Mansoor Ali Khan Pataudi: An accident cost him an eye, but passion turned him into cricket’s ‘Tiger’.
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
एक कार हादसा हुआ और उनकी एक आंख की रोशनी चली गई। डॉक्टरों ने शायद ऐसी स्थिति में किसी भी सामान्य इंसान के लिए बहुत कुछ बदलते देखा होता। लेकिन मंसूर अली खान पटौदी ने उसी हादसे के बाद फिर बल्ला उठाया और दुनिया को बता दिया कि शरीर की एक कमी, अगर हौसले के आगे छोटी पड़ जाए, तो मंजिल अभी भी हासिल की जा सकती है।
क्रिकेट की दुनिया उन्हें ‘टाइगर’ के नाम से जानती थी। नवाबी परिवार में जन्मे इस युवा क्रिकेटर के पास नाम, रुतबा और सुविधाएं थीं, लेकिन भारतीय क्रिकेट में अपनी पहचान उन्होंने किसी विरासत के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभा, जुझारूपन और नेतृत्व के दम पर बनाई।
मंसूर अली खान पटौदी सिर्फ भारत के महान बल्लेबाजों में शामिल नहीं थे। वह ऐसे कप्तान थे जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को जीत के बारे में सोचने का आत्मविश्वास दिया।
महज 21 साल की उम्र में भारतीय टेस्ट टीम की कप्तानी संभालने वाले पटौदी ने उस दौर में टीम का नेतृत्व किया, जब विदेशी जमीन पर जीतना भारतीय क्रिकेट के लिए किसी सपने से कम नहीं था।
उनकी कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि यह सिर्फ क्रिकेट की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जिसने एक हादसे के बाद अपनी जिंदगी को दोबारा बनाया और फिर उसी एक आंख से दुनिया के सबसे मुश्किल गेंदबाजों का सामना किया।
नवाबी परिवार में जन्मा वह लड़का, जिसे क्रिकेट से इश्क था
मंसूर अली खान पटौदी का जन्म 5 जनवरी 1941 को भोपाल में हुआ था। वह पटौदी रियासत के नवाब परिवार से ताल्लुक रखते थे और अपने पिता इफ्तिखार अली खान पटौदी की विरासत के उत्तराधिकारी थे।
उनके पिता खुद भी क्रिकेटर थे और इंग्लैंड तथा भारत दोनों के लिए टेस्ट क्रिकेट खेल चुके थे। लेकिन ‘नवाब’ होना और क्रिकेट में सफल होना दो अलग बातें थीं। मंसूर ने पढ़ाई के दौरान ही क्रिकेट में अपनी असाधारण प्रतिभा दिखानी शुरू कर दी थी। इंग्लैंड के प्रतिष्ठित Winchester College में उन्होंने क्रिकेट खेला और 1959 में स्कूल टीम की कप्तानी की। उसी साल उन्होंने 1,068 रन बनाए और स्कूल का लगभग चार दशक पुराना रिकॉर्ड तोड़ा।
उनकी प्रतिभा को देखकर उनके कोच ने उन्हें भविष्य का अगला डॉन ब्रैडमैन तक बताया था। लेकिन जिंदगी ने उनके लिए एक ऐसा मोड़ तैयार कर रखा था, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
20 साल की उम्र में हादसा और एक आंख की रोशनी खत्म
1 जुलाई 1961, इंग्लैंड के होव में एक कार दुर्घटना ने मंसूर अली खान पटौदी की जिंदगी बदल दी। कार की विंडस्क्रीन का एक कांच का टुकड़ा उनकी दाहिनी आंख में जा धंसा और उनकी आंख की रोशनी स्थायी रूप से चली गई।
उस समय उनकी उम्र सिर्फ 20 साल थी और क्रिकेट करियर तेजी से आगे बढ़ रहा था। कल्पना कीजिए जिस खिलाड़ी की सबसे बड़ी ताकत उसकी नजर थी, वही नजर अब अधूरी हो चुकी थी।
क्रिकेट में बल्लेबाज को गेंद की गति, दिशा और लंबाई को एक पल में पहचानना होता है। दो आंखों से गेंद को देखना और उसकी गहराई को समझना ही मुश्किल होता है। एक आंख से यह चुनौती कितनी बड़ी रही होगी, इसका अंदाजा लगाना भी आसान नहीं।लेकिन पटौदी ने क्रिकेट छोड़ने का फैसला नहीं किया। उन्होंने फिर बल्ला उठाया। और यही उनकी कहानी का सबसे प्रेरणादायक अध्याय बन गया।
