एमएफ हुसैन की सलाह ने बदल दी फरखंदा की जिंदगी

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 29-06-2026
Painter of the Soul: That One Piece of Advice from Maqbool Fida Husain and Farkhunda Khan Fida’s Sufi Journey
Painter of the Soul: That One Piece of Advice from Maqbool Fida Husain and Farkhunda Khan Fida’s Sufi Journey

 

ओनिका माहेश्वरी
 
ज़िंदगी के कुछ मोड़ ऐसे होते हैं जहाँ एक छोटी सी मुलाक़ात पूरे भविष्य की इबारत लिख देती है। दिल्ली की एक सुनहरी शाम, साल 1997 की वह कला प्रदर्शनी और एक युवा चित्रकार के मन में उमड़ते ढेरों सवाल। सामने भारतीय कला जगत के सूर्य, मकबूल फ़िदा हुसैन खड़े थे। उस वक्त की युवा कलाकार फरखंदा खान के पास तकनीक तो थी, पर शायद वह 'विषय' की तलाश में थीं। उन्होंने हुसैन साहब से एक मासूम लेकिन गहरा सवाल पूछा, "हुसैन साहब, मुझे क्या चित्रित करना चाहिए?" हुसैन साहब ने अपनी चिर-परिचित मुस्कुराहट के साथ उन्हें एक ऐसा मंत्र दिया जिसने उनकी पूरी कला यात्रा की दिशा बदल दी।

उन्होंने कहा, "वही चित्रित करो जो तुम्हारे दिल और आत्मा से निकलकर तुम्हें प्रेरित करे।" बस, यही वह पल था जिसने एक साधारण चित्रकार को 'फरखंदा खान फिदा' के रूप में स्थापित करने की नींव रखी। आज जब भी कोई उनसे उनकी कामयाबी का राज़ पूछता है, वह बड़े फख्र के साथ हुसैन साहब के साथ हुई उस छोटी सी मगर असरदार बातचीत को दोहरा देती हैं।
 
 
फरखंदा का जन्म उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक बांदा जिले के कालिंजर गांव में हुआ था। यह गांव अपनी वीरता और मिट्टी की सौंधी खुशबू के लिए जाना जाता है, लेकिन फरखंदा के घर में कला की एक अलग ही बयार बहती थी। उनके पिता, मोहम्मद सईद खान, भारतीय वायुसेना में एक अनुशासित अधिकारी थे। दिन भर देश की सेवा और फौज की सख्ती के बाद, वह अपनी रातों को रंगों के नाम कर देते थे। वह एक शौकिया चित्रकार थे, जो कपड़ों और पुराने रिकॉर्ड्स पर राधा-कृष्ण और माता सरस्वती की जीवंत तस्वीरें उकेरा करते थे। पिता को रात के सन्नाटे में ब्रश चलाते देखना फरखंदा के लिए किसी जादुई अनुभव से कम नहीं था। पिता की इसी प्रेरणा और रंगों के प्रति उनके समर्पण ने नन्ही फरखंदा के मन में यह बीज बो दिया कि कला केवल शौक नहीं, बल्कि खुद को अभिव्यक्त करने का एक पवित्र माध्यम है।
 
उनकी शैक्षणिक यात्रा भी उतनी ही प्रभावशाली रही है। फरखंदा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा देश के विभिन्न शहरों जैसे पुणे और काकिनाडा में प्राप्त की। बाद में वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) पहुँचीं, जहाँ उन्होंने चित्रकला (Fine Arts) में मास्टर्स की डिग्री हासिल की। उनकी मेहनत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने वहाँ स्वर्ण पदक (Gold Medal) जीता। पढ़ाई के प्रति उनकी भूख यहीं खत्म नहीं हुई और उन्होंने आगे चलकर नागपुर विश्वविद्यालय से आधुनिक कला में डॉक्टरेट की डिग्री भी प्राप्त की। कुछ समय के लिए उन्होंने दिल्ली के सलवान पब्लिक स्कूल में कला शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ दीं और इसी दौर में उनकी शादी हुई, जिसके बाद उन्होंने अपने पेशेवर कला जीवन को एक नया विस्तार दिया।
 
 
फरखंदा खान फिदा की कला का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब उन्होंने सूफीवाद को अपनी आत्मा में उतारा। एएमयू से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कला के विभिन्न पहलुओं, धार्मिकता और आध्यात्मिकता पर गहरा शोध किया। उनकी यह रूहानी तलाश उन्हें दिल्ली की मशहूर हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह तक ले गई। वहां के शांतिपूर्ण वातावरण, कव्वालियों के गूँजते स्वर और इबादत के माहौल ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। फरखंदा कहती हैं कि सूफीवाद का मतलब ही शांति है। जब आप अपने भीतर शांति महसूस करते हैं, तो बाहर का सारा द्वेष, जलन, नफरत और संघर्ष खुद-ब-खुद खत्म हो जाता है। उनकी पेंटिंग्स में अब सूफी संतों की रूहानियत, दरगाहों का सुकून और खुदा की इबादत के रंग उभरने लगे। उनके कैनवास पर रंगों का चुनाव और ब्रश के स्ट्रोक्स देखने वाले को एक अलग ही दुनिया में ले जाते हैं, जहाँ सिर्फ सुकून और भाईचारा है।
 
