स्वतंत्रा की एक कहानी यह भी...तो शाहरूख खान ‘किंग खान’ नहीं बनते

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 09-08-2026
Here is another story about independence... otherwise, Shah Rukh Khan wouldn't be ‘King Khan’.
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मलिक असगर हाशमी

बात थोड़ी अजीब लग सकती है, लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज एक अनकही मोड़ न आया होता, तो आज दुनिया जिसे 'बॉलीवुड का बादशाह' कहती है, वह नाम शायद किसी गुमनाम गली में सिमटकर रह जाता। शाहरुख़ खान आज जिस बुलंदी पर हैं, उसकी बुनियाद भारत-पाकिस्तान बंटवारे के उस खौफनाक और सियासी दौर में रची गई थी, जिसने उनके पिता को अपना वतन छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

हाल ही में पाकिस्तान में उर्दू में प्रकाशित पुस्तक ‘मैं क्यों नहीं टूटा?’ में इस रहस्यमयी इतिहास से पर्दा उठा है। इस किताब के लेखक डॉ. मोहम्मद सुहैल खान हैं। उन्होंने यह पूरी दास्तान हाजी गुलाम अहमद बिलौर से दो सालों में हुई लंबी बातचीत और रिकॉर्डिंग्स के आधार पर लिखी है।

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अपने खास अंदाज में शाहरूख

यह कहानी आजादी से पहले के उस दौर की है, जब खैबर पख्तूनख्वा (तत्कालीन नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस) में आजादी की लहर दौड़ रही थी। उस दौर में तीन नौजवानों की दोस्ती के किस्से मशहूर थे--शाहरुख़ खान के पिता ताज मोहम्मद, हाजी गुलाम अहमद बिलौर के पिता बिलौर दीन और डॉ. अब्दुल कयूम खान।

तीनों का दिल भारत की आजादी के लिए धड़कता था। वे सभी कांग्रेस और खान अब्दुल गफ्फार खान ('बाचा खान') के ऐतिहासिक 'खुदाई खिदमतगार आंदोलन' से जुड़े हुए थे। देश प्रेम का यह धागा तीनों को मजबूती से बांधे हुए था।

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पुस्तक ‘ मैं क्यों नहीं टूटा’ का कवर पेज

लेकिन 1947 के बंटवारे ने रिश्तों और वफादारियों की तस्वीर बदल दी। मुस्लिम लीग का प्रभाव बढ़ा, तो राजनीतिक हवा को भांपते हुए डॉ. कयूम खान ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया और जिन्ना के साथ हो लिए। बंटवारे के बाद कयूम खान को खैबर पख्तूनख्वा का मुख्यमंत्री बना दिया गया। सत्ता के सिर चढ़ते ही कयूम खान अपने ही पुराने दोस्तों,ताज मोहम्मद और बिलौर दीन पर मुस्लिम लीग में शामिल होने का भारी राजनीतिक दबाव बनाने लगे।

ताज मोहम्मद उसूलों के पक्के इंसान थे। कयूम खान को हमेशा यह शक रहता था कि ताज मोहम्मद का दिल अब भी भारत में बसता है और वे कभी भी पाकिस्तान छोड़ सकते हैं। जब तमाम दबावों के बाद भी ताज मोहम्मद ने अपनी विचारधारा से समझौता करने और मुस्लिम लीग में शामिल होने से इनकार कर दिया, तो उनके साथ दुश्मनी का एक दौर शुरू हो गया।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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डॉ. कयूम खान ने अपने ही पुराने दोस्त को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। ताज मोहम्मद पर झूठे मुकदमे दर्ज किए गए, उन्हें प्रताड़ित किया गया और बार-बार जेल की सलाखों के पीछे धकेला गया। इस सियासी और नफरत भरे रवैये ने ताज मोहम्मद के स्वाभिमान को गहरी चोट पहुंचाई।

आखिरकार, जब बर्दाश्त की हद पार हो गई, तो भारी मन से ताज मोहम्मद ने अपनी मातृभूमि को अलविदा कहा और हमेशा के लिए भारत आ गए।भारत आकर उन्होंने नई जिंदगी की शुरुआत की, शादी की और इसी सरजमीं पर जन्म हुआ...शाहरुख़ खान का।

किताब में डॉ. सुहैल खान लिखते हैं कि अगर उस वक्त ताज मोहम्मद के साथ यह जुल्म न हुआ होता, उन्हें वह इज्जत मिली होती जिसके वे हकदार थे, तो शायद वे कभी पेशावर छोड़कर न आते। और अगर वे पाकिस्तान में ही रह जाते?

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दुर्लभ तस्वीर: छुटपन में शाहरूख खान अपने माता-पिता और बहन के साथ

तो शायद न शाहरुख खान भारत आते, न बॉलीवुड को अपना 'किंग' मिलता। क्योंकि पाकिस्तान की कला दुनिया में आज तक कोई भी कलाकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह बुलंदी नहीं हासिल कर पाया, जो शाहरुख ने भारत की मिट्टी पर हासिल की।इतिहास के एक ज़ुल्म ने भले ही ताज मोहम्मद से उनका वतन छीन लिया, लेकिन उसी मोड़ ने दुनिया को उसका सबसे बड़ा सुपरस्टार दे दिया।