मलिक असगर हाशमी
कहते हैं विरले ही होते हैं वे लोग, जिनकी अंतिम ख्वाहिश उनके जाने से पहले पूरी होती है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ कि एक शख्स ऐसा भी था, जिसने अपनी अंतिम इच्छा पूरी करते-करते ही दुनिया को अलविदा कह दिया, तो शायद आपको हैरत होगी।
मैं बात कर रहा हूँ भारत रत्न, पूर्व राष्ट्रपति और 'मिसाइल मैन' के नाम से मशहूर डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम की।
जब कलाम साहब का नाम आता है, तो हमारे जेहन में क्या आता है? एक महान वैज्ञानिक? मिसाइलों का जनक? पोखरण की परमाणु शक्ति? या फिर देश का सर्वोच्च नागरिक, 'पीपुल्स प्रेसिडेंट'?

क्या इन बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के बीच कभी आपने सोचा है कि उस महामानव की अपनी अंतिम ख्वाहिश क्या रही होगी? क्या वह विजन 2020 को पूरा होते देखना चाहते थे या फिर राष्ट्रपति भवन की सुख-सुविधाओं को?
यदि आप ऐसा सोच रहे हैं, तो रुक जाइए। उस सादगी की मूरत, उस तपस्वी की ख्वाहिश इन सबसे जुदा, बेहद साधारण लेकिन बेहद गहरी थी।
इस रहस्य पर से पर्दा उठाया है उनके करीबी सहयोगी सृजन पाल सिंह ने। सृजन, जो 2009 से 2015 तक डॉ.कलाम के सलाहकार रहे, उनके साथ कई कालजयी पुस्तकें लिखीं और आज कलाम फाउंडेशन के प्रबंध निदेशक हैं।
सृजन एक घटना का जिक्र करते हैं जो डॉ.कलाम के साथ काम करने वाले हर युवा के लिए एक रोजमर्रा का सबक थी। कलाम साहब अपने युवा सहकर्मियों से रोज एक ही सवाल पूछते थे, "भविष्य में तुम किस लिए याद किए जाना चाहते हो? इसके बारे में क्या सोचते हो?" और फिर जोड़ते, "इसका एक और बेहतर वर्जन (version) बताओ।"
उनका मकसद यह नहीं था कि वे युवाओं को सिर्फ एक नौकरी या करियर के बारे में सोचने पर मजबूर करें। वे चाहते थे कि हर युवा अपना एक ठोस रोड मैप बनाए, ताकि वे भविष्य में देश के लिए कुछ बेहतर कर सकें। उनके सवालों ने युवाओं को खुद को तलाशने और अपने लक्ष्य को ऊँचा उठाने की प्रेरणा दी।

युवा वैज्ञानिकों के जवाब अलग-अलग होते। कोई कहता, "मैं एक बड़ा वैज्ञानिक बनना चाहता हूँ," कोई, "मैं एक बेहतरीन वक्ता बनना चाहता हूँ," और यहाँ तक कि कुछ कहते, "मैं राजनीति में आना चाहता हूँ क्योंकि देश को विजनरी नेताओं की ज़रूरत है।"
सृजन पाल सिंह कहते हैं कि एक दिन, कलाम साहब के इस पुराने और लगातार पूछे जाने वाले सवाल का जवाब देते-देते उन्हें लगा कि अब उनके पास कहने को कुछ नया नहीं बचा है। वे सोच में पड़ गए कि आखिर इस महापुरुष को क्या जवाब दें। इसलिए, एक दिन जब कलाम साहब ने अपना वही पुराना सवाल दोहराया, तो सृजन ने इसके उलट एक सवाल कर दिया।
उन्होंने हिम्मत जुटाकर पूछा, "सर, पहले आप बताइए कि आपको भविष्य में किस लिए याद किया जाए ?"सृजन को लगा कि शायद कलाम साहब बुरा मान जाएंगे। इसलिए उन्होंने तुरंत ही अपने सवाल में चार विकल्प जोड़ दिए।
"सर, विकल्प (A) - 'स्पेस मैन ऑफ इंडिया' (Space Man of India), क्योंकि आपने अंतरिक्ष में सैटेलाइट छोड़े?"
