Indian government bond yields rise “only partially” despite global pressures: RBI Governor
नई दिल्ली
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि ग्लोबल एनर्जी की कीमतों और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के बावजूद भारतीय सरकारी बॉन्ड यील्ड में "केवल थोड़ी" बढ़ोतरी हुई है। यह समझदारी भरे फिस्कल मैनेजमेंट, भरोसेमंद मॉनेटरी पॉलिसी और स्ट्रक्चरल महंगाई के दबाव में कमी को दिखाता है। 5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए मल्होत्रा ने कहा कि सॉवरेन बॉन्ड पर मार्क-टू-मार्केट नुकसान बैलेंस शीट को कमजोर कर सकते हैं, खासकर ऐसे समय में जब फिस्कल दबाव सरकारों की मुश्किल में फंसे बैंकों की मदद करने की क्षमता को सीमित कर सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि उभरते बाजारों, खासकर उन बाजारों में जहां गैर-निवासियों के पास भारी मात्रा में सॉवरेन कर्ज है, 'कैरी ट्रेड' के खत्म होने पर कैपिटल आउटफ्लो (पूंजी की निकासी) का सामना करना पड़ सकता है। भारत के संदर्भ में उन्होंने कहा, "ग्लोबल एनर्जी की कीमतों और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के जवाब में भारतीय सरकारी बॉन्ड यील्ड में केवल थोड़ी बढ़ोतरी हुई है। यह फिस्कल मैनेजमेंट में समझदारी को दर्शाता है क्योंकि सरकार फिस्कल कंसोलिडेशन के रास्ते पर आगे बढ़ रही है। साथ ही, यह भरोसेमंद मॉनेटरी पॉलिसी और महंगाई पर स्ट्रक्चरल दबाव में कमी का एक स्वीकृत प्रमाण है।"
ग्लोबल इकोनॉमी पर टिप्पणी करते हुए RBI गवर्नर ने कहा कि इसने COVID-19 महामारी के बाद से कई झटकों का सामना किया है, जबकि भारत ने लंबे समय तक फाइनेंशियल स्टेबिलिटी का अनुभव किया है। हालांकि, उन्होंने असावधानी के प्रति आगाह करते हुए कहा कि लंबे समय तक स्टेबिलिटी रहने से अधिक जोखिम लेने और लीवरेज (उधार लेकर निवेश) को बढ़ावा मिल सकता है और समझदारी बरतने की इच्छा कम हो सकती है।
"लंबे समय तक स्टेबिलिटी जोखिम लेने और लीवरेज को बढ़ावा दे सकती है, जबकि समृद्धि की यादें समझदारी बरतने की इच्छा को कमजोर कर सकती हैं। ऐसा नहीं है कि मुझे तनाव के कोई तत्काल संकेत दिख रहे हैं, लेकिन हमें इन जोखिमों के प्रति सतर्क रहने की जरूरत है।"
मल्होत्रा ने एसेट वैल्यूएशन में अत्यधिक बढ़ोतरी, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेक्टर में, से जुड़े जोखिमों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि AI इन्वेस्टमेंट साइकिल ने ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट को काफी सहारा दिया है, खासकर विकसित अर्थव्यवस्थाओं में जहां मजबूत कमाई ने AI से जुड़ी इक्विटी में बढ़त को बढ़ावा दिया है।
हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि जैसे-जैसे इन्वेस्टमेंट साइकिल परिपक्व होगा, AI पर खर्च या कमाई में किसी भी तरह की सुस्ती फाइनेंशियल एसेट्स की कीमतों में भारी बदलाव (रीप्राइसिंग) का कारण बन सकती है, खासकर AI वैल्यू चेन में। उन्होंने कहा, "ज़्यादा रिस्क लेने की इच्छा के कारण लेवरेज (उधार लेकर निवेश) बढ़ा है। बड़ी AI कंपनियों में घटते कैश फ़्लो के साथ मिलकर, यह मार्केट में गिरावट और फ़ाइनेंशियल मार्केट में उतार-चढ़ाव को और बढ़ा सकता है।"
मल्होत्रा ने विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ते लेवरेज की ओर भी इशारा किया, जहाँ हेज फ़ंड, ऑप्शन सेलर, एक्सचेंज-ट्रेडेड फ़ंड और अन्य नॉन-बैंक फ़ाइनेंशियल मध्यस्थ ज़्यादा रिटर्न पाने के लिए इक्विटी और बॉन्ड मार्केट में लेवरेज बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने कहा, "बढ़ता लेवरेज फ़ाइनेंशियल साइकल के परिपक्व होने का संकेत है। यह चिंता की बात है, खासकर तब जब इक्विटी वैल्यूएशन पर दबाव हो और बैंकों व NDFI के बीच लायबिलिटी और एसेट दोनों तरफ़ आपसी जुड़ाव गहरा हो गया हो। इसलिए, फ़ाइनेंशियल स्थितियों में किसी भी तरह की सख्ती का असर बैंकों और अन्य मार्केट पर भी पड़ सकता है।"