समीर दि. शेख
भारतीय संविधानने सभी को बराबरी का हक दिया है. बराबर मौके, समान सुरक्षा और समान न्याय एक कल्याणकारी राज्य के अहम पहलू हैं. यह कहानी डॉ. बेनज़ीर तांबोली नाम की एक ऐसी हौसले वाली महिला की है, जो इन्हीं उसूलों को हकीकत में उतारने और समाज के कमज़ोर और दबे-कुचले तबकों की भलाई, खास तौर पर मुस्लिम महिलाओं के हकों के लिए लगातार कोशिश कर रही हैं.
बेनज़ीर का जन्म और परवरिश एक तरक्कीपसंद विचारोंवाले परिवार में हुई. उनके परिवार पर मुस्लिम सत्यशोधक मंडल के संस्थापक हमीद दलवाई के विचारों का गहरा असर था. उनके वालिद इलाही मोमिन दलवाई साहब के साथ काम करते थे. ऐसे वैचारिक माहौल में पली-बढ़ीं बेनज़ीर को बचपन से ही बराबरी और आज़ादी के संस्कार मिले.

संघर्ष की शुरुआत और खुद को साबित करने की जिद्द
शादी के बाद की ज़िंदगी में बेनज़ीर को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. उनके ससुराल का माहौल ज्यादा रिवायती और मजहबी था, जो उनके खुले और तरक्कीपसंद विचारों से मेल नहीं खाता था. इन वैचारिक मतभेदों की वजह से कई उलझनें पैदा हुईं और आखिरकार उनका तलाक हो गया.
यह दौर उनके लिए बेहद मुश्किल था. लेकिन, बेनज़ीर ने हार नहीं मानी. उन्होंने तय किया कि वे इससे बाहर निकलेंगी और अपने पैरों पर खड़ी होंगी. वे बताती हैं, "बचपन से ही एक तो अपनी ज़हनी सलाहियत पर भरोसा था और मेरे वालिद से मुझे लड़ने का जज्बा मिला था... कुछ भी हो जाए घबराना नहीं है, देखेंगे कुछ तो करेंगे, लड़ेंगे... किसी भी परेशानी का सामना करने की यह आदत थी."
तलाक के बाद उन्होंने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स पूरा किया और कपड़े सिलने का काम शुरू किया. उन्होंने खुद को इस काम में मसरूफ कर लिया और आर्थिक रूप से खुदमुख्तार बनने की दिशा में कदम बढ़ाया. वे कहती हैं, "अपनी छोटी सी ज़रूरत के लिए भी हमें किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़े... अपने पैरों पर खड़े होने के लिए क्या किया जा सकता है, मैं यही सोच रही थी."
यह संघर्ष सिर्फ आर्थिक नहीं था, बल्कि ज़हनी था. लेकिन उन्होंने इसमें से रास्ता निकाला. बाद में उन्होंने लेक्चरर के लिए इंटरव्यू दिए और वहां भी कामयाबी हासिल की.

तालिमी काम और मुहिम के ज़रिए नए तजुर्बे
शिक्षा क्षेत्र में दशकों से काम कर रही डॉ. बेनझीर उर्दू मीडियम की तालीम के बारे में कहती हैं, "सिर्फ उर्दू मीडियम में न पढ़ें, ऐसा न कहते हुए, हालात के दबाव, मजबूरी या उपलब्धता की वजह से कई लड़के-लड़कियां उर्दू मीडियम में पढ़ते हैं. यह उनका कुसूर नहीं होता."
इन छात्रों में ज़बान का हुनर विकसित हो, खास तौर पर अंग्रेजी का इल्म मिले, इसके लिए उन्होंने 'तंज़ीम-ए-वालिदैन' तंज़ीम के जरिए उर्दू मीडियम स्कूलों में जाकर छात्रों को अंग्रेजी सिखाने की पहल की और कई कामयाब प्रयोग किए. इस मुहिम पर आधारित एक थीसिस भी उन्होंने पेश की.

