मलिक असगर हाशमी
भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में इस्लामिक ज्ञान और रूहानियत की जब भी बात होगी, तो उत्तर प्रदेश के बरेली शहर का नाम सबसे पहले आएगा। बरेली सिर्फ एक शहर नहीं है बल्कि यह पूरी दुनिया में फैले अहले सुन्नत वल जमात का सबसे बड़ा मरकज (केंद्र) माना जाता है। इसी पवित्र धरती पर एक ऐसी महान शख्सियत ने जन्म लिया, जिसने अपनी पूरी जिंदगी इस्लाम की सच्ची खिदमत और समाज को सही रास्ता दिखाने में लगा दी।
हम बात कर रहे हैं आलमी शोहरत याफ्ता मुफ्ती मोहम्मद अख्तर रजा खान अजहरी की, जिन्हें पूरी दुनिया में बहुत ही अदब और एहतराम के साथ 'ताजुश शरिया' और 'अझहरी मियां' के नाम से पुकारा जाता है।
23 नवंबर 1943 को बरेली शरीफ में पैदा हुए ताजुश शरिया का रूहानी सफर और उनका जीवन आज भी करोड़ों लोगों के लिए एक मशाल की तरह है। 20 जुलाई 2018 को इस दुनिया से पर्दा कर जाने के बाद भी उनकी यादें और उनका काम आज भी जिंदा है।
आला हजरत खानदान से गहरा रूहानी ताल्लुक
मुफ्ती अख्तर रजा खान का जन्म कोई आम जन्म नहीं था। वह एक ऐसे रूहानी और इल्मी घराने में पैदा हुए थे जिसकी जड़ें बहुत गहरी थीं। वह बरेलवी आंदोलन के संस्थापक और 14वीं सदी के महान मुजद्दिद इमाम अहमद रजा खान (आला हजरत) के परपोते थे।
उनके वालिद मुफस्सिर-ए-आजम हिंद हजरत जिलानी मियां थे। उनका ननिहाल भी उतना ही ऊंचा था। उनकी वालिदा मुफ्ती-ए-आजम हिंद मुस्तफा रजा खान की बेटी थीं। इस तरह मुफ्ती अख्तर रजा खान को अपने माता और पिता दोनों ही पक्षों से आला हजरत का सीधा खून और रूहानी आशीर्वाद मिला था। बचपन से ही उन पर इस महान इल्मी घराने का गहरा असर दिखने लगा था। वह स्वभाव से बहुत ही शांत, मुत्तकी और परहेजगार थे।
बचपन की पढ़ाई और काहिरा की अल अजहर यूनिवर्सिटी का सफर
मुफ्ती अख्तर रजा खान की शुरुआती तालीम घर के बड़े बुजुर्गों और उलेमा की देखरेख में हुई। इसके बाद उन्हें बरेली के मशहूर मदरसे दारुल उलूम मंजर-ए-इस्लाम में दाखिल कराया गया। यहाँ उन्होंने मीजान, मुनशइब और नोहमीर जैसी बुनियादी किताबों से शुरुआत की।
फिर उन्होंने हिदाया आखिरैन जैसी बहुत ही कठिन और उच्च स्तर की किताबों का अध्ययन किया। उनका दिमाग बहुत तेज था और वह हर बात को बहुत जल्दी समझ लेते थे। साल 1963 में महज 21 साल की उम्र में उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए मिस्र की राजधानी काहिरा भेजा गया।
वहाँ उन्होंने दुनिया की मशहूर अल अजहर यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। तीन सालों तक काहिरा में रहकर उन्होंने पवित्र कुरान की तफसीर (व्याख्या) और हदीस का बहुत ही गहरा अध्ययन किया। वहाँ से लौटने के बाद ही उनके नाम के साथ 'अजहरी' शब्द जुड़ा। वह अरबी और उर्दू के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा पर भी बहुत अच्छी पकड़ रखते थे।
अध्यापन का काम और फतवा लिखने की बड़ी जिम्मेदारी
मिस्र से लौटने के बाद साल 1967 में केवल 25 साल की उम्र में उन्हें दारुल उलूम मंजर-ए-इस्लाम में एक लेक्चरर के रूप में नियुक्त किया गया। उनकी काबिलियत को देखते हुए अगले ही साल यानी 1968 में उन्हें इस संस्थान का प्रिंसिपल और हेड मुफ्ती बना दिया गया।
उन्होंने लगातार 12 सालों तक इस पद पर रहते हुए हजारों छात्रों को दीन की तालीम दी। उनके ज्ञान और समझ को देखते हुए उनके नाना मुफ्ती-ए-आजम हिंद मुस्तफा रजा कादरी ने उन्हें फतवा लिखने की जिम्मेदारी सौंपी। यह कोई आम जिम्मेदारी नहीं थी।
