तिरंगे के पीछे की कहानी, 3 पीढ़ियों से बना रहे राष्ट्रीय ध्वज

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 13-08-2026
Delhi’s ‘Flag Uncle’ and the legacy of the Tricolour: A journey that began with the 1962 war—today, three generations are stitching the nation’s pride.
Delhi’s ‘Flag Uncle’ and the legacy of the Tricolour: A journey that began with the 1962 war—today, three generations are stitching the nation’s pride.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

स्वतंत्रता दिवस नजदीक आते ही पूरे देश में तिरंगे की मांग अचानक बढ़ जाती है। बाजार सजने लगते हैं, स्कूलों में तैयारियां शुरू हो जाती हैं, सरकारी और निजी दफ्तरों में राष्ट्रीय ध्वज पहुंचने लगते हैं और हर घर तिरंगा अभियान की यादें फिर ताजा हो जाती हैं। लेकिन जब देशभर में लाखों लोग गर्व से तिरंगा हाथ में थामते हैं, तब शायद ही किसी का ध्यान उन हाथों की ओर जाता है जो इस राष्ट्रीय ध्वज को तैयार करते हैं।

दिल्ली के सदर बाजार की एक पुरानी गली में ऐसा ही एक परिवार रहता है, जिसके लिए तिरंगा सिर्फ कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि कई दशकों से चली आ रही एक जिम्मेदारी, सम्मान और विरासत है। इसी परिवार ने 'फ्लैग अंकल' के नाम से मशहूर अब्दुल गफ्फार की पहचान बनाई और आज उनके निधन के बाद उनके भाई अब्दुल मलिक उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

1962 के भारत-चीन युद्ध से शुरू हुई थी यह कहानी

इस परिवार की तिरंगा बनाने की कहानी किसी कारोबारी योजना से नहीं, बल्कि देश के कठिन दौर से शुरू हुई थी। वर्ष 1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया, तब देशभर में राष्ट्रभक्ति का माहौल था और राष्ट्रीय ध्वज की जरूरत तेजी से बढ़ी। उसी समय इस परिवार ने तिरंगा बनाने का काम शुरू किया। जो काम उस दौर में देश की जरूरत को पूरा करने के लिए शुरू हुआ था, वही धीरे-धीरे परिवार की पहचान बन गया। समय बीतता गया, लेकिन तिरंगे से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा। आज तीन पीढ़ियां इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।

'फ्लैग अंकल' की पहचान बनी देशभक्ति की मिसाल

दिल्ली के सदर बाजार में अब्दुल गफ्फार को लोग प्यार से'फ्लैग अंकल' कहकर बुलाते थे। वर्षों तक उन्होंने तिरंगे तैयार किए और देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाए। उनका नाम सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय ध्वज बनाने वाले एक भरोसेमंद चेहरे के रूप में जाना जाने लगा। अब्दुल गफ्फार के निधन के बाद यह जिम्मेदारी उनके छोटे भाई अब्दुल मलिक ने संभाल ली। उनके साथ परिवार के अन्य सदस्य भी पूरी निष्ठा से इस काम में जुटे हुए हैं। उनके भाई, दामाद और परिवार के अन्य लोग आज भी उसी समर्पण के साथ तिरंगे तैयार करते हैं, जैसे दशकों पहले किया जाता था।

15 अगस्त से पहले सदर बाजार में बदल जाता है पूरा माहौल

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस इस परिवार के लिए सबसे व्यस्त समय होता है। 15 अगस्त करीब आते ही सदर बाजार की इस कार्यशाला में दिन-रात काम शुरू हो जाता है। हर तरफ अलग-अलग दृश्य दिखाई देते हैं:

  • कहीं केसरिया कपड़े की कटिंग हो रही होती है।
  • कहीं सफेद और हरे रंग के कपड़ों को तय अनुपात में काटा जा रहा होता है।
  • दूसरी ओर सिलाई मशीनें लगातार चलती रहती हैं।
  • कुछ लोग तैयार झंडों की पैकिंग में लगे रहते हैं।
  • पूरा माहौल तिरंगे के रंगों से सराबोर दिखाई देता है।

यहां काम करने वाले हर व्यक्ति की जिम्मेदारी तय होती है और स्वतंत्रता दिवस से पहले काम की रफ्तार कई गुना बढ़ जाती है।

कैसे तैयार होता है तिरंगा?

बाहर से देखने पर तिरंगा बनाना सामान्य सिलाई का काम लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह बेहद बारीकी और सटीकता की मांग करता है। पूरी प्रक्रिया कपड़े की कटिंग से शुरू होती है। सबसे पहले केसरिया, सफेद और हरे रंग के कपड़ों को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के निर्धारित अनुपात के अनुसार काटा जाता है। इसके बाद तीनों रंगों को सावधानीपूर्वक एक साथ जोड़ा जाता है। सिलाई के दौरान यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी हिस्से बिल्कुल सही अनुपात में रहें। अंतिम चरण में सफेद पट्टी के बीच अशोक चक्र लगाया जाता है। इसके बाद झंडे की गुणवत्ता की जांच होती है और फिर उसकी पैकिंग की जाती है। हर तिरंगे के पीछे मेहनत, धैर्य और बारीकी से किया गया काम छिपा होता है।

