प्रो नईमा खातून ने तोड़ी एएमयू की सौ साल पुरानी परंपरा

Story by  शाहताज बेगम खान | Published by  [email protected] | Date 15-05-2026
Prof. Naima Khatoon Breaks AMU's Century-Old Tradition
Prof. Naima Khatoon Breaks AMU's Century-Old Tradition

 

शाह ताज खान

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहचान केवल एक शिक्षण संस्थान के रूप में नहीं रही। यह एक सोच है। एक आंदोलन है। एक सपना है जिसे सर सैयद अहमद खान ने देखा था। उस सपने में आधुनिक शिक्षा थी। वैज्ञानिक सोच थी। और समाज को आगे बढ़ाने की चाह थी। इसी ऐतिहासिक विश्वविद्यालय ने अप्रैल 2024 में एक नया इतिहास लिखा। प्रोफेसर नईमाखातून को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का पहला महिला वाइस चांसलर नियुक्त किया गया। यह केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं थी। यह उस लंबे इंतजार का अंत था जो एक सदी से ज्यादा समय से महसूस किया जा रहा था।

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एएमयू में महिलाओं की मौजूदगी नई नहीं है। यहां छात्राएं पढ़ती रही हैं। रिसर्च करती रही हैं। पढ़ाती भी रही हैं। लेकिन विश्वविद्यालय के सबसे बड़े प्रशासनिक पद तक किसी महिला का पहुंचना एक ऐतिहासिक बदलाव माना गया। खास बात यह है कि सौ साल पहले बेगम सुल्तान जहां एएमयू की पहली महिला चांसलर बनी थीं। उन्होंने महिलाओं के लिए रास्ता खोला था। मगर वाइस चांसलर के पद तक महिला को पहुंचने में एक सदी लग गई।

प्रोफेसर नईमा खातून का सफर आसान नहीं था। वह ओडिशा में पैदा हुईं। उनकी शुरुआती शिक्षा सामान्य माहौल में हुई। बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से मनोविज्ञान में पीएचडी की। उनकी पढ़ाई और करियर का बड़ा हिस्सा एएमयू से जुड़ा रहा। यही वजह है कि विश्वविद्यालय की शैक्षणिक और सामाजिक संरचना को वह बहुत करीब से समझती हैं।

उन्होंने अगस्त 1988 में एएमयू के मनोविज्ञान विभाग में लेक्चरर के तौर पर अपनी पेशेवर यात्रा शुरू की। धीरे धीरे वह एसोसिएट प्रोफेसर बनीं। फिर 2006 में प्रोफेसर के पद पर पहुंचीं। उन्होंने केवल पढ़ाया नहीं बल्कि रिसर्च और प्रशासन दोनों में अपनी मजबूत पहचान बनाई। यही कारण रहा कि उन्हें महिला कॉलेज की प्रिंसिपल जैसी अहम जिम्मेदारी भी दी गई।

प्रोफेसर नईमा खातून क्लिनिकल साइकोलॉजी, हेल्थ साइकोलॉजी, सोशल साइकोलॉजी और स्पिरिचुअल साइकोलॉजी की विशेषज्ञ मानी जाती हैं। उन्होंने छह महत्वपूर्ण किताबें लिखीं। उनकी किताबों में इंसानी व्यवहार, तनाव, बच्चों की मानसिक स्थिति और अध्यात्म जैसे विषय शामिल हैं। उनकी लिखी किताब ‘मैनेजिंग स्ट्रेस’ काफी चर्चित रही। इसमें उन्होंने रोजमर्रा की जिंदगी में मानसिक दबाव से निपटने के व्यावहारिक तरीके बताए।

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उनकी एक और महत्वपूर्ण किताब हिंदू और मुस्लिम युवाओं में राजनीतिक अलगाव और सामाजिक मनोविज्ञान पर आधारित है। यह दरअसल उनकी पीएचडी रिसर्च का हिस्सा था। इस रिसर्च में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि अलग अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के युवा राजनीति और समाज को किस नजर से देखते हैं। इस अध्ययन ने उन्हें सामाजिक संबंधों और सामुदायिक तनाव को समझने की गहरी दृष्टि दी।

प्रोफेसर नईमा खातून केवल किताबों तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने 50 से अधिक रिसर्च पेपर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित किए। अब तक वह 15 पीएचडी शोधार्थियों का मार्गदर्शन कर चुकी हैं। उनके कई छात्र आज देश और विदेश के विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं।

