ज़ाकिर हुसैन

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 05-01-2026
Dancer, devotee, and citizen: Social change reflected in Zakir Hussain's struggles.
Dancer, devotee, and citizen: Social change reflected in Zakir Hussain's struggles.

 

fल्पना कीजिए एक छोटे से बच्चे की, जो अकेले में खुशी-खुशी नाचता रहता है। यह दृश्य उसके माता-पिता के लिए हैरानी और चिंता दोनों का कारण बनता है। जैसे-जैसे वह बच्चा बड़ा हुआ, वैसे-वैसे नृत्य के प्रति उसका प्रेम भी बढ़ता गया। यह सफर आसान नहीं था, खासकर तब, जब वह बच्चा सलेम में रहने वाले एक पारंपरिक उर्दू-भाषी मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखता था। यह बच्चा था ज़ाकिर हुसैनआवाज द वाॅयस की खास सीरिज द चेंज मेकर्स के लिए ज़ाकिर हुसैन पर यह विशेष स्टोरी हमारी वरिष्ठ सहयोगी श्रीलता एम ने कोयंबटूर से की हैI

fआज 55 वर्ष की उम्र में ज़ाकिर हुसैन एक प्रसिद्ध भरतनाट्यम कलाकार हैं और तमिलनाडु के कला एवं संस्कृति विभाग के मानद निदेशक भी हैं।

अपने बचपन को याद करते हुए हुसैन बताते हैं कि उनका परिवार तेलंगाना से तमिलनाडु आया था।

घर में उर्दू बोली जाती थी और बाहर तमिल। उनके पिता को नृत्य में उनकी रुचि बिल्कुल पसंद नहीं थी।

समाज की अपेक्षाओं के अनुसार उन्होंने कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की, लेकिन मन अशांत ही रहा।

“मुझे लगा कि नृत्य ही मेरा असली रास्ता है,” हुसैन कहते हैं। 20 साल की उम्र तक उन्होंने कभी औपचारिक नृत्य प्रशिक्षण नहीं लिया था। फिर भी वे घर छोड़कर चेन्नई चले गए, सिर्फ़ एक नृत्य गुरु की तलाश में।

संघर्ष का दौर शुरू हुआ। खर्च चलाने के लिए उन्होंने एक होटल में नौकरी की और प्रसिद्ध नृत्यांगना चित्रा विश्वेश्वरन से मिलने की कोशिश करते रहे।

आखिरकार मुलाकात हुई। “चित्रा मैडम ने मुझे बिना फीस के सिखाया और हर महीने 250 रुपये का वजीफा भी दिया,” हुसैन याद करते हैं।

परिवार के विरोध पर वे कहते हैं कि उस समय वे अकेले रहते थे, इसलिए ज्यादा परवाह नहीं की। उन्होंने शादी भी नहीं की और युवावस्था का बड़ा हिस्सा विदेशों में बिताया। करीब 14 साल तक वे कनाडा, स्विट्ज़रलैंड और जर्मनी में रहे, जहां भारतीयों को नृत्य सिखाते थे। “विदेशों में मुझे पहचान मिली,” वे कहते हैं।
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एक पुरुष मुस्लिम शास्त्रीय नर्तक होने के बावजूद लंबे समय तक उन्हें ज्यादा दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन हाल के वर्षों में स्थितियां बदल गईं।

अब ज़ाकिर हुसैन ने नृत्य से हटकर राजनीति में आने का फैसला किया है। वे कहते हैं, “मेरी यात्रा अब राजनीति की ओर है,” और उन्होंने DMK से जुड़ने का निर्णय लिया है। उनका मानना है कि देश का सामाजिक-राजनीतिक माहौल और कला-संगीत का क्षेत्र—दोनों गिरावट के दौर से गुजर रहे हैं।

वे बताते हैं कि 1980-90 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में नृत्य में अवसर और सम्मान दोनों थे। आज हालात बदतर हैं। “अब लोगों को कार्यक्रम में बुलाना पड़ता है।

दर्शक सिर्फ़ नर्तक या उनके माता-पिता होते हैं। आम जनता की रुचि खत्म हो गई है,” वे कहते हैं। कोरोना के बाद स्थिति और खराब हो गई—अब 20-25 दर्शक भी मुश्किल से आते हैं, जबकि पहले 800-900 लोग आते थे।

उनका मानना है कि युवा पीढ़ी का अतीत से जुड़ाव टूट गया है। आईटी सेक्टर में काम करने वाला 23 साल का युवक लाखों कमा सकता है, लेकिन नर्तक के लिए ऐसा संभव नहीं।

इसलिए कला प्रासंगिक नहीं रह गई है। साथ ही समय की मांग के अनुसार कला को छोटा और सतही बनाया जा रहा है—दो घंटे के कार्यक्रम अब 20 मिनट में सिमट गए हैं।

ज़ाकिर हुसैन आंडाल की कथा पर अपनी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं। वे समय-समय पर श्रीरंगम के रंगनाथस्वामी मंदिर को दान भी देते रहे हैं। हाल में कुछ समूहों ने मंदिर को उनसे दान लेने से रोकने की कोशिश की। “अब मेरी पहचान ही समस्या बन गई है,” वे कहते हैं। “2014 से पहले मुझे कभी दिक्कत नहीं हुई। अब मेरा नाम मेरे नृत्य से बड़ा हो गया है।”
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वे कहते हैं कि अगर कोई मुस्लिम गलती करे तो उसे दोषी ठहराया जाता है, और अगर शांति की बात करे तो उसे स्वीकार नहीं किया जाता। उन्हें जो सम्मान और सुरक्षा कहीं और नहीं मिली, वह डीएमके में मिली। “डीएमके सामाजिक न्याय में विश्वास रखती है। यहां मुझे बराबरी का सम्मान मिला,” वे कहते हैं।

आज वे तमिलनाडु में नृत्य और संगीत विद्यालयों से जुड़े हैं। भविष्य की योजनाओं पर वे कहते हैं कि वे योजना में विश्वास नहीं करते। “मेरी इच्छा बस यही है कि हर कलाकार को सीखने और मंच पर आने का अधिकार मिले। कला को चुनना या न चुनना,यह व्यक्ति का अपना फैसला होना चाहिए।”
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अंत में वे कहते हैं कि देश ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ से दूर होकर आपसी डर और टकराव की ओर बढ़ रहा है। उनकी यह यात्रा—नृत्य से सामाजिक न्याय तक—इसी चिंता और उम्मीद की कहानी है।