हादसे के बाद वापसी: ‘टाइगर’ की असली पहचान
हादसे के कुछ ही महीनों बाद पटौदी क्रिकेट में लौट आए। यह वापसी सिर्फ खेल में वापसी नहीं थी। यह उस मानसिकता के खिलाफ लड़ाई थी जो कह सकती थी कि एक आंख की रोशनी खोने के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट अब संभव नहीं। लेकिन पटौदी ने असंभव को चुनौती दी।
BCCI के अनुसार, उन्होंने अपने करियर का बड़ा हिस्सा एक आंख की दृष्टि खोने के बाद खेला और इसके बावजूद विश्वस्तरीय बल्लेबाज बने रहे। उनकी बल्लेबाजी में आक्रामकता थी। वह गेंदबाजों से डरने वाले बल्लेबाज नहीं थे। उनकी शैली में आत्मविश्वास था और यही आत्मविश्वास आगे चलकर उनकी कप्तानी की पहचान भी बना।
21 साल की उम्र में भारत के कप्तान
1961-62 में पटौदी ने भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्हें ऐसी जिम्मेदारी मिली, जो आज के दौर में भी किसी युवा खिलाड़ी के लिए बहुत बड़ी मानी जाएगी। महज 21 साल की उम्र में वह भारतीय टेस्ट टीम के कप्तान बन गए। उस समय वह टेस्ट क्रिकेट की कप्तानी करने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ियों में से एक थे और उनका यह रिकॉर्ड दशकों तक चर्चा में रहा।
पटौदी के सामने चुनौती सिर्फ मैच जीतने की नहीं थी। उन्हें भारतीय क्रिकेटरों की सोच बदलनी थी। उस दौर में विदेशी टीमों के खिलाफ भारत अक्सर संघर्ष करता था और कई बार टेस्ट मैच को ड्रॉ करा लेना भी उपलब्धि माना जाता था। पटौदी इससे अलग सोचते थे।
उनका संदेश साफ था मैच जीतने के लिए खेलो। यही सोच भारतीय क्रिकेट में धीरे-धीरे बदलाव की वजह बनी।
कप्तान जिसने भारतीय क्रिकेट को आक्रामक बनना सिखाया
पटौदी की कप्तानी की सबसे बड़ी विशेषता थी आक्रामक सोच। वह मैदान पर जोखिम लेने से नहीं डरते थे। उन्होंने खिलाड़ियों को अपनी क्षमता पर भरोसा करना सिखाया। उनकी कप्तानी में भारतीय टीम की फील्डिंग में भी बड़ा सुधार आया।
BCCI के अनुसार, पटौदी खुद शानदार फील्डर थे और उन्होंने भारतीय टीम के खिलाड़ियों को फील्डिंग में बेहतर होने के लिए प्रेरित किया। उनकी कप्तानी में भारतीय टीम ने कैचिंग और स्पिन गेंदबाजी की अपनी मजबूत पहचान विकसित की।
इसी दौर में भारतीय क्रिकेट की मशहूर स्पिन चौकड़ी के कई सदस्य टीम में आए या अपनी पहचान बनाने लगे बिशन सिंह बेदी, भागवत चंद्रशेखर, ईरापल्ली प्रसन्ना और एस. वेंकटराघवन। पटौदी समझते थे कि भारत की परिस्थितियों में स्पिन एक बड़ी ताकत बन सकती है। उन्होंने उसी ताकत को टीम की रणनीति का हिस्सा बनाया।
1964: ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वह पारी
1964 में ऑस्ट्रेलिया भारत दौरे पर आई। चेन्नई टेस्ट में पटौदी ने शानदार शतक लगाया। इसके बाद मुंबई के ब्रेबॉर्न स्टेडियम में उन्होंने दोनों पारियों में 86 और 53 रन बनाए। भारत ने वह टेस्ट दो विकेट से जीता और पटौदी की दोनों पारियों को उस जीत में बेहद महत्वपूर्ण माना गया।
दिलचस्प बात यह है कि उस समय ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजी आक्रमण बेहद मजबूत माना जाता था। ऐसे समय में पटौदी ने दबाव में रन बनाए। एक आंख से बल्लेबाजी करने वाला वह युवा कप्तान अब विरोधी टीम के गेंदबाजों के लिए चुनौती बन चुका था।
1967-68: न्यूजीलैंड में इतिहास
पटौदी के कप्तानी करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि आई 1967-68 में। उनकी कप्तानी में भारत ने न्यूजीलैंड में पहली बार टेस्ट सीरीज जीती। यह भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण था।
