भारत की आजादी में इन 10 वीरांगनाओं का था बड़ा योगदान

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 13-08-2026
10 Heroic Women Freedom Fighters of India
10 Heroic Women Freedom Fighters of India

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

भारत की आजादी की कहानी उन महिलाओं के साहस के बिना अधूरी है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया। किसी ने रणभूमि में तलवार उठाई, किसी ने सत्याग्रह का रास्ता चुना तो किसी ने भूमिगत रहकर क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती दी। जानिए भारत की 10 ऐसी वीरांगनाओं के बारे में, जिनका संघर्ष आज भी देश को प्रेरणा देता है।

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन करीब दो शताब्दियों तक चले औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एक लंबा संघर्ष था। इस आंदोलन में पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी बराबर की भूमिका निभाई। इन महिलाओं में राजघरानों से आने वाली वीरांगनाएं भी थीं और सामान्य परिवारों से निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनने वाली महिलाएं भी। उन्होंने जेल की यातनाएं सहीं, सामाजिक विरोध का सामना किया और कई मामलों में अपना जीवन तक देश के नाम कर दिया। आइए जानते हैं ऐसी 10 प्रमुख महिला स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन और संघर्ष के बारे में।
 
 
1. रानी लक्ष्मीबाई: झांसी की आन-बान के लिए आखिरी सांस तक संघर्ष

जन्म: 19 नवंबर 1828, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
मूल नाम: मणिकर्णिका तांबे
निधन: 18 जून 1858
 
रानी लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में मोरोपंत तांबे और भागीरथीबाई के घर हुआ था। बचपन में उन्हें ‘मनु’ के नाम से पुकारा जाता था। कम उम्र से ही उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्धकला का प्रशिक्षण लिया। उस समय लड़कियों के लिए इस तरह का प्रशिक्षण सामान्य नहीं था। उनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव से हुआ और वे झांसी की रानी बनीं। उनके पुत्र की मृत्यु के बाद उन्होंने दामोदर राव को गोद लिया। महाराजा की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने लॉर्ड डलहौजी की ‘हड़प नीति’ के तहत झांसी को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की।
 
रानी ने अंग्रेजों के इस फैसले का विरोध किया। 1857 के विद्रोह के दौरान उन्होंने झांसी की रक्षा के लिए सेना तैयार की। अंग्रेजी सेना से घिरे होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। बाद में वे कालपी और ग्वालियर पहुंचीं और वहां भी अंग्रेजों से मुकाबला किया। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास युद्ध करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुईं। रानी लक्ष्मीबाई आज भारतीय इतिहास में साहस और स्वाभिमान की सबसे बड़ी प्रतीकों में से एक हैं।
 
 
2. बेगम हजरत महल: अवध से अंग्रेजी सत्ता को चुनौती

जन्म: लगभग 1820, अवध क्षेत्र
मूल नाम: मुहम्मदी खानम
निधन: 7 अप्रैल 1879, काठमांडू, नेपाल
 
बेगम हजरत महल अवध के नवाब वाजिद अली शाह की बेगम थीं। अंग्रेजों ने 1856 में अवध का विलय अपने शासन में कर लिया और नवाब को कलकत्ता भेज दिया। इसके बाद अवध में असंतोष तेजी से बढ़ा। 1857 में विद्रोह शुरू होने पर बेगम हजरत महल ने लखनऊ में नेतृत्व संभाला। उन्होंने अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कद्र को अवध का शासक घोषित किया और अंग्रेजों के खिलाफ प्रशासन तथा प्रतिरोध को संगठित किया।
 
उन्होंने स्थानीय जमींदारों, सैनिकों और जनता को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट करने की कोशिश की। लखनऊ में अंग्रेजों को कड़ी चुनौती मिली। बेगम ने अंग्रेजों की नीतियों और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का भी विरोध किया। अंग्रेजों की सैन्य शक्ति बढ़ने के बाद उन्हें लखनऊ छोड़ना पड़ा। अंततः वे नेपाल चली गईं और वहीं उनका निधन हुआ। 1857 के विद्रोह में उनका योगदान महिला राजनीतिक नेतृत्व का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
 