मुफ्ती अख्तर रजा खान ने अपने जीवन में करीब 5,000 से ज्यादा फतवे जारी किए। उनके दिए गए फैसले और फतवे आज भी पूरी दुनिया के मुस्लिम समाज में बहुत प्रामाणिक माने जाते हैं। उनके इन फतवों को 'अजहर-उल-फतावा' नाम से किताबों के रूप में प्रकाशित किया गया है। यह किताब उर्दू में पांच खंडों और अंग्रेजी में दो खंडों में उपलब्ध है।
जब मिला भारत के काजी-उल-कुज्जात का सबसे बड़ा पद
मुफ्ती अख्तर रजा खान की सबसे बड़ी पहचान भारत के 'काजी-उल-कुज्जात' (मुख्य न्यायधीश) के रूप में है। मुस्लिम समाज में कई ऐसे धार्मिक मामले होते हैं जैसे निकाह, तलाक, वसीयत, जुमा और ईद के इमाम की नियुक्ति या चांद देखने की तस्दीक, जिनके लिए एक आधिकारिक काजी का होना जरूरी होता है।
साल 2006 के अक्टूबर महीने में बरेली शरीफ में आयोजित उर्स-ए-रजवी के मौके पर लाखों लोगों की मौजूदगी में मुहादिस-ए-कबीर अल्लामा मुफ्ती जिया-उल-मुस्तफा कादरी अमजदी ने मुफ्ती अख्तर रजा खान को पूरे भारत का काजी-उल-कुज्जात घोषित किया। इस घोषणा को देश और दुनिया भर से आए हजारों उलेमा ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया।
वह हाल के इतिहास में भारत के अकेले ऐसे मौलाना थे जिन्हें 'ताजुश शरिया' (इस्लामिक कानून का ताज) का खिताब हासिल था। बाद में उन्होंने मुफ्ती जिया-उल-मुस्तफा को अपना डिप्टी काजी नियुक्त किया।
राजनीति से हमेशा बनाई रखी दूरी
ताजुश शरिया का पूरा जीवन सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की इबादत और ज्ञान के प्रसार में बीता। उन्हें कभी भी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह सत्ता और नेताओं से हमेशा एक सुरक्षित दूरी बनाकर रखते थे। उनके जीवन का एक बहुत ही मशहूर वाकया है जिसका जिक्र मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने भी किया है।
जब भारत में बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिराया गया था, तब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव बरेली आए थे। वह मुफ्ती अख्तर रजा खान से मिलना चाहते थे। प्रधानमंत्री करीब 8 घंटे तक बरेली के सर्किट हाउस में इंतजार करते रहे, लेकिन ताजुश शरिया ने उनसे मिलने से साफ इनकार कर दिया। वह मस्जिद को नुकसान पहुँचाए जाने से बहुत दुखी थे और उन्होंने सत्ता के सामने झुकना गवारा नहीं किया।
सऊदी अरब में गिरफ्तारी और मशहूर नात का लिखना
साल 1986 में जब मुफ्ती अख्तर रजा खान उमराह करने के लिए मक्का गए थे, तब वहाँ की स्थानीय मुतव्वा पुलिस ने उन्हें गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में ले लिया था। सऊदी प्रशासन को उनके सूफी बैकग्राउंड पर कुछ आपत्तियां थीं।
उनसे कई दिनों तक पूछताछ की गई। उन्होंने कुरान और सुन्नत के हवाले से अपने विश्वास को सही साबित किया। इस गिरफ्तारी की खबर जैसे ही दुनिया में फैली, भारत, पाकिस्तान, यूके और खाड़ी देशों में सऊदी सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। मुंबई में अल्लामा जिया-उल-मुस्तफा के नेतृत्व में 50,000 से ज्यादा लोगों ने जुलूस निकाला।
मक्का में 11 दिनों की इस हिरासत के दौरान ताजुश शरिया को मदीना जाने की इजाजत नहीं दी जा रही थी। इस जुदाई के गम में उन्होंने अपनी जिंदगी की सबसे मशहूर नात लिखी थी, जिसके बोल थे: "दाग-ए-फुरकत-ए-तैबा कल्ब मुजमाहिल जाता, काश गुम्बद-ए-खजरा देखने को मिल जाता।"