विदेशी जमीन पर टेस्ट सीरीज जीतना तब भारत के लिए बेहद दुर्लभ उपलब्धि थी। पटौदी ने अपनी टीम को उस मुकाम तक पहुंचाया और भारतीय क्रिकेट को यह भरोसा दिया कि भारत विदेशों में भी जीत सकता है। यही वह उपलब्धि थी जिसने पटौदी को सिर्फ एक शानदार बल्लेबाज नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के दूरदर्शी कप्तान के रूप में स्थापित किया।
मेलबर्न में एक आंख और एक पैर पर खेली वह पारी
पटौदी की जुझारूपन की सबसे चर्चित मिसालों में से एक है 1967-68 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर मेलबर्न टेस्ट में उनकी 75 रन की पारी। वह पारी उन्होंने चोट की स्थिति में खेली और एक आंख की दृष्टि खोने के बावजूद जिस तरह उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई आक्रमण का सामना किया, वह उनके चरित्र को समझने के लिए काफी है।
उनके बारे में बाद में कई महान क्रिकेटरों ने कहा कि अगर उनकी दोनों आंखें सही होतीं, तो शायद उनका रिकॉर्ड और भी असाधारण होता। लेकिन पटौदी ने कभी अपनी एक आंख को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। उनकी पहचान थी टाइगर।
अर्जुन अवॉर्ड: 1964 में सम्मान
मंसूर अली खान पटौदी को 1964 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। BCCI की आधिकारिक सूची में 1964 के अर्जुन पुरस्कार विजेताओं में M.A.K. Pataudi Cricket का नाम दर्ज है।
यह उनके क्रिकेट करियर की शुरुआती बड़ी राष्ट्रीय मान्यताओं में से एक थी। इसके बाद 1967 में उन्हें पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया। अर्जुन अवॉर्ड ने उनके उस सफर को पहचान दी, जिसमें एक युवा क्रिकेट प्रतिभा ने हादसे के बाद वापसी की, भारतीय टीम की कप्तानी संभाली और देश को विदेशी जमीन पर ऐतिहासिक टेस्ट सीरीज जीत तक पहुंचाया।
46 टेस्ट, 2,793 रन और 40 मैचों की कप्तानी
पटौदी ने भारत के लिए 46 टेस्ट मैच खेले। इनमें उन्होंने 2,793 रन बनाए, जिसमें छह शतक शामिल थे। उनका सर्वाधिक स्कोर नाबाद 203 रन रहा। लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान उनके बल्लेबाजी आंकड़ों से आगे था।
उन्होंने भारत की 40 टेस्ट मैचों में कप्तानी की और इनमें से नौ मैचों में भारत को जीत मिली। उनकी कप्तानी ने भारतीय क्रिकेट को एक ऐसी सोच दी जिसमें जीत के लिए जोखिम उठाना कमजोरी नहीं, बल्कि जरूरी हिस्सा था।
एक नवाब, लेकिन मैदान पर सिर्फ खिलाड़ी
पटौदी का जीवन क्रिकेट से बाहर भी बेहद दिलचस्प था। वह पटौदी रियासत के नवाब परिवार से आते थे। लेकिन क्रिकेट के मैदान पर उन्होंने अपनी पहचान सिर्फ अपनी मेहनत और खेल से बनाई। उनका विवाह अभिनेत्री शर्मिला टैगोर से हुआ और उनके तीन बच्चे सैफ अली खान, सोहा अली खान और सबा अली खान हैं। लेकिन उनके व्यक्तित्व का सबसे बड़ा आकर्षण उनका आत्मविश्वास था। वह अपनी शाही पृष्ठभूमि के बावजूद टीम के खिलाड़ियों के साथ सहज रहते थे।
BCCI के एक संस्मरण में बताया गया है कि जब वह पहली बार भारतीय टीम के नेट अभ्यास में पहुंचे, तो उनके साथ सामान लेकर लोगों का पूरा समूह था। साथी खिलाड़ी असमंजस में थे कि उन्हें कैसे संबोधित करें। पटौदी ने माहौल हल्का करते हुए कहा “बस मुझे Pat या Tiger कहिए।” यही उनका अंदाज था नवाब की पहचान बाहर, लेकिन टीम के बीच एक खिलाड़ी।
सबसे बड़ी प्रेरक कहानी: एक आंख से दुनिया को चुनौती
अगर मंसूर अली खान पटौदी की पूरी जिंदगी से एक कहानी चुननी हो, तो वह उनकी कार दुर्घटना के बाद की वापसी होगी। एक ऐसा क्रिकेटर जिसकी नजर ही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी, उसकी एक आंख की रोशनी चली गई।
