सानिया अंजुम
फौकिया वाजिद(Fouqia Wajid) का मानना है कि काबिलियत का मतलब दूसरों से आगे निकलना नहीं, बल्कि खुद के लिए तय किए गए पैमानों को और ऊंचा करना है। दिलचस्प बात यह है कि उनके नाम 'फौकिया' का मतलब भी यही है- 'सबसे बेहतर होना'। साल 1992 में उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां विद्वता, भाषा और नई चीजें सीखने की ललक रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी। जब उनका जन्म हुआ, तब उनकी मां अपनी पीएचडी की थीसिस पूरी कर रही थीं। यहीं से फौकिया को समझ आ गया कि पढ़ाई सिर्फ डिग्री लेने के लिए नहीं, बल्कि खुद को निखारने के लिए की जाती है।
एक साहित्यिक माहौल में पली-बढ़ी फौकिया के लिए कला कोई अलग चीज नहीं थी। उनके लिए साहित्य जीवन के उतार-चढ़ाव को समझने का एक जरिया था। बचपन में होने वाली साहित्यिक गोष्ठियों और शायरी की बातों ने उनकी सोच को बहुत कम उम्र में ही परिपक्व बना दिया। लिखना उनके लिए बेहद स्वाभाविक था।

पहली क्लास में उन्होंने अपनी पहली कविता 'स्काई' लिखी और महज 16साल की उम्र में उनका अंग्रेजी कविता संग्रह 'स्क्रीच' प्रकाशित हो गया। वह कहती हैं कि लिखना उनके लिए कोई चुनाव नहीं था, बल्कि दुनिया को समझने का उनका अपना तरीका था।
मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई करने का उनका फैसला काफी साहसी था। उस दौर में रचनात्मक करियर को, खासकर महिलाओं के लिए, बहुत व्यावहारिक नहीं माना जाता था। उन्हें अपने इस फैसले के लिए काफी आलोचनाएं भी झेलनी पड़ीं।
वह याद करती हैं कि जब उन्होंने मास कम्युनिकेशन चुना,तो उन पर कई सवाल उठाए गए। लेकिन वह जानती थीं कि यह एक जरूरी औजार है। उनका मानना था कि अगर आप अपनी कहानी खुद नहीं कहेंगे, तो कोई और आपके बारे में अपनी मर्जी से राय बना लेगा। इसके बाद उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया। वहां वह छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहीं और स्टूडेंट्स प्रेसिडेंट चुनी गईं।
महज 19 साल की उम्र में फौकिया ने एक एनजीओ की नींव रखी। यह संस्था कम और एक आंदोलन ज्यादा था। इसका मकसद उन लोगों को चुप कराना था जो मानते थे कि युवा रचनात्मक क्षेत्रों में गंभीर नहीं होते। सिर्फ 45दिनों के भीतर इस पहल ने अशोक साहनी और एम.एस. सथ्यू जैसे दिग्गजों का ध्यान खींचा। फौकिया का मानना था कि हुनर के लिए उम्र का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए।
उनका रचनात्मक सफर जल्द ही मेनस्ट्रीम मीडिया तक पहुंच गया। वह 'वायकॉम 18' के कलर्स कन्नड़ चैनल के लिए चुनी गईं पहली चार लेखिकाओं में से एक थीं। उन्होंने लोकप्रिय शो 'राधा रमना' के 150से ज्यादा एपिसोड लिखे। उनके पास इंजीनियरिंग की सीट थी, लेकिन उन्होंने अनिश्चितता के बावजूद कहानियों की दुनिया को चुना।
इसके बाद वह मुंबई चली गईं, जहां उन्होंने वायकॉम 18मोशन पिक्चर्स में प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया। उन्होंने देश भर की स्क्रिप्ट्स पर काम किया और बड़े प्रोजेक्ट्स का हिस्सा रहीं। लेकिन इस कमर्शियल कामयाबी ने कभी उनके असल मकसद को धुंधला नहीं होने दिया। उनका कहना है कि बड़े प्लेटफॉर्म आपको पहुंच तो देते हैं, लेकिन आपकी नीयत ही तय करती है कि आपके काम का कोई मतलब निकलेगा या नहीं।
दस्तावेजी फिल्में बनाना और संस्कृति को संजोना उनका असली जुनून था। उन्होंने कर्नाटक उर्दू अकादमी के तहत वहां के नामी उर्दू लेखकों पर डॉक्यूमेंट्रीज बनाईं। उन्होंने उन लेखकों की आवाज को जनता तक पहुंचाया जिन्हें अक्सर भुला दिया गया था।

