क्या मुसलमान गैर-मुस्लिम शासन के तहत फल-फूल सकते हैं?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 18-09-2026
Can Muslims flourish under non-Muslim rule?.AI-generated representative image.
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fअहमद टी. कुरु

मैंने अपना आधा जीवन तुर्की में बिताया, जहाँ मैं पला-बढ़ा। पिछले एक चौथाई सदी से मैं अमेरिकी नागरिक के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका में रह रहा हूँ। क्या मैं अमेरिका को एक इस्लामिक देश बनाने की कोशिश कर रहा हूँ?

ऐसा सवाल आखिर कौन पूछ सकता है? वे लोग जो इस्लाम की एक मध्ययुगीन और कट्टर समझ रखते हैं,जिन्हें आमतौर पर 'इस्लामवादी' कहा जाता है और वे लोग जो इस्लाम से नफरत करते हैं और इसे एक खतरे के रूप में देखते हैं,जिन्हें आमतौर पर 'इस्लामोफोब' (इस्लाम से डरने या द्वेष रखने वाले) कहा जाता है।

ये दोनों समूह खुद को एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत दिखाते हैं, फिर भी वे अक्सर इस्लाम के बारे में एक जैसी ही धारणा रखते हैं। इस्लामवादी और इस्लामोफोब दोनों का यह मानना है कि इस्लाम धर्म और राज्य के बीच कोई भेद नहीं करता है।

मैं इस बात को अच्छी तरह जानता हूँ , क्योंकि जब से मेरी पुस्तक'इस्लाम, अधिनायकवाद और अल्पविकास: एक वैश्विक और ऐतिहासिक तुलना' (जिसे हिंदी और उर्दू सहित पंद्रह भाषाओं में अनुवादित किया गया है) प्रकाशित हुई , तब से मुझे इन दोनों ही समूहों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है।

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इस्लामवादियों के लिए, मेरा यह तर्क स्वीकार्य नहीं है कि आठवीं और ग्यारहवीं सदी के मध्य के बीच मुस्लिम दुनिया में धार्मिक और राजनीतिक सत्ताएँ काफी हद तक अलग थीं। वे इस्लाम को एक ऐसे संपूर्ण खाके (blueprint) के रूप में देखते हैं जो व्यक्तिगत आचरण से लेकर सरकार चलाने तक हर चीज़ को नियंत्रित करता है।

इस दृष्टिकोण के अनुसार, शरिया की व्याख्या और विस्तार उलेमा (धार्मिक विद्वानों) द्वारा किया जाना चाहिए, जिन्हें राजनीतिक शासकों के साथ एक गठबंधन बनाना चाहिए।अल-मावर्दी और अल-गजाली, ग्यारहवीं सदी के दो प्रभावशाली विद्वान, एक ऐसे राजनीतिक व्यवस्था की कल्पना करते थे जिसके शीर्ष पर एक खलीफा हो।

इसके लगभग दो शताब्दी बाद, इब्न तैमिया ने एक ऐसी व्यवस्था को प्राथमिकता दी जिसका नेतृत्व संयुक्त रूप से उलेमा और शासक करें। उनकी व्याख्या उस व्यवस्था को प्रस्तुत करती है जिसे मैं 'उलेमा-राज्य गठबंधन' कहता हूँ, और जिसे वे दैवीय रूप से निर्धारित राजनीतिक व्यवस्था मानते हैं।

अब सीधे बीसवीं और इक्कीसवीं सदी पर आते हैं। मिस्र में हसन अल-बन्ना और पाकिस्तान में अबुल आला मौदुदी जैसे इस्लामवादियों ने, ग्यारहवीं सदी के बाद की उलेमा परंपरा से प्रेरणा लेते हुए, इस्लाम को धर्म और राज्य दोनों को समेटने वाली एक संपूर्ण व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया।

मौदुदी ने आगे यह तर्क दिया कि जीवन के हर क्षेत्र,जिसमें राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और समाज शामिल हैं का इस्लामीकरण एक ऐसी इस्लामिक व्यवस्था के तहत किया जाना चाहिए जिसकी कल्पना उन्होंने एक 'इस्लामिक राज्य' के रूप में की थी।

इस दृष्टिकोण से, अमेरिका, भारत या किसी अन्य गैर-मुस्लिम बहुसंख्यक देश में रहने वाले मुसलमान के पास केवल दो ही विकल्प हैं: या तो वह देश छोड़कर चला जाए या फिर समाज और राज्य के इस्लामीकरण के लक्ष्य के साथ वहीं रहे। वे पूरी तरह से भ्रमित और गलत हैं।

इस्लाम मुख्य रूप से राजनीति के बारे में नहीं है; यह नैतिकता, नैतिक सिद्धांतों, एक अच्छा जीवन जीने, न्याय स्थापित करने और अन्याय का विरोध करने के बारे में है। व्यक्ति ईश्वर के प्रति जवाबदेह हैं और परलोक में उन्हें व्यक्तिगत रूप से ही पुरस्कृत या दंडित किया जाएगा। एक नेकी भरा जीवन जीना ही इस्लाम का केंद्रीय उद्देश्य है।

