन’ होता है, शरीर खंडों में बंटा होता है और अंग संधि वाले अर्थात जोड़ वाले होते हैं।
यह जीवाश्म शुरुआती ‘आर्थ्रोपोड्स’ के एक दुर्लभ समूह से संबंधित है। इसका संबंध उस वंश से माना जाता है जिससे आगे चलकर मकड़ियां और बिच्छू विकसित हुए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जीवाश्म ऐसे भूवैज्ञानिक परिवेश से मिला है जिसे अब तक वैज्ञानिक पृथ्वी के इतिहास के इस काल में जीवाश्म संरक्षण के लिए खास नहीं मानते थे।
इस जीवाश्म का नाम ‘मैग्निकॉर्नास्पिस गारवुडी’ रखा गया है। यह जीव ‘कोरकोरानिड्स’ नामक शुरुआती आर्थ्रोपोड्स के रहस्यमय समूह से जुड़ा था। इन जीवों के चौड़े सिर-कवच, भागों में बंटे शरीर और सुरक्षा के लिए कांटे होते थे।
दुनियाभर में ‘कोरकोरानिड्स’ के जीवाश्म बेहद दुर्लभ हैं। कैम्ब्रियन और ऑर्डोविशियन काल से अब तक इनकी केवल कुछ ही प्रजातियों का पता चला है।