"विकल्प (B) - 'मिसाइल मैन ऑफ इंडिया' (Missile Man of India), क्योंकि आपको काफी लोग मिसाइल मैन बोलते हैं?"
"विकल्प (C) - 'न्यूक्लियर मैन ऑफ इंडिया' (Nuclear Man of India), क्योंकि आपने भारत को परमाणु शक्ति दी?"
"या फिर, विकल्प (D) - 'पीपुल्स प्रेसिडेंट' (People’s President), क्योंकि जनता आपको दिल से प्यार करती थी?"
सृजन पाल सिंह ने ये चार विकल्प देकर डॉ.कलाम को एक दायरे में बाँधने की कोशिश की थी।
यह सुनकर डॉ.कलाम मुस्कुराए। उनकी वह जानी-पहचानी, निश्चल मुस्कान। फिर उन्होंने अंग्रेजी में कहा, जो वाक्य सृजन के लिए नहीं, बल्कि पूरी युवा पीढ़ी के लिए एक बड़ी नसीहत, एक महागुरु का महासंदेश बन गया।
उन्होंने थोड़ा रुककर कहा, "सृजन, मेरा जवाब इन चारों में से एक भी नहीं है।"
सृजन पाल सिंह हक्का-बक्का रह गए। वे सोचने लगे कि अब क्या बचा? क्या कुछ छूट गया? उन्होंने फिर पूछा, "सर, क्या कुछ छूट गया मुझसे?"
इस पर कलाम ने कहा, "इस सवाल का एक और ऑप्शन है - ऑप्शन नंबर (E)।"
फिर थोड़ा रुककर जो उन्होंने कहा, वह आज के हर युवा के लिए एक बड़ी सीख है। डॉ.कलाम ने कहा, "E' का मतलब है - एजुकेशन (Education)। मैं चाहता हूँ कि दुनिया मुझे एक शिक्षक के रूप में याद रखे।"
वे शिक्षक क्यों बनना चाहते थे? इस बारे में उन्होंने बताना शुरू किया। उन्होंने कहा, "शिक्षक दूसरों की ज़िंदगी में रोशनी फैलाता है। शिक्षक ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं। शिक्षक ही हैं जो भारत को डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर, पॉलिटिकल लीडर, आईएएस ऑफिसर्स सब बनाते हैं।"
फिर उन्होंने आगे कहा, "शिक्षक ही समाज बनाने वाले होते हैं। द्रोणाचार्य ने ही अर्जुन को बनाया था। इसलिए मुझे लगता है कि मेरी इच्छा है कि राष्ट्र मुझे एक शिक्षक के रूप में याद रखे।"
2008 में IIM अहमदाबाद में डॉ कलाम के स्टूडेंट के तौर सृजन पाल सिंह की पहली क्लास. तस्वीरें सृजन पाल के सोशल मीडिया हैंडल से
राष्ट्रपति भवन से निकलते ही, डॉ.कलाम अगले ही दिन चेन्नई रवाना हो गए। वे अक्सर कहते थे कि पढ़ाना उनका असली जुनून है। वे विजिटिंग प्रोफेसर (Visiting Professor) के रूप में आईआईएम शिलांग, आईआईएम अहमदाबाद और आईआईएम इंदौर जैसे संस्थानों में गए।
वे अन्ना यूनिवर्सिटी में एरोस्पेस इंजीनियरिंग (Aerospace Engineering) के मानद प्रोफेसर रहे। वे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IIST), तिरुवनंतपुरम के चांसलर (Chancellor) के तौर पर छात्रों का मार्गदर्शन करते रहे।
वे आखिरी पल तक छात्रों से मिलते रहे। 27 जुलाई 2015 को, आईआईएम शिलांग में छात्रों को लेक्चर देते समय ही कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest) से उनका निधन हो गया।
डॉ.कलाम की यह कहानी हमें सिखाती है कि पद, प्रतिष्ठा, और सफलता सब एक तरफ, लेकिन एक गुरु का सम्मान सबसे ऊपर है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जीवन में लक्ष्य सिर्फ एक अच्छी नौकरी या करियर नहीं होना चाहिए, बल्कि दूसरों की ज़िंदगी में रोशनी फैलाना और राष्ट्र निर्माण में योगदान देना होना चाहिए।