कश्मीर के गांवों में शिक्षा की अलख जगा रहे किफायतुल्लाह मलिक

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  [email protected] | Date 18-09-2026
Kifayatullah Malik is igniting the flame of education in the villages of Kashmir.
Kifayatullah Malik is igniting the flame of education in the villages of Kashmir.

 

ओनिका माहेश्वरी / नई दिल्ली

“मैं अपने परिवार का पहला बच्चा था जो स्कूल गया। मेरे पिता किसान हैं। अपने अनुभव की वजह से मैंने तय किया कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं रहना चाहिए।” यह कहना है कश्मीर में समाज सेवा करने वाले किफायतुल्लाह मलिक का, जिन्हें 2021-22में नेशनल सोशल सर्विस के लिए प्रतिष्ठित प्रेसिडेंट्स अवॉर्ड मिला था।

बांदीपोरा के एक छोटे से गाँव से ताल्लुक रखने वाले 25वर्षीय किफायतुल्लाह मलिक आज किसी परिचय के मोहताज नहीं। वह एक समर्पित सोशल वर्कर और पर्वतारोही हैं, जो शिक्षा और युवाओं को सशक्त बनाकर समाज में बदलाव लाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

'आवाज़-द वॉयस' से बातचीत में वे कहते हैं-"उनका काम पहाड़ी इलाकों में रहने वाले बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करना है। वे उन्हें खेलों में शामिल होने के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि उनका मुख्य मिशन वंचित बच्चों का उत्थान करना है।“

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संघर्षों से भरी शुरुआती राह और शिक्षा का सफर

किफायतुल्लाह ने बॉयज़ मिडिल स्कूल, लवेपोरा से अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की और बाद में श्रीनगर के अमर सिंह कॉलेज से सोशियोलॉजी और पॉलिटिकल साइंस में बैचलर डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने कश्मीर यूनिवर्सिटी से सोशल वर्क में मास्टर्स की डिग्री पूरी की।

अपने छात्र जीवन को याद करते हुए वे बताते हैं,” वे हमेशा टीम गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल रहते थे। उन्होंने बहुत करीब से देखा था कि उनके ज़्यादातर क्लासमेट्स ने आर्थिक तंगी या घरेलू मजबूरियों के कारण स्कूल छोड़ दिया था।“ इन्हीं अनुभवों ने उनके भीतर समाज के लिए कुछ कर गुजरने की नींव रखी।

कॉलेज के दिनों में उन्होंने स्कूल छोड़ने वाले छात्रों को वापस मुख्यधारा में लाने के लिए एक जैसे विचारों वाले युवाओं का एक मजबूत ग्रुप तैयार किया। क्राउड-फंडिंग के ज़रिए अपने इस मिशन को आगे बढ़ाते हुए किफायतुल्लाह ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

चूंकि वे बांदीपोरा के पहले प्रोफेशनल पर्वतारोही हैं, इसलिए उन्होंने छात्रों को ट्रेक पर ले जाकर उनकी काउंसलिंग की और उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में वे अपने दोस्तों से पुरानी किताबें इकट्ठा करके उन बच्चों में बांटते थे जो उन्हें खरीद नहीं सकते थे।

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दूर-दराज के इलाकों में शिक्षा की अलख: विंटर कम्युनिटी लर्निंग सेंटर्स

अपने अभियानों के हालिया विकास के बारे में साझा करते हुए किफायतुल्लाह बताते हैं, “हाल की कुछ डेवलपमेंट्स हैं, उनमें पहला है ईद फूड किट्स का डिस्ट्रीब्यूशन, जिसमें हमने कश्मीर के छह जिलों में 205 परिवारों को ईद फूड किट्स बांटे।

और वैसे ही, जो उससे बड़ा इनिशिएटिव था, वह था विंटर कम्युनिटी लर्निंग सेंटर्स। यह जो विंटर कम्युनिटी लर्निंग सेंटर्स हैं, ये हमने तीन ऐसे इलाकों में सेटअप किए जो सर्दियों में पूरी तरह से कट-ऑफ हो जाते हैं, और ऐसे इलाकों में जहाँ बच्चों ने इससे पहले कभी सर्दियों में ट्यूशन ही नहीं पढ़ा था।”

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उन्होंने आगे बताया कि यह अंतराल लंबे समय में बच्चों के ड्रॉपआउट का बड़ा कारण बन जाता था, क्योंकि 3से 4महीने तक पढ़ाई से पूरी तरह कट जाने के कारण बच्चे स्कूल छोड़ देते थे। इस समस्या से निपटने के लिए उन्होंने विशुद्ध रूप से वॉलंटरी बेसिस पर छांदाजी, केत्सन और रेशवारी में तीन ट्यूशन व विंटर कम्युनिटी लर्निंग सेंटर्स सेटअप किए, जिनके ज़रिए सर्दियों के दौरान 400 बच्चों की पढ़ाई लगातार जारी रखी गई।