मुस्लिम सत्यशोधक मंडल के काम के लिए खुद को वक्फ किया
अपने तजुर्बे से बेनज़ीर को मुस्लिम महिलाओं की परेशानियों का अहसास हो गया था. उन्होंने खुद को मुस्लिम सत्यशोधक मंडल के काम में झोंक दिया. मुस्लिम सत्यशोधक मंडल के जरिए उन्होंने कई मुहिम चलाईं और महिलाओं के हुकूक, खास तौर पर मुस्लिम महिलाओं के समान अधिकारों के लिए लगातारआवाज़ उठाई. साथ ही, 'मुस्लिम महिला मदद केंद्र' के जरिए उन्होंने कई तलाकशुदा और मजलूम महिलाओं को सहारा दिया.
इस लंबे संघर्ष से हासिल किए गए तजुर्बे की वजह से वे सामाजिक भलाई के विचार बेहद मजबूती से रखती हैं. तलाक या पारिवारिक झगड़े सुलझाने के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का ही इस्तेमाल होना चाहिए, यह उनका हमेशा आग्रह रहता है.
वैचारिक काम में भी आगे
बेनज़ीर का सफर सिर्फ समाजी कामों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने तालिमी और वैचारिक मैदान में भी अपनी गहरी छाप छोड़ी. शिक्षा शास्त्र में उन्होंने पीएचडी पूरी की और कई कॉलेजों व यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ाने का काम किया.
इसके अलावा 'महाराष्ट्र नॉलेज कॉर्पोरेशन' (MKCL) में सीनियर एजुकेशनल कोर्डिनेटर के तौर पर भी उन्होंने लंबा अरसा काम किया है, और तालीम व एजुकेशनल मैनेजमेंट के शोबे में उन्हें दो दहाई से ज्यादा का तजुर्बा है.
तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ में काम करते हुए महिला अत्याचार रोकथाम सेल की नोडल ऑफिसर के तौर पर भी उन्होंने अपनी समाजी ज़िम्मेदारी निभाई. उनके इस हिम्मत भरे और समर्पित काम को देखते हुए उन्हें नई दिल्ली के 'साहस सम्मान' (2015) और पुणे के 'सेवाव्रती महिला पुरस्कार' (2017) जैसे पुरस्कारों से नवाज़ा गया है.
तालिमी काम के साथ-साथ उनका वैचारिक काम भी उतना ही व्यापक और अहम है. मराठी, हिंदी और अंग्रेजी इन तीनों ज़बानों पर उनकी मजबूत पकड़ है और उन्होंने अनुवाद और एडिटिंग का बड़ा काम किया है. 'मुस्लिम सत्यशोधक पत्रिका' और 'समाजवादी अध्यापक पत्रिका' के को-एडिटर के तौर पर उन्होंने काम देखा है. उन्होंने मंडल के पत्रिका में लगातार मजामीन लिखे हैं और अलग-अलग जगहों पर इल्मी लेक्चर भी दिए हैं. 'शिक्षणशास्त्र शब्दकोश' उनका तैयार किया गया एक अहम प्रोजेक्ट है.
इसके अलावा 'प्रभावशाली शिक्षण तज्ज्ञ' किताब भी उन्होंने लिखी है. उन्होंने शेख यूसुफ बाबा (जिन्हें जनूब में 'स्काई बाबा' के नाम से जाना जाता है) के तेलुगु कहानी संग्रह का मराठी में तर्जुमा किया है, जो जल्द ही छपने वाला है. इन कहानियों में मुस्लिम समाज के अलग-अलग तबकों और खास तौर पर महिलाओं की तस्वीर बेहद असरदार तरीके से पेश की गई है.