उनकी पहचान एक अंतरराष्ट्रीय शिक्षाविद के रूप में भी बनी। उन्होंने मध्य अफ्रीका के रवांडा नेशनल यूनिवर्सिटी में एक साल तक पढ़ाया। अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ लुइसविल, रोमानिया के यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बा इयूलिया और बैंकॉक के चुलालोंगकोर्न यूनिवर्सिटी में भी उन्होंने व्याख्यान दिए। इस्तांबुल और बोस्टन के अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उन्होंने शिक्षा और मनोविज्ञान से जुड़े विषयों पर अपनी बात रखी।

उनकी प्रशासनिक क्षमता भी लगातार सामने आती रही। वाइस चांसलर बनने से पहले वह सेंटर फॉर स्किल डेवलपमेंट एंड करियर प्लानिंग की निदेशक रहीं। उन्होंने छात्राओं के लिए कई रोजगार आधारित कोर्स शुरू किए। इनमें वेब डिजाइनिंग, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, टेक्सटाइल डिजाइनिंग और अंग्रेजी बोलचाल जैसे कोर्स शामिल थे। उनका मानना रहा कि केवल डिग्री काफी नहीं है। छात्रों के पास हुनर भी होना चाहिए।

वाइस चांसलर बनने के बाद उन्होंने एएमयू में कई बदलाव शुरू किए। लंबे समय से खाली पड़े शिक्षकों के पदों को भरने की प्रक्रिया तेज हुई। शिक्षा मंत्रालय से नए पदों की मंजूरी मिली। कई विभागों में शैक्षणिक  गतिविधियां फिर सक्रिय हुईं। उन्होंने नई शिक्षा नीति के तहत स्किल बेस्ड शिक्षा पर जोर दिया। छात्रों के लिए ऑनलाइन कोर्स शुरू किए गए ताकि घर बैठे भी बेहतर शिक्षा मिल सके।

प्रोफेसर नईमाखातून ने महिला शिक्षा को केवल नारे तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने छात्राओं के आत्मनिर्भर बनने पर जोर दिया। उनका कहना है कि शिक्षा तभी मजबूत मानी जाएगी जब वह समाज में आत्मविश्वास और स्वतंत्र सोच पैदा करे। यही वजह है कि उनके कार्यकाल में महिला छात्राओं के लिए नए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुए।

उनकी उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। उन्हें भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी का फेलो चुना गया। यह देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक सम्मानों में गिना जाता है। फरवरी 2026 में उन्हें महिलाओं के सशक्तिकरण और शिक्षा नेतृत्व के लिए गवर्नर वंदे मातरम अवॉर्ड ऑफ एक्सीलेंस के लिए नामित किया गया।

एएमयू का इतिहास गौरवशाली रहा है। लेकिन समय के साथ विश्वविद्यालय कई चुनौतियों से भी गुजरा। राजनीतिक विवाद हुए। प्रशासनिक संकट भी आए। ऐसे दौर में प्रोफेसर नईमाखातून की नियुक्ति को स्थिरता और संतुलन के रूप में देखा गया। उन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की। एक तरफ विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक पहचान को बनाए रखा। दूसरी तरफ विज्ञान और तकनीक की नई जरूरतों के हिसाब से बदलाव शुरू किए।

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उनके करीबी लोग बताते हैं कि वह बेहद शांत स्वभाव की हैं। बातचीत में सादगी पसंद करती हैं। छात्रों की समस्याएं सीधे सुनती हैं। कई बार बिना औपचारिकता के छात्राओं से बातचीत करती नजर आती हैं। यही वजह है कि एएमयू के अंदर उन्हें एक सुलझी हुई प्रशासक के तौर पर देखा जाता है।

प्रोफेसर नईमाखातून की सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह उन मुस्लिम महिलाओं की भी कहानी है जो शिक्षा के जरिए अपनी पहचान बना रही हैं। एएमयू जैसे ऐतिहासिक संस्थान में उनका शीर्ष पद तक पहुंचना एक बड़ा सामाजिक संदेश देता है। यह बताता है कि शिक्षा और मेहनत के दम पर पुरानी सीमाएं टूट सकती हैं।

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आज जब देश में महिला शिक्षा और भागीदारी पर चर्चा हो रही है तब प्रोफेसर नईमाखातून की यात्रा प्रेरणा का उदाहरण बनकर सामने आती है। उन्होंने यह साबित किया कि नेतृत्व केवल पद से नहीं आता। नेतृत्व दृष्टि से आता है। धैर्य से आता है। और लगातार काम करने की क्षमता से आता है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के इतिहास में उनका नाम अब एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है जिसने बदलाव की नई दिशा दिखाई।