शारिक अदीब अंसारी
भारत की मिट्टी में अलग अलग संस्कृतियों और मजहबों के लोग सदियों से एक साथ रहते आए हैं। हमारी सभ्यता की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहाँ दुख और संवेदना के मौके पर मजहब की दीवारें टूट जाती हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हजरत इमाम हुसैन की याद में मनाई जाने वाली अज़ादारी यानी मुहर्रम है। सन 680 ईस्वी में करबला के मैदान में हुई इमाम हुसैन की शहादत केवल इस्लामी इतिहास का पन्ना नहीं है।
यह पूरी इंसानियत के लिए हक और इंसाफ की एक बेमिसाल दास्तान है। जुल्म के आगे सिर न झुकाने का उनका फैसला किसी एक कौम तक सीमित नहीं रहा। यही वजह है कि भारत में सदियों से हिंदू, सिख, जैन और दलित समाज के लोग इस शोक में बराबर के साझीदार रहे हैं। उन्होंने हमेशा इमाम हुसैन को मानवता के रक्षक के तौर पर देखा है।
यह साझी संस्कृति सिर्फ कही सुनी बातें नहीं है। इसके पुख्ता ऐतिहासिक सबूत ब्रिटिश दौर के दस्तावेजों, अदालती रिकॉर्ड और पुरानी पारिवारिक परंपराओं में मिलते हैं। आज भी हमारे देश के गाँवों और शहरों में यह अनोखी एकता साफ दिखाई देती है।

मराठा सेना और सिंधिया राजवंश की गहरी आस्था
इस कौमी एकता का एक बहुत बड़ा प्रमाण साल 1809 के ऐतिहासिक दस्तावेजों में मिलता है। थॉमस ड्यूअर ब्रॉटन नाम के एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी ग्वालियर के महाराज दौलत राव सिंधिया के दरबार से जुड़े थे। मुहर्रम के दिनों में मराठा सेना राजस्थान में एक सैन्य अभियान पर थी।
ब्रॉटन ने अपनी डायरी में लिखा कि युद्ध के माहौल में भी हिंदू मराठा सैनिक और बड़े सरदार पूरी अकीदत के साथ इमाम हुसैन का मातम मना रहे थे। बहुत से सैनिकों ने हरे रंग के कपड़े पहने हुए थे।
खुद महाराज सिंधिया अपने राजसी ठाट बाट छोड़कर सेना के शिविरों में रखे ताजियों के पास जाते थे और करबला की कहानी सुनते थे। इतिहासकार बताते हैं कि ग्वालियर के राजा आशूरा के दिन नंगे पैर जुलूस में चलते थे। वे अपने हाथों से ताज़िया उठाते थे। यह उनके ऊंचे नैतिक और मानवीय मूल्यों को दिखाता है।

राजनीति में गंगा जमुनी तहजीब का अक्स
भारत के बड़े राजनेताओं ने भी इस साझी सांस्कृतिक विरासत का हमेशा दिल से सम्मान किया है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ की मजलिसों और मुहर्रम के जुलूसों में अक्सर शामिल होते थे। लखनऊ की जनता के साथ उनका बहुत गहरा जुड़ाव था।
एक हिंदू राष्ट्रवादी नेता होने के बाद भी उन्होंने वहाँ की साझी संस्कृति को इस कदर अपनाया कि समाज का हर वर्ग उन्हें अपना प्रतिनिधि मानता था। इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मुहर्रम की इस रिवायत का सम्मान किया था।
देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे हजरत इमाम हुसैन के बलिदान को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि देते रहे हैं। यह साबित करता है कि करबला का नैतिक संदेश भारतीय समाज में कितना गहरा असर रखता है।
लखनऊ के हिंदू अज़ादार और उनकी बेमिसाल कला
लखनऊ हमेशा से अपनी खास तहजीब के लिए जाना जाता रहा है। यहाँ के हिंदू समाज का मुहर्रम से बहुत पुराना भावनात्मक रिश्ता है। राजा महरा के खानदान के लाला हर प्रसाद को हजरत अब्बास की शहादत पर लिखे मरसिए पढ़ने का बहुत शौक था।
जब वे पूरी श्रद्धा के साथ इन शोकगीतों का पाठ करते थे तो सुनने वालों की आँखें नम हो जाती थीं। पेशे से कुम्हार टीका राम हर साल मिट्टी का एक बेहद खूबसूरत ताज़िया बनाते थे। मुहर्रम की दसवीं रात को उसे देखने के लिए हज़ारों लोगों की भीड़ उमड़ती थी।
उर्दू साहित्य में भी हिंदू कवियों का योगदान बहुत बड़ा रहा है। मुंशी चन्नू लाल दिलगीर लखनऊ के बहुत मशहूर मरसिया लेखक माने जाते हैं। उनका एक शेर इतना दर्दभरा था कि उर्दू के महान कवि मीर अनीस ने उसकी तारीफ में अपना पूरा दीवान देने की बात कही थी।
दिलगीर ने लिखा था कि कैसे उठाऊँ हाथ जब राम ने हुसैन पे हाथ उठाया। इसी तरह एक और मशहूर कवि विश्वनाथ प्रसाद मथुर लखनवी ने लिखा था कि राम है मेरी फितरत में तो राम करता हूँ, मथुर हिंदू हूँ मगर दुश्मन ए शब्बीर नहीं हूँ। उन्होंने जानबूझकर अपना हिंदू नाम कविता में बनाए रखा ताकि दुनिया जान सके कि यह जज्बात एक हिंदू के हैं।

