दयाराम वशिष्ठ / फरीदाबाद
हरियाणा की लोक कला और संस्कृति को देश विदेश में पहचान दिलाने वाले विख्यात बीन वादक हवा सिंह नाथ सपेरा आज किसी परिचय के मोहताज नहीं। अपनी कला और लगन के बल पर उन्होंने सदियों पुरानी सपेरा परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया है। हाल में नई दिल्ली में आयोजित विशेष समारोह में देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें प्रतिष्ठित 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया।
87 वर्ष की आयु में भी हवा सिंह नाथ पूरी ऊर्जा के साथ बीन बजाते हैं। इस बड़े सम्मान के बाद अब उनके गांव और पूरे क्षेत्र के लोग उन्हें पद्म श्री पुरस्कार देने की मांग कर रहे हैं।हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के मीडिया समन्वयक मुकेश वशिष्ठ ने पलवल जिले के गांव रजोलका पहुंचकर हवा सिंह नाथ सपेरा को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। उन्होंने मुख्यमंत्री की ओर से शुभकामनाएं प्रेषित कीं और उनके उज्जवल भविष्य की कामना की।

10 वर्ष की उम्र में थामी बीन, गुरु तोता नाथ ने दिया नया नाम
हवा सिंह नाथ सपेरा का जन्म 1 जनवरी 1939 को हरियाणा के करनाल जिले के गांव डाबर थला में एक घुमंतू आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके जन्म से तीन महीने पहले ही पिता चुन्नी नाथ का निधन हो गया था। बचपन में उनका नाम देवानाथ था।
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। सपेरा समुदाय में बीन बजाकर सांप का खेल दिखाना ही आजीविका का साधन माना जाता था। जब देवानाथ 10 वर्ष के हुए, तो उनके बड़े भाई चंदगी नाथ ने सूखी लौकी से एक बीन बनाकर उन्हें दी। देवानाथ ने गांव के लोगों और उस्तादों से सीखकर बीन बजाना शुरू किया।
लगभग 15-16 वर्ष की उम्र तक वे बीन बजाने में माहिर हो चुके थे। बाद में उन्होंने तोता नाथ जी को अपना गुरु बनाया। एक बार सपेरा समाज के कार्यक्रम में जब सभी वादक इकट्ठा हुए, तो गुरु तोता नाथ ने उनकी धुन सुनकर कहा कि आपका नाम देवानाथ से बदलकर 'हवा सिंह नाथ' रखा जाता है। गुरु ने कहा था कि यदि तुम इसी तरह मेहनत करते रहे तो एक दिन हवा में उड़ोगे और देश भर में नाम कमाओगे।
शादी के बाद हवा सिंह पलवल जिले के गांव रजोलका में अपनी ससुराल में ही बस गए। उनकी शादी साधु नाथ की बेटी बादामी के साथ हुई थी। उनकी बीन की धुन ने ससुराल वालों का दिल जीत लिया था।
सांग से लेकर आकाशवाणी और हेमा मालिनी के संग मंच तक का सफर
एक समय था जब हरियाणा में मनोरंजन का मुख्य जरिया सांग हुआ करते थे। हवा सिंह नाथ की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर उस समय के प्रसिद्ध सांगी चंद्रवादी उनके घर आए। उन्होंने हवा सिंह को अपने सांग समूह में बीन बजाने के लिए आमंत्रित किया।
इसके बाद हवा सिंह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने आकाशवाणी रेडियो रोहतक में अपनी नियमित प्रस्तुतियां देनी शुरू कीं।
वर्ष 1986 में नई दिल्ली में 'अपना उत्सव' नाम से पहली बार राष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इसमें हवा सिंह के 'बीन जोगी ग्रुप' ने भाग लिया। इसके बाद 1989 में मुंबई में आयोजित 'अपना उत्सव' में उनकी मनमोहक प्रस्तुति को देखकर प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी खुद को रोक नहीं सकीं और मंच पर आकर नाचने लगीं। बॉलीवुड के कई अन्य कलाकार भी उनकी बीन की धुन के कायल हो गए।
वर्ष 1989 में ही इंडियन एसोसिएशन द्वारा संयुक्त अरब अमीरात के दुबई शॉपिंग फेस्टिवल में उन्हें बुलाया गया। वहां उनकी कला को इतना पसंद किया गया कि उन्हें लगातार चार बार प्रस्तुति देने का अवसर मिला। इसके अलावा वर्ष 2007 में वे अपने शिष्यों के साथ इटली के मिलान शहर में भी अपनी प्रस्तुति दे चुके हैं।