साल 2002 उनके करियर के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ। इस साल उन्होंने अपनी पेंटिंग्स की पहली बड़ी प्रदर्शनी लगाई। उनकी कला की सादगी और उसमें छिपे गहरे अर्थों ने न केवल भारतीय कला प्रेमियों को प्रभावित किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्हें पहचान मिली। लंदन और बहरीन जैसे देशों में उनकी कला की भारी मांग रही। उनकी एक पेंटिंग बहरीन में 5 लाख रुपये में खरीदी गई, जिसने यह साबित कर दिया कि अगर कला दिल से निकली हो, तो उसकी कोई सीमा नहीं होती। हुसैन साहब की वह सलाह कि 'वही बनाओ जो रूह कहे', अब हकीकत में बदलती दिख रही थी।
 
फरखंदा के व्यक्तित्व के और भी कई रंग हैं। उन्होंने केवल कैनवास तक खुद को सीमित नहीं रखा। दिल्ली में रहते हुए उन्होंने प्रसिद्ध थिएटर कलाकार यासीन खान के साथ मंच साझा किया और अभिनय की दुनिया में भी हाथ आज़माया। उन्हें मशहूर फिल्म निर्देशक महेश भट्ट के नाटक 'डैडी' में अभिनय करने का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने समाज और विशेषकर भारतीय मुसलमानों के जीवन की एक अलग सच्चाई को महसूस किया। उनका मानना है कि भारतीय मुसलमान पूरी दुनिया में सबसे खुशहाल हैं क्योंकि उनके पास अपनी संस्कृति और धर्म को अपनी इच्छा के अनुसार जीने की पूरी स्वतंत्रता है।
 
हालाँकि, उनकी कलात्मक यात्रा कांटों भरी भी रही। जब उन्होंने पोर्ट्रेट पेंटिंग (इंसानी चेहरे बनाना) शुरू की, तो उन्हें समाज के कुछ तबकों की कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी। उस समय धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं के कारण इसे कुछ लोग सही नहीं मानते थे। लेकिन फरखंदा ने इन आलोचनाओं को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उनका तर्क बहुत स्पष्ट और सुंदर है—वह कहती हैं कि हर व्यक्ति का चेहरा खुदा की एक अनोखी और सबसे खूबसूरत रचना है। भगवान की इस अद्भुत कारीगरी को चित्रित करना भला गलत कैसे हो सकता है? उन्होंने अपने विश्वास को बनाए रखा और अपनी कला के माध्यम से चेहरों की रूहानियत को उकेरना जारी रखा।
 
कोरोना महामारी के दौर ने भी फरखंदा के विचारों को काफी प्रभावित किया। उन्होंने महसूस किया कि दुनिया में भव्यता और दिखावा सिर्फ क्षणिक हैं। जीवन का असली मूल्य एक-दूसरे के प्रति दया, करुणा और समर्पण में है। उनका मानना है कि सच्ची शांति दूसरों के प्रति अपने दायित्व को निभाने में ही छिपी है। यही कारण है कि सूफी चित्रकला के अलावा वे अब सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी कूची चला रही हैं। जल संकट जैसे गंभीर मुद्दे पर उन्होंने कई पेंटिंग्स बनाई हैं ताकि लोगों में पानी के महत्व को लेकर जागरूकता फैलाई जा सके।
 
 
आज डॉ. फरखंदा खान फिदा न केवल एक सफल चित्रकार हैं, बल्कि वे युवाओं और विशेषकर लड़कियों के लिए एक प्रेरणास्रोत भी हैं। वे दक्षिण दिल्ली में अपने पति और दो बच्चों के साथ रहती हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार नई पीढ़ी से जुड़ी रहती हैं। उनका युवाओं को संदेश बहुत सरल है. कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है। वे लड़कियों को यह सीख देती हैं कि वे किसी भी तरह के सामाजिक या मानसिक बंधन से मुक्त होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाएं और अपनी प्रतिभा को दुनिया के सामने रखें।
 
डॉ. फरखंदा खान फिदा की कला यात्रा बांदा के एक छोटे से गांव से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय दीर्घाओं तक पहुँचने की वह कहानी है, जो हमें सिखाती है कि अगर हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें और अपनी रूह की आवाज़ सुनें, तो हम न केवल सफल होते हैं बल्कि समाज में एक सकारात्मक बदलाव भी ला सकते हैं। उनकी पेंटिंग्स सिर्फ रंगों का मेल नहीं हैं, वे शांति, आध्यात्मिकता और मानवता का एक सुंदर घोषणापत्र हैं।