नीट विवाद के बीच जानिए परीक्षा का इतिहास

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 23-07-2026
Amid the NEET controversy, learn about the history of the exam.
Amid the NEET controversy, learn about the history of the exam.

 

आवाज द वॉयस/ नई दिल्ली

नीट परीक्षा को लेकर इन दिनों देश के कई हिस्सों में छात्र सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। हाल ही में सामने आई गड़बड़ियों और पर्चा लीक के आरोपों ने लाखों युवाओं के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस विरोध प्रदर्शन के बीच यह जानना बेहद जरूरी है कि भारत में डॉक्टर बनने की यह एकल व्यवस्था आखिर कैसे शुरू हुई। नीट यानी नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट आज देश की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षा है।

यह परीक्षा तय करती है कि कौन सा छात्र सरकारी या निजी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस, बीडीएस या आयुष पाठ्यक्रमों में दाखिला लेगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नीट हमेशा से एकमात्र जरिया नहीं था? इसकी शुरुआत कैसे हुई? इसमें क्या बदलाव आए? और यह परीक्षा इतनी कठिन क्यों मानी जाती है? आइए इस पूरी व्यवस्था को विस्तार से समझते हैं।

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नीट से पहले कैसा था भारत में मेडिकल दाखिला

वर्ष 2013 से पहले भारत में मेडिकल दाखिले की प्रक्रिया बहुत बिखरी हुई थी। उस समय कोई एक राष्ट्रीय परीक्षा नहीं होती थी। ऑल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट यानी एआईपीएमटी के अलावा हर राज्य अपनी अलग प्रवेश परीक्षा आयोजित करता था। इसके साथ ही निजी विश्वविद्यालय और डीम्ड यूनिवर्सिटी अपनी अलग परीक्षाएं लेते थे।

इस पुरानी व्यवस्था में छात्रों को एक ही साल में दर्जनों अलग-अलग फॉर्म भरने पड़ते थे। इससे छात्रों पर आर्थिक और मानसिक दबाव बहुत बढ़ जाता था। परीक्षा तिथियों के आपस में टकराने से कई मौके हाथ से निकल जाते थे। इसके अलावा निजी कॉलेजों में डोनेशन और भारी फीस देकर सीटें बेचने के मामले भी सामने आते थे। योग्यता के बजाय पैसे के दम पर दाखिला मिलने की शिकायतें आम थीं। इसी अव्यवस्था को खत्म करने के लिए देश स्तर पर एक समान परीक्षा का विचार सामने आया।

नीट की शुरुआत और कानूनी अड़चनों का सफर

नीट का आधिकारिक सफर वर्ष 2013 में शुरू हुआ। केंद्र सरकार और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने देश भर में एक ही परीक्षा कराने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले पर अपनी मुहर लगाई। लेकिन नीट की पहली शुरुआत आसान नहीं रही।

निजी मेडिकल कॉलेजों और कुछ राज्य सरकारों ने इस व्यवस्था का विरोध किया। उन्होंने इसे राज्यों के अधिकारों में दखल माना। कानूनी याचिकाओं के कारण सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के अंत में नीट को रद्द कर दिया। इसके बाद 2014 और 2015 में पुरानी व्यवस्था फिर से लागू हो गई। छात्रों को फिर से अलग-अलग राज्य स्तरीय परीक्षाएं देनी पड़ीं।

हालांकि वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले पर फिर से विचार किया। अदालत ने देश भर में नीट को अनिवार्य रूप से लागू करने का आदेश दिया। वर्ष 2016 के बाद से भारत में एमबीबीएस और बीडीएस में दाखिले के लिए नीट ही एकमात्र वैध परीक्षा बन गई। वर्ष 2019 में इस परीक्षा को आयोजित करने की जिम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए को सौंप दी गई।

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नीट परीक्षा का स्वरूप और यह इतनी कठिन क्यों है

नीट परीक्षा का पाठ्यक्रम एनसीईआरटी पर आधारित होता है। इस परीक्षा में भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान से जुड़े बहुविकल्पीय प्रश्न पूछे जाते हैं।यह परीक्षा इतनी कठिन इसलिए मानी जाती है क्योंकि इसमें शामिल होने वाले छात्रों की संख्या बहुत अधिक होती है, जबकि सरकारी सीटें काफी सीमित होती हैं। हर साल 20 लाख से भी ज्यादा छात्र इस परीक्षा में बैठते हैं।

लेकिन देश में सरकारी एमबीबीएस सीटें महज कुछ हजार ही हैं। इस भारी अंतर के कारण नीट में एक-एक अंक की प्रतिस्पर्धा बहुत कड़ी हो जाती है। केवल एक अंक कम होने पर छात्र की रैंक हजारों स्थान पीछे खिसक जाती है। इसी वजह से नीट का परिणाम लाखों में आवेदन करने वालों में से केवल कुछ हजार भाग्यशाली छात्रों के चेहरे पर खुशी लाता है।