स्थानीय पीजी या ग्रेजुएट युवाओं को वॉलंटियर के रूप में मोबिलाइज़ किया गया और 'संडे फॉर सोसाइटी' के तहत विभिन्न अकादमियों के प्राइवेट टीचर्स को जोड़कर बच्चों की कम्युनिकेशन स्किल्स, लीडरशिप स्किल्स, इंटरपर्सनल और पर्सनालिटी डेवलपमेंट स्किल्स को निखारा गया।

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स्टेशनरी वितरण से लेकर मैरिज असिस्टेंस और स्किल डेवलपमेंट तक

पहाड़ी और ट्राइबल कम्युनिटीज़ के बीच सर्दियों में आजीविका के साधन न होने के कारण कई परिवारों के लिए बच्चों की स्टेशनरी का खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है, जिससे तंग आकर वे पढ़ाई छुड़वा देते हैं।

इस खाई को पाटने के लिए किफायतुल्लाह की टीम ने अब तक 540से अधिक ज़रूरतमंद बच्चों तक स्टेशनरी सप्लाई पहुँचाई है। इसके साथ ही, उन्होंने कुछ मैरिज असिस्टेंस के मामलों के लिए फंड्स जुटाकर मदद की और मेडिकल या नर्सिंग कोर्स कर रहे मेधावी बच्चों की फीस भरकर उनकी उच्च शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया।

ग्रामीण महिलाओं और फीमेल आंत्रप्रेन्योर्स के लिए उन्होंने स्किल डेवलपमेंट के अवसर मुहैया कराए। दूर-दराज़ के ट्राइबल इलाकों की महिला उद्यमियों द्वारा बनाए जाने वाले प्रोडक्ट्स की मार्केटिंग और प्रमोशन वे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए करते हैं, ताकि अन्य लड़कियां भी प्रेरित होकर अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।

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जागरूकता कैंप और बहुआयामी समाज सेवा

किफायतुल्लाह ने अपनी टीम के साथ मिलकर केत्सन, डाखी, डंगरनार और चिनचार जैसे दूर-दराज़ के इलाकों में व्यापक जागरूकता कैंप भी लगाए हैं। इन अभियानों के जरिए उन्होंने महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की, उन्हें सरकारी योजनाओं से अवगत कराया, पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया और नशीली दवाओं के दुरुपयोग के खिलाफ युवाओं को सचेत किया।

उनका यह कारवां आज पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा, नशा मुक्ति, पर्यटन को बढ़ावा देने और मानवीय सहायता जैसे तमाम क्षेत्रों तक फैल चुका है। वर्तमान में वे REACHA (रिसर्च एंड एक्सटेंशन एसोसिएशन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ हॉर्टिकल्चर एंड एग्रो-फॉरेस्ट्री) के स्मार्टपुर प्रोजेक्ट के साथ डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर के रूप में भी कार्यरत हैं, जिसके माध्यम से वे कश्मीर के दूर-दराज़ इलाकों में डिजिटल अंतर को पाटने का सराहनीय कार्य कर रहे हैं।

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सम्मान और बुलंद इरादे

किफायतुल्लाह मलिक के अथक प्रयासों और समाज सेवा के प्रति उनकी निष्ठा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली, जब देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया।

इसके अलावा उन्हें जम्मू-कश्मीर के सोशल फॉरेस्ट्री विभाग की ओर से 'बेस्ट फॉरेस्ट फ्रेंड अवॉर्ड', 'एम्बेसडर ऑफ ह्यूमैनिटी अवॉर्ड 2024' (जो भारत भर में 10अलग-अलग क्षेत्रों के 10लोगों को दिया जाता है), समाज सेवा के लिए वर्ष 2024का पुरस्कार, 'ग्लोबल ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड' और 'ADG का एप्रिसिएशन अवॉर्ड 2019' जैसे तमाम प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं।

किफायतुल्लाह विश्वास के साथ कहते हैं, "जब आपकी नीयत साफ़ होती है, तो हर कोई आपकी मदद करता है।" वे आगे कहते हैं, "मैं स्कूल छोड़ने वाले बच्चों (ड्रॉपआउट्स) की समस्याओं को समझना और उनका समाधान खोजना चाहता हूँ।

हमारी टीम के सभी सदस्य बहुत जोश से भरे हुए हैं। उनका मानना है कि युवा ही किसी भी देश का भविष्य होते हैं और जब वे अपनी सोच बदलेंगे और अपने जीवन को बेहतर बनाएंगे, तभी असल बदलाव आ सकता है।"