अपने पति रिजवान के साथ मिलकर उन्होंने अपनी मां फौजिया चौधरी पर 'फौजिया नामा' नाम की फिल्म बनाई। वह कहती हैं कि यह फिल्म सिर्फ उनकी मां के बारे में नहीं थी, बल्कि उन तमाम महिलाओं के बौद्धिक योगदान को दर्ज करने की कोशिश थी जिसे अक्सर समाज अनदेखा कर देता है।
आज 'ज़ूक फिल्म्स' (Zooq Films) की सीईओ के तौर पर फौकिया कला और व्यापार के बीच एक संतुलन बनाकर चल रही हैं। मर्सिडीज-बेंज और एमटीआर जैसे बड़े ब्रांड्स के साथ काम करने के साथ-साथ वह स्वतंत्र फिल्में भी बना रही हैं। एक लीडर के तौर पर वह सहानुभूति और मार्गदर्शन पर भरोसा करती हैं। वह जानती हैं कि अपनी जगह बनाना कितना मुश्किल है, इसलिए वह अपनी टीम में हर किसी की आवाज को तवज्जो देती हैं।
फौकिया का काम अक्सर महिलाओं के प्रतिनिधित्व और सामाजिक सोच जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द रहता है। वह पॉडकास्ट और फिल्मों के जरिए महिलाओं को अपने 'कंफर्ट जोन' से बाहर आने के लिए प्रेरित करती हैं। उनका मानना है कि महिलाओं में अपार क्षमता है, लेकिन डर और पुरानी सोच उन्हें पीछे खींचती है।
वह स्वीकार करती हैं कि एक महिला के लिए राह दस गुना ज्यादा मुश्किल है। फिर भी वह डिजिटल मीडिया के इस दौर में उम्मीद देखती हैं। उनका कहना है कि आज ओटीटी और डिजिटल टूल्स की वजह से महिलाएं खुद अपना कंटेंट तैयार कर सकती हैं।

वह चुप रहने के नतीजों को लेकर भी सचेत करती हैं। वह चेतावनी देती हैं कि जब हमारी अपनी कहानियां गायब होती हैं, तो दूसरे लोग हमें परिभाषित करने लगते हैं। इसी सोच की वजह से वह मास कम्युनिकेशन को एक ताकतवर हथियार मानती हैं। उनका कहना है कि भले ही रेडियो या टीवी की रफ्तार कम हुई हो, लेकिन कहानी कहना कभी बंद नहीं होगा। वह कहती हैं कि कोई आपको यह नहीं कह सकता कि पत्रकारिता, राजनीति या मीडिया आपके लिए नहीं बना है।
अब वह अपनी जिंदगी के एक नए दशक में कदम रख रही हैं। वह मास कम्युनिकेशन में पीएचडी कर रही हैं और अपना बिजनेस भी बढ़ा रही हैं। आज फौकिया के लिए सफलता का मतलब सिर्फ पैसा या शोहरत नहीं, बल्कि काम का प्रभाव है।

वह कहती हैं कि सफलता यह है कि आपका काम किसी की सोच बदले या उसे सशक्त बनाए। आने वाले समय में जब भी फौकिया वाजिद का नाम लिया जाएगा, तो उसे सिर्फ उनकी रचनात्मकता के लिए नहीं, बल्कि उनके साहस के लिए याद किया जाएगा। एक ऐसा साहस जिसने लीक से हटकर रास्ता चुना और यह साबित किया कि अपनी कहानी खुद कहना कितना जरूरी है।