सूरजकुंड मेला, गणतंत्र दिवस परेड और फिल्मों में मौजूदगी
हवा सिंह नाथ सपेरा की कला का जलवा राष्ट्रीय आयोजनों में भी खूब देखने को मिला है।
उन्हें वर्ष 2019 में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र इलाहाबाद (भारत सरकार) द्वारा 'लोक विद् अवार्ड' से भी सम्मानित किया जा चुका है।

कैसे बनती है पारम्परिक बीन और क्या हैं सपेरा समाज के अनोखे रिवाज
सदियों पुराने वाद्य यंत्र बीन को बनाने का तरीका बेहद प्राकृतिक और दिलचस्प है।
सपेरा समाज में पुरानी परंपराओं का विशेष महत्व रहा है। वर्षों पहले जब समाज में बेटी की शादी होती थी, तो दहेज के रूप में दो झोली, एक पिटारी और एक सांप दिया जाता था। इसका मकसद यह था कि शादी के बाद दामाद अपनी आजीविका कमा सके। शादी तय करते समय यह भी देखा जाता था कि लड़का बीन बजाना जानता है या नहीं। हालांकि अब समय बदलने के साथ रोजगार के नए साधन देखे जाने लगे हैं।

पारिवारिक विरासत और कला को बचाने का संकल्प
हवा सिंह नाथ के परिवार में पांच बेटे और बेटियां हैं। अपनी लोक कला को जीवित रखने के लिए उन्होंने अपने पांचों बेटों को संगीत के अलग-अलग वाद्य यंत्रों में पारंगत किया:
यह पूरा परिवार मिलकर एक संगीतमय समूह चलाता है जो शादी-विवाह और बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रस्तुतियां देता है।
सांपों पर प्रतिबंध से कला पर संकट
हवा सिंह नाथ सपेरा का कहना है कि वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत सांप पकड़ने और रखने पर लगे प्रतिबंध के कारण सपेरा समाज की यह प्राचीन कला विलुप्त होने की कगार पर है।
वे कहते हैं कि जब चिड़ियाघर में सांप रखे जा सकते हैं, तो सपेरों को भी सीमित छूट दी जानी चाहिए। सपेरा और सांप का रिश्ता जन्मजात होता है। सपेरे जानते हैं कि सांप की देखभाल और सुरक्षा कैसे की जाती है। यदि सरकार इस दिशा में ध्यान दे, तो नई पीढ़ी बीन सीखने के लिए प्रेरित होगी और भारत की यह दुर्लभ लोक कला जीवित रह सकेगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs / AEO)
प्रश्न 1: हवा सिंह नाथ सपेरा कौन हैं?
उत्तर:हवा सिंह नाथ सपेरा हरियाणा के पलवल (मूल निवासी करनाल) के विख्यात बीन वादक हैं। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय लोक कला का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
प्रश्न 2: हवा सिंह नाथ सपेरा को कौन सा राष्ट्रीय सम्मान मिला है?
उत्तर:उन्हें भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' (अकादमी पुरस्कार) प्रदान किया गया है।
प्रश्न 3: पारम्परिक बीन किस चीज से बनाई जाती है?
उत्तर:पारम्परिक बीन सूखी लौकी, बांस की लकड़ी, नर्सल और मधुमक्खी के मोम को मिलाकर बनाई जाती है।
प्रश्न 4: सपेरा समाज में दहेज की पुरानी परंपरा क्या थी?
उत्तर:पुरानी परंपरा के अनुसार सपेरा समाज में बेटी की शादी के समय दहेज में दो झोली, एक पिटारी और एक सांप दिया जाता था ताकि दूल्हा अपनी आजीविका कमा सके।
87 वर्ष की उम्र में भी कला के प्रति हवा सिंह नाथ का समर्पण अनुकरणीय है। देश-विदेश के मंचों पर अपनी बीन की तान से लोगों को मंत्रमुग्ध करने वाले इस महान कलाकार का जीवन संघर्ष और सफलता की अनोखी कहानी है। हरियाणा की इस लोक परंपरा को बचाए रखने के लिए सरकारी स्तर पर संरक्षण और प्रोत्साहन की सख्त जरूरत है।