आवाज द वाॅयस/नई दिल्ली
तमिलनाडु की धरती से निकले ये दस मुस्लिम पुरुष और महिलाएँ आज अपने-अपने क्षेत्रों में बदलाव की मिसाल बन चुके हैं। कोई पर्यावरण संरक्षण में जुटा है, कोई कला और साहित्य के ज़रिये समाज से सवाल कर रहा है, तो कोई शिक्षा, राजनीति, भाषा, या महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में नई राहें खोल रहा है। इन सभी की एक समान पहचान है ये लोग अपने आरामदायक दायरे से बाहर निकलकर समाज के लिए काम कर रहे हैं और दूसरों को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहे हैं।
1. मोहम्मद सलीम
मोहम्मद सलीम को तमिलनाडु का अपना “सलीम अली” कहा जाए तो गलत नहीं होगा। उन्होंने अपना पूरा जीवन संकटग्रस्त पक्षियों और अन्य जीवों को बचाने में लगा दिया। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने कभी जीवविज्ञान या संरक्षण से जुड़ी औपचारिक पढ़ाई नहीं की। वे कंप्यूटर साइंस के छात्र रहे, लेकिन उनका मन हमेशा बेज़ुबान जीवों—पक्षियों, सांपों, कुत्तों और अन्य जानवरों—की सुरक्षा में लगा रहा। इसी जुनून के चलते उन्होंने “एनवायरनमेंट कंज़र्वेशन ग्रुप” नाम से एक एनजीओ शुरू किया, जो आज देशभर में वन्यजीव संरक्षण के लिए सक्रिय है।
2. सोफिया अशरफ
सोफिया अशरफ सिर्फ़ एक रैप सिंगर नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की आवाज़ हैं। उन्होंने अपनी कला का इस्तेमाल महिला सशक्तिकरण, सामाजिक भेदभाव और कॉरपोरेट जवाबदेही जैसे मुद्दों को उठाने के लिए किया। चेन्नई की गलियों से निकली उनकी रैप गायकी महिलाओं के शरीर, उनकी पहचान और समाज में उनके स्थान को लेकर बने टैबू को चुनौती देती है। भोपाल गैस त्रासदी पर यूनियन कार्बाइड के खिलाफ उनका रैप वीडियो कला और सामाजिक चेतना का ऐतिहासिक उदाहरण माना जाता है।
3. ज़ाकिर हुसैन
ज़ाकिर हुसैन ने भरतनाट्यम जैसे शास्त्रीय नृत्य में न सिर्फ़ लैंगिक बल्कि सामुदायिक दीवारें भी तोड़ीं। एक मुस्लिम पुरुष होकर इस नृत्य शैली को अपनाना अपने आप में एक साहसिक कदम था। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा विदेशों,कनाडा, स्विट्ज़रलैंड और जर्मनी—में बिताया, जहाँ उन्होंने भारतीयों को नृत्य सिखाया और प्रदर्शन किए। आज वे डीएमके के साथ राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में भी सक्रिय हैं और सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में काम कर रहे हैं।
4. फातिमा मुज़फ्फर अहमद
फातिमा मुज़फ्फर अहमद 2022 के तमिलनाडु स्थानीय निकाय चुनावों में चेन्नई कॉरपोरेशन से आईयूएमएल की इकलौती विजेता रहीं। पूरे राज्य में चुनी गई छह मुस्लिम महिला पार्षदों में उनका नाम खास है। वे एक राजनीतिक परिवार से आती हैं,उनके पिता ए.के. अब्दुल समद लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य रह चुके हैं। इसके बावजूद सार्वजनिक सेवा का रास्ता उन्होंने अपनी इच्छा से चुना और आज जमीनी राजनीति में सक्रिय हैं।
5. कीरनूर जाकिरराजा
कीरनूर जाकिरराजा समकालीन तमिल साहित्य के एक अहम लेखक हैं। उनकी लेखनी आम आदमी की ज़िंदगी, खासकर हाशिये पर पड़े मुस्लिम समुदाय की पीड़ा और संघर्ष को सामने लाती है। उनके उपन्यासों में तमिलनाडु और कभी-कभी केरल के वंचित तबकों की सच्ची झलक मिलती है। उनकी साफ़गोई और बेबाक अंदाज़ कई बार रूढ़िवादी सोच को असहज करता है, लेकिन यही उनकी लेखन शक्ति भी है।
6. निखत फातिमा सोहैल
निखत फातिमा सोहैल चेन्नई के एमडब्ल्यूए मैट्रिकुलेशन स्कूल की प्रमुख हैं। इसके साथ ही वे अकादमी फॉर वीमेन की सह-अध्यक्ष हैं और मुस्लिम युवाओं व महिलाओं की शिक्षा के लिए काम करने वाले कई संगठनों से जुड़ी हैं। उनका मानना है कि शिक्षा ही वह साधन है, जिससे समुदाय का भविष्य बदला जा सकता है।
7. नवाबज़ादा मोहम्मद आसिफ अली
नवाबज़ादा मोहम्मद आसिफ अली, अर्कोट के शाही परिवार के वारिस हैं और समाजसेवा व साम्प्रदायिक सौहार्द का जाना-पहचाना चेहरा हैं। वे एक प्रतिभाशाली संगीतकार भी हैं। अर्कोट फाउंडेशन के ज़रिये गरीबों के लिए राहत कार्य,अंतरधार्मिक संवाद और मानवीय पहलें लगातार चलती रहती हैं। धर्म से परे ज़रूरतमंदों की मदद करना उनकी पहचान है।
8. मोहम्मद उस्मान
मोहम्मद उस्मान ने मदरसा इमदादिया की स्थापना कर नेत्रहीन और दिव्यांग छात्रों के लिए शिक्षा का रास्ता खोला। अशरफ खान, जो जन्म से नेत्रहीन हैं और आज चेन्नई के एक निजी कॉलेज में तमिल पढ़ाते हैं, अपनी सफलता का श्रेय मोहम्मद उस्मान को देते हैं। ब्रेल के माध्यम से शिक्षा और ब्रेल पुस्तकों के प्रकाशन ने सैकड़ों ज़िंदगियों को नई दिशा दी है।
9. महमूद अक़रम
महमूद अक़रम एक असाधारण प्रतिभा हैं। मात्र 19 वर्ष की उम्र में वे लगभग 400 भाषाएँ पढ़-लिख सकते हैं और 46 भाषाओं में धाराप्रवाह हैं। बचपन से ही भाषाओं के माहौल में पले-बढ़े अक़रम ने कम उम्र में कई रिकॉर्ड बनाए और भारत का नाम रोशन किया।
10. शरीफ़ा खानम
शरीफ़ा खानम महिला सशक्तिकरण के लिए काम करने वाली संस्था “स्टेप्स” की संस्थापक हैं। वे मुस्लिम महिलाओं के लिए एक मस्जिद शुरू करने की दिशा में भी काम कर रही हैं। उनका मानना है कि तलाक, घरेलू हिंसा और भरण-पोषण जैसे मामलों में महिलाओं को न्याय के लिए सही मंच नहीं मिलता। वे पुरुष-प्रधान जमातों की आलोचना करते हुए महिलाओं को सम्मान और न्याय दिलाने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं।
इन दस चेंजमेकर्स की कहानियाँ बताती हैं कि बदलाव किसी एक रास्ते से नहीं आता। कोई कला से, कोई शिक्षा से, कोई सेवा और संघर्ष से समाज को बेहतर बनाने में लगा है। तमिलनाडु के ये मुस्लिम चेहरे न सिर्फ़ अपने समुदाय, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा हैं।