बाद में सऊदी सरकार को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने मुफ्ती साहब को रिहा कर भारत भेज दिया। अगले ही साल यानी 1987 में सऊदी सरकार ने अपनी गलती सुधारते हुए उन्हें सपरिवार विशेष वीजा दिया और उन्हें मक्का में काबा शरीफ के अंदर जाकर नमाज पढ़ने का दुर्लभ सम्मान भी मिला।
दुनिया के सबसे प्रभावशाली मुसलमानों में रहे शामिल
जॉर्डन के रॉयल इस्लामिक स्ट्रेटेजिक स्टडीज सेंटर द्वारा हर साल दुनिया के 500 सबसे प्रभावशाली मुसलमानों की एक सूची जारी की जाती है। मुफ्ती अख्तर रजा खान लगातार कई सालों तक इस सूची में बहुत ऊंचे पायदान पर रहे।
साल 2018 के संस्करण में उन्हें दुनिया का 24वां सबसे प्रभावशाली मुसलमान घोषित किया गया था। इससे पहले भी वह 2010 में 26वें, 2011 में 28वें और 2013-14 में 22वें स्थान पर रह चुके थे। यह सूची इस बात का प्रमाण है कि उनका असर सिर्फ बरेली या भारत तक सीमित नहीं था बल्कि पूरी दुनिया के मुसलमान उन्हें अपना रहबर मानते थे।
आतंकवाद के खिलाफ उठाई सबसे बुलंद आवाज
साल 2015 में जब दुनिया भर में आईएसआईएस (ISIS) जैसी आतंकी संस्थाएं इस्लाम के नाम पर आतंक फैला रही थीं, तब ताजुश शरिया ने इसके खिलाफ एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ एक कड़ा फतवा जारी किया।
इस फतवे का समर्थन करते हुए भारत के करीब 70,000 से ज्यादा मौलानाओं ने हस्ताक्षर किए थे। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे बड़े अखबारों ने इस खबर को बहुत प्रमुखता से छापा था कि "70 हजार मौलानाओं ने आतंकवाद के खिलाफ फतवा जारी किया, जिसे 15 लाख मुसलमानों का समर्थन मिला।" इस फतवे ने दुनिया को यह साफ संदेश दिया कि इस्लाम शांति का मजहब है और इसका आतंकवाद से कोई लेना-देना नहीं है।
जामियातुर रजा और अन्य ऐतिहासिक काम
मुफ्ती अख्तर रजा खान ने साल 2000 में बरेली में 'जामियातुर रजा' नाम के एक बहुत बड़े इस्लामिक विश्वविद्यालय की स्थापना की। आज इस संस्थान में हजारों छात्र तहतानिया से लेकर आलिया स्तर की पढ़ाई कर रहे हैं।
यहाँ मदरसे की तालीम के साथ-साथ नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (NIOS) के तहत आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है। इसके अलावा यहाँ मिस्र की अल अजहर यूनिवर्सिटी के सहयोग से मास्टर और पीएचडी स्तर के कोर्स भी चलाए जा रहे हैं। वह ऐतिहासिक संस्था 'जमात रजा-ए-मुस्तफा' के भी मुख्य नेता रहे, जिसने ब्रिटिश काल में बड़े पैमाने पर सामाजिक काम किए थे।
आखरी सफर और विरासत
लंबी बीमारी के बाद 20 जुलाई 2018 को इस महान रूहानी गुरु ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके इंतकाल की खबर सुनते ही देश-विदेश में शोक की लहर दौड़ गई। उनके जनाजे में शामिल होने के लिए बरेली की सड़कों पर लाखों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। बरेली के इतिहास में इससे बड़ा जनाजा कभी नहीं देखा गया।
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, तुर्की के ग्रैंड मुफ्ती और सीरिया के बड़े विद्वान शेख मुहम्मद अल-याकुबी सहित दुनिया भर के नेताओं और विद्वानों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया था। उनके जाने के बाद उनके बेटे मुफ्ती असजद रजा खान को शरई काउंसिल ऑफ इंडिया की बैठक में नया काजी-उल-कुज्जात नियुक्त किया गया, जो आज उनकी इस महान विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।