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दूसरों की मदद को उठे हाथ

इसलिए, एक मुसलमान संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत या किसी अन्य देश के कानूनों का पालन करके वहाँ का एक वफादार विश्वासी और एक अच्छा नागरिक बन सकता है। मुसलमानों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने अनुबंधों और बचनों का सम्मान करें, और नागरिकता एक प्रमुख प्रतिबद्धता है।

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इस्लामोफोब, जिनका प्रभाव दुनिया के कई हिस्सों में हाल ही में उभरे लोकलुभावन राष्ट्रवाद के साथ बढ़ा है, वे भी उतने ही गलत हैं।

वे दावा करते हैं कि इस्लाम स्वाभाविक रूप से हिंसक है और जिहाद के माध्यम से आक्रामक युद्ध का आदेश देता है। ऐतिहासिक साक्ष्य इस दावे का समर्थन नहीं करते हैं। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध जैसे हिंसक संघर्षों के प्रमुख दौर में मुसलमानों की कोई केंद्रीय भूमिका नहीं थी। अधिक व्यापक रूप से कहें तो, आधुनिक युद्ध धार्मिक सिद्धांतों के बजाय मुख्य रूप से भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, शाही महत्वाकांक्षाओं और राष्ट्रवाद से प्रेरित रहे हैं।

वे मुसलमानों की कई अन्य पहचानों-पेशेवर, बुद्धिजीवियों, उद्यमियों, कलाकारों और विभिन्न जातीय व सांस्कृतिक समुदायों के सदस्यों के रूप में,को नजरअंदाज करते हुए उन्हें केवल एक एकल धार्मिक पहचान तक सीमित कर देते हैं। संक्षेप में कहें तो, वे उन्हें उनके देशों के सह-नागरिक के रूप में नहीं देखते।

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इस्लामोफोब लोगों की यह शत्रुता शायद ही कभी केवल मुसलमानों तक सीमित होती है; यह अक्सर अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों तक भी फैल जाती है। वे उन तमाम योगदानों को पहचानने में असफल रहते हैं जो अल्पसंख्यक समाज को देते हैं।

इतिहास गवाह है कि अल्पसंख्यक अक्सर बौद्धिक और आर्थिक रचनात्मकता के प्रमुख स्रोत रहे हैं। आठवीं और ग्यारहवीं सदी के बीच विज्ञान के 'मुस्लिम स्वर्ण युग' के दौरान, कई अग्रणी विद्वान और दार्शनिक फारसी (Persian) थे।

ब्रिटेन में, प्रबोधन (Enlightenment) को अक्सर 'स्कॉटिश' कहा जाता है क्योंकि इसके कई अग्रणी विचारक स्कॉटलैंड से आए थे। हाल की शताब्दियों में, यहूदी अल्पसंख्यकों ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका में विज्ञान, दर्शन और कला में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

जो देश प्रवासियों को अस्वीकार करते हैं या अल्पसंख्यकों का सम्मान करने में विफल रहते हैं, वे अपनी गतिशीलता और रचनात्मकता खो देते हैं। इसके विपरीत, अप्रवासी और अल्पसंख्यक अमेरिकी शैक्षणिक, वैज्ञानिक और आर्थिक उपलब्धियों के पीछे मुख्य प्रेरक शक्तियों में से रहे हैं।

इस पूरी चर्चा की केंद्रीय अवधारणा 'नागरिकता' है। इस्लामवादी इसके केंद्रीय महत्व से इनकार करते हैं क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि अंततः सभी मुसलमानों को मुस्लिम बहुसंख्यक शासन पर आधारित एक इस्लामिक राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बन जाना चाहिए।

दूसरी ओर, इस्लामोफोब मुसलमानों को पूर्ण नागरिकता देने से इनकार करते हैं क्योंकि वे ऐसे समाजों की कल्पना करते हैं जहाँ मुसलमान कभी भी पूरी तरह से अपने नहीं हो सकते। दोनों ही दृष्टियों में भूल है।

वास्तविकता यह है कि मुसलमान उन देशों के समान नागरिक हो सकते हैं जिनमें वे रहते हैं। यह पूरी तरह से आस्था, नैतिकता और नैतिक सिद्धांतों से निर्देशित होकर पूरी तरह से इस्लामिक जीवन जीने के अनुकूल है।

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विदेशों में अन्य समाज के साथ रचे-बसे मुस्लिम युवा। सारी तस्वीरें एआई निर्मित हैं।

कुरान भी यह सिखाता है कि ईश्वर ने मानव जाति को अलग-अलग "जातियों और कबीलों में इसलिए बनाया ताकि तुम एक-दूसरे को जान सको" (49:13), न कि इसलिए कि एक समूह दूसरे पर हावी हो जाए।

इस्लाम मुसलमानों से राजनीतिक सत्ता की मांग नहीं करता है। इसके बजाय, यह उन्हें पुकारता है कि वे जहाँ कहीं भी रहें, ईश्वर की इबादत करें, न्याय को बनाए रखें, अपने वचनों का सम्मान करें और समाज की भलाई के लिए कार्य करें।

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