 
3. सरोजिनी नायडू: कवयित्री से स्वतंत्रता आंदोलन की अग्रणी नेता तक

जन्म: 13 फरवरी 1879, हैदराबाद
निधन: 2 मार्च 1949, लखनऊ
 
सरोजिनी नायडू का जन्म हैदराबाद में एक शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय वैज्ञानिक और शिक्षाविद थे। सरोजिनी ने कम उम्र से ही कविता लिखना शुरू कर दिया था और आगे चलकर वे ‘भारत कोकिला’ के नाम से प्रसिद्ध हुईं। उनका राजनीतिक जीवन महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं के संपर्क में आने के बाद अधिक सक्रिय हुआ। उन्होंने महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया और देशभर में सभाएं कीं।
 
वे असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हुईं। नमक सत्याग्रह के दौरान भी उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व किया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया और उन्होंने जेल की यातनाएं सहीं। 1925 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। वे इस पद पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला थीं। आजादी के बाद वे संयुक्त प्रांत की राज्यपाल बनीं। साहित्य और राजनीति दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान उन्हें विशिष्ट बनाता है।
 
 
4. एनी बेसेंट: भारत के स्वशासन की मजबूत समर्थक

जन्म: 1 अक्टूबर 1847, लंदन, इंग्लैंड
निधन: 20 सितंबर 1933, अडयार, मद्रास
 
एनी बेसेंट का जन्म ब्रिटेन में हुआ था, लेकिन भारत आने के बाद उन्होंने भारतीय समाज, शिक्षा और राजनीति में गहरी रुचि ली। वे थियोसोफिकल सोसाइटी से जुड़ीं और बाद में भारत में शिक्षा के विकास के लिए काम किया। उन्होंने भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों और स्वशासन की मांग को मजबूती से उठाया। 1916 में उन्होंने बाल गंगाधर तिलक के साथ होम रूल आंदोलन को आगे बढ़ाया। इस आंदोलन का उद्देश्य भारत में स्वशासन की मांग को लोकप्रिय बनाना था।
 
ब्रिटिश सरकार ने उनके राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए उन्हें नजरबंद भी किया। उनके आंदोलन के कारण देशभर में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी। 1917 में एनी बेसेंट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि उन्होंने स्वशासन की मांग को व्यापक राजनीतिक मुद्दा बनाने में मदद की।
 
 
5. अरुणा आसफ अली: भारत छोड़ो आंदोलन का निर्भीक चेहरा

जन्म: 16 जुलाई 1909, कालका, पंजाब क्षेत्र
निधन: 29 जुलाई 1996, नई दिल्ली
 
अरुणा आसफ अली का जन्म एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अध्यापन किया। बाद में उनका विवाह स्वतंत्रता सेनानी आसफ अली से हुआ और वे राष्ट्रीय आंदोलन से अधिक सक्रिय रूप से जुड़ गईं। उन्होंने नमक सत्याग्रह और अन्य आंदोलनों में हिस्सा लिया और जेल भी गईं। लेकिन उन्हें सबसे अधिक पहचान 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से मिली।
 
9 अगस्त 1942 को मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में, जब प्रमुख कांग्रेस नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे, अरुणा आसफ अली ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ खुले प्रतिरोध का शक्तिशाली प्रतीक बन गया। इसके बाद वे भूमिगत हो गईं। उन्होंने गुप्त रूप से आंदोलन से जुड़े लोगों के साथ संपर्क बनाए रखा और स्वतंत्रता आंदोलन के संदेशों को आगे बढ़ाया। उनका साहस उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख महिला नेताओं में शामिल करता है।
 
