भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का हालिया रियाद दौरा ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया का भू राजनीतिक संतुलन तेजी से बदल रहा है। पश्चिम एशिया से लेकर यूरोप तक अस्थिरता के संकेत हैं। ऐसे माहौल में यह यात्रा केवल शिष्टाचार मुलाकात नहीं थी। इसके पीछे साफ रणनीतिक संदेश छिपा है।
रविवार को डोभाल रियाद पहुंचे। यहां उन्होंने सऊदी अरब के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की। भारतीय दूतावास ने बताया कि इन बैठकों में द्विपक्षीय संबंधों, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय हालात पर गंभीर चर्चा हुई। यह संकेत है कि भारत अब सऊदी अरब के साथ रिश्तों को नई गहराई देना चाहता है।
डोभाल की सबसे अहम मुलाकात सऊदी ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुलअजीज बिन सलमान से रही। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा सऊदी अरब से हासिल करता है। ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा हमेशा प्राथमिकता में रहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लगातार बदल रही हैं। सप्लाई चेन पर भी दबाव है। इस पृष्ठभूमि में यह बातचीत खास मायने रखती है।
इसके अलावा डोभाल ने सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डॉ मूसाएद अल ऐबन से भी मुलाकात की। इन बैठकों में सुरक्षा सहयोग पर जोर रहा। आतंकवाद से निपटने और खुफिया साझेदारी को मजबूत करने पर बात हुई। पश्चिम एशिया की बदलती स्थिति भी चर्चा का हिस्सा रही। दोनों देशों ने माना कि स्थिरता के लिए मिलकर काम करना जरूरी है।
भारत और सऊदी अरब के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदले हैं। पहले यह संबंध तेल और प्रवासी भारतीयों तक सीमित थे। अब इसमें रक्षा, तकनीक और निवेश जैसे नए क्षेत्र जुड़ चुके हैं। भरोसा भी बढ़ा है। यही वजह है कि दोनों देश अब दीर्घकालिक साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं।
रियाद दौरे से पहले डोभाल की एक और अहम बैठक हुई थी। उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा परिषद के सचिव रुस्तम उमरोव से मुलाकात की। यह बातचीत ऐसे समय हुई जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध लंबा खिंच चुका है। इस मुलाकात ने भारत की संतुलित नीति को फिर सामने रखा।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार इस बैठक में दोनों देशों के सुरक्षा संबंधों की समीक्षा हुई। रूस यूक्रेन संघर्ष पर भी चर्चा हुई। भारत ने एक बार फिर साफ किया कि वह युद्ध का समाधान बातचीत से चाहता है। यह रुख पहले भी सामने आ चुका है।
भारत की विदेश नीति का यही संतुलन उसकी ताकत बनता जा रहा है। एक तरफ वह सऊदी अरब जैसे अहम ऊर्जा साझेदार के साथ रिश्ते मजबूत करता है। दूसरी तरफ वह यूरोप के जटिल मुद्दों पर भी संवाद बनाए रखता है। यही कारण है कि भारत को एक भरोसेमंद देश के रूप में देखा जा रहा है।
रूस यूक्रेन युद्ध का असर पूरी दुनिया पर पड़ा है। ऊर्जा की कीमतें बढ़ीं। खाद्य आपूर्ति प्रभावित हुई। कई देशों की अर्थव्यवस्था दबाव में आई। डोभाल और उमरोव की बातचीत में इन सभी मुद्दों पर चर्चा हुई। यह समझ बनी कि यह संघर्ष जितना लंबा चलेगा, असर उतना व्यापक होगा।
रियाद की बैठकों में भी यही व्यापक सोच नजर आई। भारत ने संकेत दिया कि वह केवल अपने हित नहीं देख रहा है। वह क्षेत्रीय शांति और स्थिरता में भी भूमिका निभाना चाहता है। सऊदी अरब के साथ सहयोग इसी दिशा में अहम कड़ी है।
भारत की नजर अब पश्चिम एशिया पर पहले से ज्यादा है। खाड़ी देशों के साथ बढ़ते संबंध आर्थिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से जरूरी हैं। ऊर्जा, निवेश और सुरक्षा तीनों ही क्षेत्रों में सहयोग बढ़ रहा है। सऊदी अरब भी भारत को एक स्थिर और भरोसेमंद साझेदार मानता है।
डोभाल का यह दौरा कई संकेत छोड़ गया है। यह दिखाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर ज्यादा सक्रिय है। वह संतुलन बनाकर आगे बढ़ना चाहता है। आने वाले समय में इन बातचीतों का असर दोनों देशों के रिश्तों पर दिखेगा। साथ ही क्षेत्रीय हालात पर भी इसका असर पड़ सकता है।