विदुषी गौड़ | नई दिल्ली
कर्नाल सोफिया कुरैशी की यह एक ऐसी कहानी है जिसे अक्सर हेडलाइंस में जगह नहीं मिलती, लेकिन इसकी गूंज समाज की गहरी परतों तक सुनाई देती है। यह नाम आज केवल एक सैन्य अधिकारी का नहीं है, बल्कि उस खामोश क्रांति का प्रतीक है जो वर्दी के भीतर रहकर पुरानी रूढ़ियों को तोड़ रही है। नई दिल्ली की गलियों से लेकर सरहद की चौकियों तक, सोफिया की पहचान एक ऐसी महिला के रूप में उभरी है जिसने अपनी काबिलियत से हर उस सवाल का जवाब दिया है जो अक्सर महिलाओं, उनके धर्म और उनकी नेतृत्व क्षमता पर उठाए जाते रहे हैं।

सोफिया का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था और उनके बचपन के दिन सादगी भरे थे, लेकिन उनके सपने बहुत ऊंचे थे। जिस समाज में वह पली-बढ़ीं, वहां बेटियों के लिए करियर के विकल्प अक्सर सीमित माने जाते थे। सेना में जाने का विचार उस वक्त एक ऐसी चुनौती थी जिसे स्वीकार करना हर किसी के बस की बात नहीं थी।
जब सोफिया ने पहली बार वर्दी पहनने की इच्छा जताई, तो चारों तरफ से नसीहतों का दौर शुरू हो गया। कुछ लोगों ने इसे पुरुषों का क्षेत्र बताया, तो कुछ ने धार्मिक मान्यताओं और शारीरिक क्षमता पर संदेह जताया। लेकिन सोफिया के पास इन सबका कोई मौखिक जवाब नहीं था, उनके पास बस एक अटूट विश्वास था कि भारतीय सेना की वर्दी केवल योग्यता देखती है, वह लिंग या पृष्ठभूमि नहीं पूछती।
भारतीय सेना की ट्रेनिंग अकादमी में प्रवेश करना उनके लिए पहली बड़ी जीत थी, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। सेना की ट्रेनिंग किसी को भी शारीरिक और मानसिक रूप से निचोड़ देने वाली होती है और सोफिया के लिए यह चुनौती दोगुनी थी क्योंकि उन्हें न केवल खुद को साबित करना था, बल्कि उन सभी लड़कियों की उम्मीदों को भी जिंदा रखना था जो उन्हें एक मिसाल की तरह देख रही थीं।
मैदान पर पसीना बहाते हुए सोफिया ने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह किसी से कम हैं। उन्होंने अपने पुरुष साथियों के साथ कदम से कदम मिलाकर हर ड्रिल पूरी की और दिखा दिया कि जब लक्ष्य सामने हो, तो थकान और दर्द सिर्फ शब्द बनकर रह जाते हैं।
जैसे-जैसे सोफिया के कंधे पर सितारे बढ़ते गए, उन्होंने उन धारणाओं को भी धराशायी किया कि महिलाएं केवल ऑफिस के कामों के लिए उपयुक्त होती हैं। उन्होंने कठिन ऑपरेशन्स की कमान संभाली और साबित किया कि युद्ध के मैदान में हिम्मत और रणनीतिक सोच की जरूरत होती है, जो किसी भी इंसान में हो सकती है। उनकी नेतृत्व क्षमता की सबसे खास बात उनका शांत स्वभाव है, जिससे उन्होंने अपने वरिष्ठों और अधीनस्थों का भरोसा जीता।
अक्सर मुस्लिम महिलाओं को लेकर समाज में कुछ बनी-बनाई छवियां होती हैं, लेकिन सोफिया ने अपनी जीवन यात्रा से उन तमाम कहानियों को बदल दिया। उन्होंने कभी भी अपनी पहचान की व्याख्या करने की जरूरत नहीं समझी क्योंकि उनके लिए उनका काम ही उनकी पहचान है।
वर्दी पहनते ही उनकी सबसे पहली पहचान 'भारतीय' बन गई। धर्म और देशभक्ति को लेकर बहस करने वालों के लिए वह एक जीता-जागता उदाहरण हैं कि आस्था और देश के प्रति समर्पण कभी एक-दूसरे के रास्ते में नहीं आते।
उनके लिए वर्दी एक ऐसा माध्यम है जो हर भेदभाव को खत्म कर देती है। सोफिया के करियर का एक अहम पड़ाव तब आया जब उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। जब वह परेड की कमान संभालती हैं या अंतरराष्ट्रीय सैन्य मंचों पर अपनी बात रखती हैं, तो वह एक बदलते हुए और समावेशी भारत की तस्वीर पेश करती हैं।

सोफिया का मानना है कि बदलाव रातों-रात नहीं आता, इसके लिए हर रोज खुद को बेहतर बनाना पड़ता है। वह कोई क्रांतिकारी नारे नहीं लगातीं, बल्कि खुद को उस व्यवस्था का हिस्सा बनाती हैं जिसे वह बदलना चाहती हैं। उनके सहकर्मी उन्हें एक ऐसी अधिकारी के रूप में जानते हैं जो काम में कड़ाई और व्यवहार में संवेदनशीलता का संतुलन रखती हैं।
सोफिया कुरैशी की कहानी सिर्फ बाधाओं को पार करने की नहीं है, बल्कि आत्मविश्वास जगाने की कहानी है। जैतून के हरे रंग की उस वर्दी में सोफिया ने यह दिखा दिया है कि पूर्वाग्रहों का सबसे सटीक जवाब विरोध नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठा है।

वह आज भी अपनी ड्यूटी पूरी मुस्तैदी से निभा रही हैं ताकि उनके बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ते थोड़े और आसान हो जाएं। सोफिया के सफर ने यह साबित कर दिया है कि जब संस्थान योग्यता को चुनते हैं और व्यक्ति उत्कृष्टता का संकल्प लेता है, तो रूढ़ियां खुद-ब-खुद टूट जाती हैं।