 
6. उषा मेहता: भूमिगत कांग्रेस रेडियो की आवाज

जन्म: 25 मार्च 1920, सरस, गुजरात
निधन: 11 अगस्त 2000, मुंबई
 
उषा मेहता का जन्म गुजरात के एक परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे राष्ट्रीय आंदोलन से प्रभावित थीं। उन्होंने कम उम्र में ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में भाग लेना शुरू कर दिया था। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और आंदोलन से संबंधित सूचनाओं पर नियंत्रण बढ़ा दिया। ऐसे समय में उषा मेहता और उनके सहयोगियों ने एक गुप्त रेडियो स्टेशन शुरू किया, जिसे ‘कांग्रेस रेडियो’ के नाम से जाना गया।
 
इस रेडियो के माध्यम से आंदोलन से जुड़ी खबरें और संदेश जनता तक पहुंचाए जाते थे। ब्रिटिश सरकार ने रेडियो स्टेशन का पता लगाने के लिए जांच शुरू की। अंततः उषा मेहता गिरफ्तार कर ली गईं। जेल में यातनाओं और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने साथियों के बारे में जानकारी देने से इनकार किया। स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान संचार और सूचना के मोर्चे पर असाधारण माना जाता है।
 
 
7. मैडम भीकाजी कामा: विदेश में भारत की आजादी की आवाज

जन्म: 24 सितंबर 1861, बंबई
निधन: 13 अगस्त 1936, बंबई
 
भीकाजी रुस्तम कामा का जन्म मुंबई के एक संपन्न पारसी परिवार में हुआ था। वे सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय थीं। बाद में वे विदेश चली गईं और वहां भारतीय स्वतंत्रता के समर्थन में अभियान चलाने लगीं। लंदन और यूरोप में उन्होंने भारतीय राष्ट्रवादियों तथा क्रांतिकारियों के साथ संपर्क बनाए। उन्होंने ब्रिटिश शासन की आलोचना की और भारत की स्वतंत्रता का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का प्रयास किया।
 
1907 में स्टुटगार्ट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थन में भारतीय ध्वज के एक प्रारंभिक स्वरूप को प्रदर्शित किया। विदेश में रहते हुए उन्होंने भारतीय क्रांतिकारियों को साहित्य और अन्य सहायता उपलब्ध कराने में भी भूमिका निभाई। उनका योगदान इस बात का उदाहरण है कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लड़ी जा रही थी।
 
 
 
8. कस्तूरबा गांधी: सत्याग्रह, सेवा और संघर्ष का चेहरा

जन्म: 11 अप्रैल 1869, पोरबंदर, गुजरात
निधन: 22 फरवरी 1944, पुणे
 
कस्तूरबा गांधी का जन्म पोरबंदर में हुआ था। उनका विवाह कम उम्र में मोहनदास करमचंद गांधी से हुआ। दक्षिण अफ्रीका में गांधी के साथ रहते हुए वे धीरे-धीरे सार्वजनिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हुईं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए चलाए गए सत्याग्रहों में भाग लिया। भारत लौटने के बाद भी वे स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक सुधार के कार्यों में सक्रिय रहीं।
 
उन्होंने विदेशी कपड़ों के बहिष्कार, स्वदेशी और महिलाओं के बीच जागरूकता फैलाने में भूमिका निभाई। उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी वे गिरफ्तार हुईं। पुणे के आगा खान पैलेस में नजरबंदी के दौरान 22 फरवरी 1944 को उनका निधन हुआ। उनका जीवन स्वतंत्रता संघर्ष के साथ सामाजिक सेवा और महिला जागरूकता से भी जुड़ा रहा।
 
 
9. कमला नेहरू: महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा

जन्म: 1 अगस्त 1899, दिल्ली
निधन: 28 फरवरी 1936, लॉज़ान, स्विट्जरलैंड
 
कमला नेहरू का जन्म दिल्ली के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। विवाह के बाद वे जवाहरलाल नेहरू के साथ राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ीं। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और शराब की दुकानों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।
 