वैश्विक मानक और राष्ट्रीय मानक संस्थाओं की भूमिका

नीट परीक्षा केवल भारत तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मानकों से है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ हमेशा पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा शिक्षा पर जोर देता है। नीट का मुख्य उद्देश्य भी यही है कि केवल योग्य छात्र ही चिकित्सा के क्षेत्र में कदम रखें।

भारत में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग यानी एनएमसी मेडिकल शिक्षा के नियम तय करता है। एनएमसी ही तय करता है कि किस कॉलेज में कितनी सीटें होंगी और पढ़ाई का ढांचा कैसा होगा। नीट परीक्षा एनएमसी के दिशा-निर्देशों के तहत ही आयोजित की जाती है।

जो छात्र भारत के बाहर विदेशों से एमबीबीएस करना चाहते हैं, उनके लिए भी नीट पास करना अनिवार्य है। वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मेडिकल स्कूल्स यानी डब्ल्यूडोम्स जैसी वैश्विक संस्थाएं विदेशी विश्वविद्यालयों की मान्यता की पुष्टि करती हैं। विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद जब छात्र भारत लौटते हैं, तो उन्हें भारत में प्रैक्टिस करने के लिए एनएमसी की पात्रता जांच पास करनी होती है। इसके लिए भी नीट में न्यूनतम अंक हासिल करना जरूरी होता है।

आधुनिक दौर में डिजिटल टूल्स और छात्रों की रणनीति

आज के समय में तकनीक ने नीट की तैयारी और दाखिले की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है। पंजीकरण से लेकर परीक्षा परिणाम और काउंसलिंग तक सब कुछ ऑनलाइन होता है।

अब छात्र परीक्षा के बाद ही अपने संभावित अंक और रैंक का अनुमान लगा लेते हैं। इसके लिए वे नीट रैंक प्रिडिक्टर जैसे डिजिटल टूल्स का सहारा लेते हैं। इसके अलावा एमबीबीएस एडवाइजर जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म छात्रों को उनके बजट और रैंक के हिसाब से सही कॉलेज चुनने में मदद करते हैं। ये डिजिटल प्लेटफॉर्म छात्रों को यह समझने में आसानी पैदा करते हैं कि उन्हें देश के किस सरकारी या निजी कॉलेज में दाखिला मिल सकता है।

नीट परीक्षा के लाभ और मौजूद चुनौतियां

नीट ने भारत में मेडिकल शिक्षा को एक नई दिशा दी है। इसके आने से प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता आई है। डोनेशन के नाम पर होने वाले भ्रष्टाचार पर काफी हद तक रोक लगी है। अब गरीब या सामान्य परिवार का होनहार बच्चा भी अपनी योग्यता के बल पर देश के शीर्ष सरकारी मेडिकल कॉलेज में जगह बना सकता है।

लेकिन इसके साथ ही कुछ बड़ी चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण छात्रों पर मानसिक तनाव बहुत बढ़ गया है। आज के समय में बिना कोचिंग संस्थान की मदद के नीट निकालना बहुत मुश्किल माना जाने लगा है। इससे ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को बराबरी का मौका पाने में संघर्ष करना पड़ता है। इसके अलावा हाल के वर्षों में पेपर लीक और धांधली के मामलों ने इस परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

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आगे का रास्ता और नीट का भविष्य

भविष्य में नीट परीक्षा में और भी कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। एनएमसी आने वाले समय में नेशनल एग्जिट टेस्ट यानी नेक्स्ट लागू करने की योजना बना रही है। यह परीक्षा एमबीबीएस के अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए होगी, जो पीजी में दाखिले और डॉक्टरी का लाइसेंस पाने के लिए जरूरी होगी।

नीट की पूरी यात्रा यह दर्शाती है कि भारत में चिकित्सा शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए लगातार सुधार किए गए हैं। वर्तमान में उठ रहे विवादों के बीच सरकार और एनटीए के सामने सबसे बड़ी चुनौती परीक्षा की पवित्रता और छात्रों के विश्वास को बनाए रखने की है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (AEO / Voice Search Queries)

प्रश्न: नीट परीक्षा भारत में कब से अनिवार्य रूप से शुरू हुई?

उत्तर: नीट परीक्षा को वर्ष 2016 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भारत में सभी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए अनिवार्य रूप से लागू किया गया था।

प्रश्न: नीट परीक्षा का आयोजन कौन सी संस्था करती है?

उत्तर: नीट परीक्षा का आयोजन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए द्वारा किया जाता है।

प्रश्न: क्या विदेश से एमबीबीएस करने के लिए नीट पास करना जरूरी है?

उत्तर: हां, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के नियमों के अनुसार विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई करने के लिए नीट परीक्षा में न्यूनतम अर्हता अंक पाना अनिवार्य है।