हर घर तिरंगा अभियान में एक दिन में बनाए थे डेढ़ लाख से ज्यादा तिरंगे

अब्दुल मलिक बताते हैं कि उनके परिवार ने कई बड़े ऑर्डर पूरे किए हैं, लेकिन सबसे यादगार समय 'हर घर तिरंगा' अभियान का था। उनके अनुसार, उस दौरान परिवार को बड़ी संख्या में राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने का ऑर्डर मिला। मांग इतनी ज्यादा थी कि पूरे परिवार को लगातार काम करना पड़ा। मलिक बताते हैं कि उस समय उनके यहांएक ही दिन में डेढ़ लाख से ज्यादा तिरंगेतैयार किए गए थे। यह आंकड़ा बताता है कि राष्ट्रीय पर्वों के दौरान इस परिवार के काम का दायरा कितना बढ़ जाता है।

देश ही नहीं, विदेशों तक पहुंचते हैं इनके बनाए तिरंगे

अब्दुल मलिक बताते हैं कि उनके यहां तैयार होने वाले तिरंगे केवल दिल्ली या आसपास के इलाकों तक सीमित नहीं रहते। देश के अलग-अलग राज्यों में इनकी सप्लाई होती है और कई तिरंगे विदेशों तक भी भेजे जाते हैं। यही वजह है कि सदर बाजार की यह छोटी-सी कार्यशाला आज राष्ट्रीय ध्वज निर्माण की एक महत्वपूर्ण पहचान बन चुकी है।

जब राजनाथ सिंह ने कहा: ऐसा झंडा बनाइए, जो पहले कभी नहीं बना

अब्दुल मलिक एक दिलचस्प किस्सा भी साझा करते हैं। उनके मुताबिक, एक बार रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उनसे ऐसा विशाल झंडा तैयार करने को कहा, जैसा पहले कभी नहीं बना हो। इसके बाद परिवार ने60×90 फीटका एक विशाल राष्ट्रीय ध्वज तैयार किया। मलिक बताते हैं कि इस झंडे से जुड़ी कहानी पाकिस्तान से भी जुड़ी हुई थी और यह उनके जीवन के सबसे यादगार अनुभवों में से एक है।

सीपी के सेंट्रल पार्क में लहराने वाला विशाल तिरंगा भी यहीं बना

दिल्ली के कनॉट प्लेस (सीपी) स्थित सेंट्रल पार्क में लगा विशाल राष्ट्रीय ध्वज राजधानी की पहचान बन चुका है। अब्दुल मलिक बताते हैं कि वहां लगाया गया झंडा भी उनके परिवार ने ही तैयार किया था। यह उनके लिए सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि गर्व का विषय है कि देश की राजधानी के प्रमुख स्थान पर लहराने वाला राष्ट्रीय ध्वज उनकी कार्यशाला में तैयार हुआ।

बाजारों से लेकर स्कूलों और घरों तक पहुंचते हैं इनके तिरंगे

स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस से पहले यहां तैयार होने वाले तिरंगे देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजे जाते हैं।

ये झंडे—

  • बाजारों में पहुंचते हैं।
  • स्कूलों में फहराए जाते हैं।
  • सरकारी और निजी कार्यालयों तक पहुंचते हैं।
  • घरों में राष्ट्रीय पर्व का हिस्सा बनते हैं।
  • विभिन्न संस्थानों और आयोजनों में इस्तेमाल किए जाते हैं।

जब देशभर में लाखों लोग तिरंगा फहराते हैं, तब उसके पीछे ऐसे ही कारीगरों की मेहनत और समर्पण छिपा होता है।

तीसरी पीढ़ी संभाल रही है विरासत

आज यह काम केवल अब्दुल मलिक तक सीमित नहीं है। उनके साथ उनके दामाद, भाई और परिवार की नई पीढ़ी भी इस जिम्मेदारी को निभा रही है। परिवार का कहना है कि यह विरासत अब तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है और वे चाहते हैं कि आने वाले वर्षों में भी यह परंपरा जारी रहे। उनके लिए तिरंगा बनाना केवल रोजगार नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जिम्मेदारी है।

15 अगस्त से पहले तिरंगे की मांग बढ़ी. (Photo: Screengrab)

हर तिरंगे में बसतीहै एक कहानी

जब कोई व्यक्ति बाजार से तिरंगा खरीदता है, तो उसके लिए वह कुछ मिनटों की खरीदारी हो सकती है। लेकिन उस तिरंगे के पीछे कई घंटे की मेहनत, वर्षों का अनुभव और तीन पीढ़ियों की विरासत जुड़ी होती है। सदर बाजार की इस कार्यशाला में कपड़े के तीन रंग आते हैं। उनकी कटिंग होती है। सिलाई होती है। अशोक चक्र लगाया जाता है। गुणवत्ता की जांच होती है। पैकिंग होती है और फिर वही तिरंगे देशभर के बाजारों, स्कूलों, दफ्तरों और घरों की ओर रवाना हो जाते हैं।

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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जब 15 अगस्त की सुबह देशभर में तिरंगा शान से लहराता है, तब उसके पीछे ऐसे ही अनगिनत हाथों की मेहनत होती है, जिनका नाम शायद मंचों पर नहीं लिया जाता, लेकिन जिनके बिना राष्ट्रीय पर्व का उत्सव अधूरा रह जाएगा। अब्दुल गफ्फार, जिन्हें दिल्ली ने प्यार से 'फ्लैग अंकल' कहा, आज इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी विरासत आज भी हर सिलाई, हर तिरंगे और हर राष्ट्रीय पर्व के साथ जीवित है। उनके भाई अब्दुल मलिक और पूरा परिवार उसी जिम्मेदारी के साथ देश की आन, बान और शान को आकार दे रहा है। इस स्वतंत्रता दिवस जब आप तिरंगा हाथ में लें, तो उन हाथों को भी याद कीजिए जिन्होंने उसे सम्मान के साथ तैयार किया है। क्योंकि हर तिरंगा केवल एक राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि देशभक्ति, समर्पण और विरासत की एक जीवंत कहानी भी है।