कमला नेहरू ने महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के लिए भी काम किया। उन्होंने कई बार ब्रिटिश सरकार की कार्रवाई का सामना किया और जेल गईं। लंबे समय से खराब स्वास्थ्य के बावजूद उनका राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ। 1936 में स्विट्जरलैंड में उनका निधन हुआ। उनका जीवन उस दौर में महिलाओं के राजनीतिक जागरण की महत्वपूर्ण मिसाल है।
 
 
10. दुर्गा भाभी: भगत सिंह की मदद से क्रांतिकारी आंदोलन तक

जन्म: 7 अक्टूबर 1907, इलाहाबाद क्षेत्र
निधन: 15 अक्टूबर 1999, गाजियाबाद
 
दुर्गावती देवी, जिन्हें क्रांतिकारी आंदोलन में ‘दुर्गा भाभी’ के नाम से जाना जाता था, स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी पक्ष की प्रमुख महिलाओं में थीं। उनका विवाह क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा से हुआ था। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े क्रांतिकारियों के संपर्क में थीं। उन्होंने क्रांतिकारियों को आर्थिक और व्यावहारिक सहायता दी।
 
1928 में पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या के बाद भगत सिंह को लाहौर से बाहर निकालने में दुर्गा भाभी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपने छोटे बेटे के साथ भगत सिंह के साथ यात्रा की, जिससे पुलिस को संदेह न हो। उन्होंने बाद में भी क्रांतिकारी गतिविधियों में सहयोग जारी रखा। ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनका संघर्ष यह दिखाता है कि महिलाओं ने क्रांतिकारी आंदोलन में भी सक्रिय और जोखिम भरी भूमिका निभाई थी।
 
स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की विरासत

इन दस वीरांगनाओं की कहानियां अलग-अलग हैं, लेकिन इनके संघर्ष का उद्देश्य एक था. भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना। रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल ने 1857 में सशस्त्र प्रतिरोध का नेतृत्व किया। सरोजिनी नायडू, कस्तूरबा गांधी और कमला नेहरू ने जनआंदोलनों और सत्याग्रह को मजबूती दी। वहीं अरुणा आसफ अली और उषा मेहता ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत गतिविधियों के जरिए ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। दुर्गा भाभी ने क्रांतिकारियों की मदद की, जबकि भीकाजी कामा ने विदेश में भारत की आजादी की आवाज उठाई।
 
इन महिलाओं का योगदान केवल स्वतंत्रता प्राप्त करने तक सीमित नहीं था। उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका को भी बदलने का काम किया। उन्होंने साबित किया कि देश के राजनीतिक और राष्ट्रीय भविष्य को तय करने में महिलाएं भी बराबर की भागीदार हैं। भारत की स्वतंत्रता का इतिहास अनेक ज्ञात और अनगिनत गुमनाम महिलाओं के त्याग से बना है। इन वीरांगनाओं ने अलग-अलग परिस्थितियों में अंग्रेजी शासन का विरोध किया और अपने साहस से आने वाली पीढ़ियों के लिए उदाहरण कायम किया।
 
रानी लक्ष्मीबाई की तलवार से लेकर उषा मेहता के कांग्रेस रेडियो तक और सरोजिनी नायडू के जनआंदोलन से लेकर दुर्गा भाभी की क्रांतिकारी गतिविधियों तक हर कहानी स्वतंत्रता संघर्ष के अलग पहलू को सामने लाती है। आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस लेते हैं, तो इन वीरांगनाओं के संघर्ष को याद करना केवल इतिहास को दोहराना नहीं, बल्कि उन मूल्यों, साहस, त्याग, स्वाभिमान और देशसेवा को समझना भी है, जिनके बल पर भारत ने स्वतंत्रता हासिल की।