आवाज द वाॅयस /अलीगढ़
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के नॉन-रेज़िडेंट स्टूडेंट्स सेंटर (एनआरएससी) में इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत की याद में वार्षिक हॉल मजलिस का आयोजन अत्यंत श्रद्धा और भावपूर्ण वातावरण में किया गया. इस मजलिस में विश्वविद्यालय के छात्रों, शिक्षकों तथा स्थानीय समुदाय के अनेक सदस्यों ने बड़ी संख्या में भाग लिया.
मजलिस की मुख्य तक़रीर तमिलनाडु सरकार के चीफ शिया क़ाज़ी, मौलाना ग़ुलाम मोहम्मद मेहदी ख़ान ने की. उन्होंने करबला के शहीदों की कुर्बानियों को याद करते हुए इमाम हुसैन (अ.स.) के उस अमर पैग़ाम को उजागर किया, जो अन्याय, अत्याचार और झूठ के विरुद्ध खड़े होने तथा इंसानी शान, इंसाफ़ और सच्चाई के लिए संघर्ष का प्रतीक है. मौलाना ने युवाओं से आह्वान किया कि वे इमाम हुसैन (अ.स.) के आदर्शों को अपने जीवन में उतारें और सामाजिक न्याय, मानवता व सच्चाई के रास्ते पर चलने का संकल्प लें.
कार्यक्रम की शुरुआत मर्सिया ख्वानी से हुई, जिसे शाहिद हुसैन ने बड़े दर्द और सम्मान के साथ पेश किया. इसके बाद रौनक हलौरी द्वारा पढ़े गए नौहे ने उपस्थित जनसमूह को करबला की दर्दनाक यादों में डुबो दिया. उनकी भावपूर्ण आवाज़ और दिल को छू लेने वाले अशआर ने वातावरण को ग़मगीन बना दिया और सबकी आंखें नम कर दीं.
यह मजलिस प्रो. ब्रिज भूषण सिंह, प्रोवोस्ट, एनआरएससी, के मार्गदर्शन और छात्रों की समर्पित मेहनत के साथ आयोजित की गई थी. मजलिस के समापन पर दुआएं की गईं—पैग़ंबर इस्लाम (स.अ.) और उनके अहल-ए-बैत (अ.स.) की याद में, साथ ही पूरी इंसानियत के लिए अमन, भाईचारे और अल्लाह की रहमत की इल्तिजा के साथ.
यह आयोजन न केवल एक धार्मिक और रूहानी अनुभव था, बल्कि यह छात्रों के नैतिक और सामाजिक दायित्वों की स्मृति दिलाने वाला प्रेरक क्षण भी बना, जिसने यह संदेश दिया कि करबला केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक ज़िंदा आंदोलन है—अन्याय के विरुद्ध हमेशा उठने वाली आवाज़.