फिर भी उसने क्रिकेट नहीं छोड़ा। उसने फिर बल्लेबाजी की। टेस्ट क्रिकेट खेला। भारत की कप्तानी की। विदेशी जमीन पर जीत दिलाई। और दुनिया के बेहतरीन गेंदबाजों का सामना किया।
VVS लक्ष्मण ने पटौदी को याद करते हुए एक बेहद प्रभावी बात कही थी यह समझने के लिए कि एक आंख से बल्लेबाजी करना कितना कठिन है, किसी बल्लेबाज को एक आंख बंद करके गेंद का सामना करना चाहिए।
एक आंख से गेंद की गहराई और उसकी लंबाई को समझना बेहद मुश्किल हो जाता है। पटौदी ने यह मुश्किल एक बार नहीं, बल्कि अपने लगभग पूरे अंतरराष्ट्रीय करियर में झेली। इसलिए उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश शायद यह है कि हालात आपकी क्षमता को परिभाषित नहीं करते। आपकी प्रतिक्रिया करती है।
क्रिकेट से संन्यास के बाद भी खेल से रिश्ता कायम रहा
पटौदी ने 1975 में क्रिकेट से संन्यास लिया। लेकिन क्रिकेट उनसे कभी दूर नहीं हुआ। संन्यास के बाद उन्होंने पत्रकार और कमेंटेटर के रूप में काम किया। 1993 से 1996 के बीच उन्होंने मैच रेफरी की भूमिका भी निभाई और दो टेस्ट तथा 10 वनडे मैचों में यह जिम्मेदारी संभाली।
बाद में वह IPL Governing Council का हिस्सा भी रहे। 2007 से भारत और इंग्लैंड के बीच खेली जाने वाली टेस्ट सीरीज की ट्रॉफी को Pataudi Trophy नाम दिया गया, जो उनके परिवार के क्रिकेट योगदान को सम्मानित करती है।
2013 में BCCI ने उनके सम्मान में Mansoor Ali Khan Pataudi Memorial Lecture शुरू किया। पहला व्याख्यान सुनील गावस्कर ने दिया। यानी पटौदी के जाने के बाद भी भारतीय क्रिकेट में उनका नाम एक संस्था, एक ट्रॉफी और एक वार्षिक स्मृति-व्याख्यान के रूप में जीवित रहा।
आज मंसूर अली खान पटौदी क्या कर रहे हैं?
मंसूर अली खान पटौदी का 22 सितंबर 2011 को 70 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह दिल्ली के अस्पताल में फेफड़ों से जुड़ी बीमारी से जूझ रहे थे। लेकिन कुछ लोग चले जाने के बाद भी अपने काम से मौजूद रहते हैं।
पटौदी उन्हीं में से एक हैं। आज जब भारतीय क्रिकेट दुनिया की सबसे मजबूत क्रिकेट शक्तियों में गिना जाता है, तब उस दौर को याद करना जरूरी है जब भारत विदेशी जमीन पर जीत को लेकर आश्वस्त नहीं था।
पटौदी ने उस सोच को बदलने की कोशिश की। उन्होंने भारतीय टीम को आक्रामकता दी। फील्डिंग को महत्व दिया। युवा खिलाड़ियों पर भरोसा किया। और सबसे बढ़कर, हार मानने से इनकार करने का साहस दिया। BCCI ने उन्हें भारतीय क्रिकेट का ऐसा कप्तान बताया जिसने टीम में जीत के लिए आक्रामक रवैया पैदा किया और विपरीत परिस्थितियों से लड़ने का रास्ता दिखाया।
एक आंख की रोशनी कम हुई, लेकिन नजर इतिहास पर रही
मंसूर अली खान पटौदी की कहानी किसी राजघराने के वारिस की कहानी भर नहीं है। यह एक ऐसे खिलाड़ी की कहानी है जिसने अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल दिया। एक आंख चली गई लेकिन नजर नहीं झुकी।
21 साल की उम्र में कप्तानी मिली लेकिन दबाव में नहीं टूटे। विदेशी जमीन पर भारत को जीत मिली और भारतीय क्रिकेट का आत्मविश्वास बढ़ा। 1964 में अर्जुन अवॉर्ड मिला और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बनी। शायद इसलिए क्रिकेट की दुनिया ने उन्हें सिर्फ मंसूर अली खान पटौदी नहीं कहा। उन्हें एक नाम दिया “टाइगर।” और टाइगर की पहचान यही होती है वह परिस्थितियों से नहीं डरता, उनका सामना करता है।