एक और सलीम: जिसने खामोश परिंदों के लिए अपनी ज़िंदगी समर्पित कर दी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 02-01-2026
Another Salim: who dedicated his life to the silent birds.
Another Salim: who dedicated his life to the silent birds.

 

hhhhhह भी एक सलीम हैं,लेकिन पहचान सिर्फ़ नाम की नहीं, काम की है। जैसे भारत के प्रसिद्ध ‘बर्डमैन’ सलीम अली ने पक्षियों को अपनी ज़िंदगी समर्पित की, वैसे ही मोहम्मद सलीम ने भी खामोश प्रजातियों—पक्षियों, जानवरों और प्रकृति की सेवा को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया। फर्क सिर्फ़ इतना है कि मोहम्मद सलीम ने न तो संरक्षण जीवविज्ञान पढ़ा और न ही किसी विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान की डिग्री ली। उन्होंने वही रास्ता चुना, जो उनके दौर के ज़्यादातर युवाओं ने चुना-कंप्यूटर साइंस में डिग्री और एक सुरक्षित करियर की ओर बढ़ना।

लेकिन सलीम का दिल हमेशा किसी और ही दुनिया में बसता रहा। एक ऐसी दुनिया में, जहां बोल न सकने वाले जीव-पक्षी, सांप, कुत्ते और दूसरे जानवर-मानव लापरवाही की कीमत चुका रहे थे। यही बेचैनी उन्हें उस रास्ते पर ले गई, जहां से वापसी संभव नहीं थी।

इसी भावना के साथ उन्होंने एक गैर-सरकारी संगठन की नींव रखी ‘द एनवायरनमेंट कंज़र्वेशन ग्रुप (ईसीजी)’ ताकि लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने के लिए योजनाबद्ध, ज़मीनी और व्यावहारिक काम किया जा सके।

आवाज़ द वॉयस की विशेष श्रृंखला ‘द चेंज मेकर्स’ के लिए कोयंबटूर से हमारी वरिष्ठ सहयोगी श्रीलता एम ने मोहम्मद सलीम के इस असाधारण सफ़र को क़लमबद्ध किया है—एक ऐसे इंसान की कहानी, जिसने आरामदायक करियर की बजाय ज़िम्मेदारी और संघर्ष का रास्ता चुना।
o

पिछले कुछ वर्षों में मोहम्मद सलीम और उनकी संस्था ईसीजी ने पक्षियों और जानवरों की संकटग्रस्त प्रजातियों को लेकर देशभर में कई उल्लेखनीय अभियान चलाए हैं। इन अभियानों का मक़सद सिर्फ़ आंकड़े इकट्ठा करना नहीं था, बल्कि लोगों की सोच बदलना था। कॉरपोरेट प्रायोजकों की मदद से उन्होंने पूरे भारत में चार ‘सीक एक्सपीडिशन’ शुरू किए—ऐसे अभियान, जिनमें ज़मीनी अध्ययन, दस्तावेज़ीकरण और व्यापक जन-जागरूकता को एक साथ जोड़ा गया।

इन अभियानों के दौरान सलीम और उनकी टीम ने अलग-अलग इलाकों में संकटग्रस्त प्रजातियों की स्थिति का अध्ययन किया, अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक की और स्कूलों, कॉलेजों, स्थानीय प्रशासन और पंचायत स्तर तक यह जानकारी पहुंचाई। उनका मानना था कि जब तक आम लोग नहीं समझेंगे, तब तक संरक्षण सिर्फ़ काग़ज़ों में ही सिमटा रहेगा।

ईसीजी एक पशु और पक्षी-केंद्रित संस्था है, इसलिए सलीम को लगातार रेस्क्यू से जुड़े फोन आते रहते हैं। वे बताते हैं,“लोग फोन करते हैं कि मोर फंस गया है या सांप आ गया है। लेकिन हम ऐसे मामलों को उन संस्थाओं को सौंप देते हैं, जो विशेष रूप से रेस्क्यू का काम करती हैं। हमारा फोकस बचाव से ज़्यादा जागरूकता पर है—क्योंकि अगर सोच बदल जाए, तो रेस्क्यू की ज़रूरत ही कम पड़ जाएगी।”

सलीम ने अपने काम की शुरुआत सांपों से की थी। उस दौर में सांपों को लेकर डर और अंधविश्वास सबसे ज़्यादा था। लेकिन समय के साथ उनका ध्यान प्रवासी पक्षियों की ओर गया—खासकर इंडियन पिट्टा जैसे पक्षियों की ओर, जो पर्यावरण संतुलन का अहम हिस्सा हैं।

99999

 

वे कहते हैं,“हमें फोन आते हैं जब पक्षी गिर जाते हैं, उड़ नहीं पाते या बिजली के तारों से झुलस जाते हैं। अब ज़्यादातर कॉल कोयंबटूर के आसपास मोरों से जुड़े होते हैं।”इन मामलों को भी वे ज़्यादातर दूसरी रेस्क्यू संस्थाओं तक पहुंचा देते हैं।