देहदान का हिम्मत भरा और तरक्कीपसंद फैसला
कायमशुदा समाजी और मज़हबी रवायतों को दरकिनार करते हुए उन्होंने एक बेहद हिम्मत भरा कदम उठाया है. मौत के बाद देहदानकरने का फैसला उन्होंने और उनके शौहर डॉ. शमसुद्दीन तांबोली ने लिया है और उसके लिए बाकायदा फॉर्म भी भर दिए हैं. यह फैसला उनके तरक्कीपसंद विचारों की पुख्तगी को ज़ाहिर करता है.
आनेवाले वक्त में और भी ज़ोर-शोर से काम करने का इरादा
डॉ. बेनज़ीर ने एक बड़ा मुकाम हासिल किया है, फिर भी आने वाले वक्त में वे और भी बड़े काम करने का इरादा रखती हैं. मुस्लिम समाज में तारीख से लेकर आज तक ऐसी कई ख्वातीन हैं जिन्होंने अलग-अलग शोबों में बड़ी कामयाबी हासिल की है. सिर्फ मज़हबी या समाजी शोबे में ही नहीं, बल्कि साइंस, मेडिकल, कानून, बिज़नेस और साहित्य के मैदान में भी मुस्लिम महिलाओं का अहम योगदान है. लेकिन अक्सर ये चेहरे समाज के सामने नहीं आते. इसलिए ऐसी होनहार महिलाओं की मालूमात इकट्ठा करके, उनकी जीवनी लिखने और उस पर एक किताब लाने का उनका इरादा है. मुस्लिम महिलाओं को देखने का समाज का नज़रिया बदले, इसके लिए यह काम बेहद अहम साबित होगा.

सत्यशोधक विचारों की विरासत और फैलाव
मुस्लिम सत्यशोधक मंडल और हमीद दलवाई के विचारों को आगे ले जाना, यह वक्त की ज़रूरत है, ऐसा वे मानती हैं. यह विचार उनके खून और सोच में बसा हुआ है. इसलिए जब तक मुमकिन है, तब तक इस आंदोलन में एक्टिव रहकर काम करते रहने का उनका पक्का इरादा है.
इंटरफेथ मैरिज की हिमायत और समाजी एकता के लिए कोशिश
हाल के दिनों में इंटरफेथ मैरिज करने वाले जोड़ों की हिफाज़त का मसला गंभीर हो गया है. ऐसे हालात में, 1954 के 'स्पेशल मैरिज एक्ट' के तहत शादी करने के लिए जोड़ों की हौसला अफज़ाई करना और उन्हें कानूनी व जज़्बातीसहारा देना, यह काम वे और तेज़ी से करने वाली हैं. समाज में बढ़ रही नफरत को कम करके 'एकता और एकात्मता' के एक सूत्री एजेंडे पर काम करने की उनकी ख्वाहिश है.
यानी, कलम के ज़रिए वैचारिक बेदारी और काम के ज़रिए समाजी बदलाव, इस दोहरे रास्ते पर बेनज़ीर तांबोली का आगे का सफर जारी रहने वाला है. इसमें उनके शौहर डॉ. शमसुद्दीन तांबोली का बहुत बड़ा साथ है, यह बात वे खास तौर पर ज़ाहिर करती हैं.
अपने तलाक के कड़वे तजुर्बे से बाहर निकलकर न सिर्फ अपनी ज़िंदगी संवारी, बल्कि कई दूसरी ख्वातीन को भी उन्होंने सहारा दिया. औरत को सिर्फ हालात के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए, बल्कि उसमें से रास्ता निकालकर अपनी और दूसरों की ज़िंदगी को कैसे रोशन करना चाहिए, इसकी बेहतरीन मिसाल डॉ. बेनज़ीर तांबोली हैं, ऐसा कहना गलत नहीं होगा. उनका काम, उनके विचार और उनका हौसला समाज के हर शख्स के लिए, खास तौर पर मुस्लिम महिलाओं के लिए एक बड़ी मिसाल और प्रेरणा है.