देश के कोने कोने से एकता की जीवंत मिसालें
करबला की यह साझी याद केवल किसी एक शहर तक महदूद नहीं है। पूरे देश में ऐसी कई मिसालें बिखरी पड़ी हैं जो हमारी आत्मा को जोड़ती हैं।
हुसैनी ब्राह्मणों का गौरवशाली इतिहास
भारतीय संस्कृति में हिंदू और करबला के रिश्तों का सबसे अनोखा अध्याय हुसैनी ब्राह्मणों का है। इन्हें मोहियाल या दत्त ब्राह्मण भी कहा जाता है। इस समुदाय की यह मान्यता है कि उनके पूर्वज राहब सिद्ध दत्त अपने सात बेटों के साथ करबला के युद्ध में इमाम हुसैन की तरफ से लड़े थे।
आज भी इस बिरादरी के लोग मुहर्रम के दिनों में शोक मनाते हैं, मजलिसों में जाते हैं और मातम करते हैं। उनकी जीवन शैली में वैदिक संस्कारों और करबला की यादों का एक बहुत ही सुंदर तालमेल देखने को मिलता है।
Shia Muslims walk in a Muharram procession while reciting nohas, elegiac poems mourning the martyrdom of Imam Hussain on the 8th of Muharram in Lal chowk #Srinagar pic.twitter.com/GPHum39ov8
— Mubashir Khan (@mubashirkhan07) June 24, 2026
साहित्य की दुनिया में शोधकर्ता काली दास गुप्ता रज़ा और इरफ़ान तुराबी ने ऐसे कई गैर मुस्लिम कवियों की रचनाओं को सहेजने का काम किया है। पूरन सिंह हुनर और कँवर महिंदर सिंह बेदी जैसे सिख कवियों ने इमाम हुसैन की याद में बहुत ही शानदार कविताएं लिखी हैं। यह बात साबित करती है कि करबला की कहानी ने हर दौर के भारतीय रचनाकारों को प्रभावित किया है।
पसमांदा मुस्लिम समाज के लिए भी यह साझी विरासत बहुत बड़ा महत्व रखती है। बुनकर, लोहार, धोबी और कुम्हार जैसे श्रमजीवी समाज के लोग हमेशा से अपने हिंदू पड़ोसियों के साथ सुख दुख साझा करते आए हैं। अमरोहा के हिंदू कारीगरों द्वारा बनाए गए ताज़िये अपनी महीन नक्काशी और सुंदरता के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं।
करबला का सबसे बड़ा पैगाम यही है कि जब भी सच और ताकत के बीच टकराव हो तो इंसान को हमेशा सच के साथ खड़े होना चाहिए। इमाम हुसैन ने यही किया था और इसीलिए वे किसी एक मजहब के दायरे से ऊपर उठकर पूरी इंसानियत के रहनुमा बन गए। भारत की मूल आत्मा हमेशा से सह अस्तित्व और आपसी मोहब्बत पर टिकी रही है। यह साझी विरासत हमारी पहचान भी है और हमारी सबसे बड़ी ताकत भी है।
( लेखक ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं।)