लेकिन सलीम का सपना इससे कहीं बड़ा था। वे तात्कालिक समाधान नहीं, बल्कि दीर्घकालिक बदलाव चाहते थे। इसी सोच के तहत 2009 में उन्होंने अपने साथियों के साथ पहला सीक एक्सपीडिशन शुरू किया। इसका उद्देश्य था—दुर्लभ प्रजातियों के बारे में लोगों को बताना और यह समझाना कि उन्हें बचाना क्यों ज़रूरी है। हर अभियान की एक अलग थीम तय की गई।

पहला अभियान उन जानवरों पर केंद्रित था, जो हर साल सड़कों पर गाड़ियों से कुचलकर मारे जाते हैं। सलीम बताते हैं,“हमने जंगल इलाकों में फ्लाईओवर बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, ताकि इंसान और जानवर आमने-सामने न आएं.” 
2015 में पांच लोगों की टीम सड़कों पर निकली, सड़क हादसों में मारे गए जानवरों की तस्वीरें लीं, उन्हें दस्तावेज़ किया और फिर आसपास के सरकारी स्कूलों में जाकर बच्चों और स्थानीय लोगों से बातचीत की।

उन्होंने साफ़ कहा,सड़कों पर जानवरों को खाना न दें, क्योंकि यही आदत उनकी मौत की वजह बनती है। पोस्टर और पर्चों के ज़रिए यह संदेश दिया गया कि जानवर इंसानों पर निर्भर नहीं हैं; वे खुद अपना भोजन खोज सकते हैं। इस अभियान को महिंद्रा मोटर्स और फोर्स मोटर्स का सहयोग मिला।
9999999

दूसरा सीक एक्सपीडिशन हिमालय की तराई और उत्तर-पूर्व भारत पर केंद्रित था। उत्तर-पूर्व इसलिए भी खास था क्योंकि वहां भारत के ‘फॉरेस्ट मैन’ जादव पायेंग ने एक बंजर रेतीले इलाके को जंगल में बदल दिया था।सलीम कहते हैं,“उनसे मिलना मेरे लिए ज़िंदगी बदल देने वाला अनुभव था.” आईआईटी गुवाहाटी के छात्रों ने भी इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यहां सबसे बड़ी चुनौती थी पारंपरिक शिकार, जो प्रवासी पक्षियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा था। सलीम और उनकी टीम ने अमूर फाल्कन के संरक्षण को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया,यह पक्षी साइबेरिया से उड़कर उत्तर-पूर्व भारत में कुछ हफ्ते रुकता है और फिर अफ्रीका चला जाता है। वे कहते हैं,“इस दौरान उसकी सुरक्षा बेहद ज़रूरी है। हमने लोगों को समझाया और यह अभियान सफल रहा.”

तीसरा अभियान राजस्थान में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पर केंद्रित था, जो हाई-टेंशन तारों और पवनचक्कियों से टकराकर मारे जा रहे थे।सलीम बताते हैं,“ये बहुत बड़े पक्षी होते हैं और समय पर दिशा नहीं बदल पाते.” इस मुद्दे को मीडिया और जनहित याचिकाओं के ज़रिए उठाया गया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसके बाद हाई-टेंशन तारों को ज़मीन के नीचे डालने और पवनचक्कियों को चमकीले रंगों में रंगने के निर्देश दिए गए।

2019 में चौथा सीक एक्सपीडिशन जर्मनी की ऑप्टिकल कंपनी कार्ल ज़ाइस के सहयोग से शुरू हुआ, लेकिन चुनावों के कारण इसे बीच में रोकना पड़ा। बाद में दक्षिण भारत में इसे दोबारा शुरू किया गया। सलीम कहते हैं,“यहां शिकार कम है, जागरूकता ज़्यादा है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या तेज़ी से खत्म होता प्राकृतिक आवास है.” 
hhhhhhh

फंड की कमी अब सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। वे मुस्कराते हुए लेकिन मायूसी से कहते हैं,“हम संरक्षण में अच्छे हैं, लेकिन मार्केटिंग में कमजोर.” जलवायु परिवर्तन, तटीय कटाव और जंगलों का सिकुड़ना—इन सब पर काम करने के लिए संसाधन चाहिए। वे कहते हैं,“साल भर के अभियान के लिए हमें करीब 15 लाख रुपये चाहिए। यह कंपनियों के लिए बहुत बड़ी रकम नहीं है, बस प्राथमिकता की ज़रूरत है.” 

ALSO AI VIDEO:

अब मोहम्मद सलीम केरल के उत्तरी हिस्से के आदिवासी और वर्षावन क्षेत्र अट्टापाड़ी में बसने की तैयारी कर रहे हैं।  वे कहते हैं,“मैं वहीं जाकर पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर काम करना चाहता हूं.”कोयंबटूर में दशकों से चल रहे अपने काम को समेटते हुए वे जोड़ते हैं,“हम सब शिफ्ट हो रहे हैं,”और इस ‘हम’ में उनका संगठन, उनका परिवार और वह सपना शामिल है, जो अब भी उड़ान भर रहा है,बिल्कुल उन पक्षियों की तरह, जिनके लिए उन्होंने अपनी ज़िंदगी समर्पित कर दी।