राजस्थान के सीकर जिले के एक छोटे से गांव रोलसाहबसर से एक ऐसी खबर आई है, जिसने शिक्षा और समाज दोनों को नई दिशा देने का काम किया है। यहां सरकारी स्कूल की एक छात्रा को 95.50 प्रतिशत अंक लाने पर स्विफ्ट कार उपहार में दी गई। यह सिर्फ एक इनाम नहीं था, बल्कि बेटियों की शिक्षा को लेकर एक बड़ा संदेश था।
अक्सर देखा जाता है कि निजी स्कूलों में अच्छे अंक लाने पर जश्न होता है। लेकिन सरकारी स्कूलों के बच्चों की उपलब्धियां कई बार सीमित दायरे में ही रह जाती हैं। ऐसे माहौल में गांव के युवा आदिल खान ने एक नई सोच के साथ पहल की। उन्होंने साबित किया कि अगर इरादा मजबूत हो तो बदलाव की शुरुआत कहीं से भी हो सकती है।
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय रोलसाहबसर की छात्रा एंजल खान ने 10वीं बोर्ड परीक्षा में 95.50 प्रतिशत अंक हासिल किए। उनकी इस उपलब्धि पर आदिल खान ने अपने निजी खर्च से उन्हें स्विफ्ट कार भेंट की। गांव के मुख्य चौक में आयोजित समारोह में जब एंजल को कार की चाबी सौंपी गई, तो यह दृश्य पूरे इलाके के लिए प्रेरणा बन गया।

एंजल अकेली नहीं थीं। 90 प्रतिशत से अधिक अंक लाने वाली पांच अन्य छात्राओं को भी एक एक लाख रुपये का चेक देकर सम्मानित किया गया। इनमें अक्ष्सा खान, सोफिया खान, पायल कुमारी, रूक्या बानो और फरीन खान शामिल हैं। इन छात्राओं के चेहरों पर खुशी साफ दिख रही थी। यह सम्मान उनके आत्मविश्वास को नई ऊंचाई देने वाला था।
इस कार्यक्रम में आरएससीईआरटी उदयपुर के अतिरिक्त निदेशक बजरंग लाल स्वामी और फतेहपुर विधायक हाकम अली खां मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। उन्होंने आदिल खान की इस पहल की खुलकर सराहना की। वक्ताओं ने कहा कि इस तरह के प्रयास समाज में सकारात्मक बदलाव लाते हैं और लोगों को शिक्षा के महत्व का एहसास कराते हैं।
कार्यक्रम के दौरान गांव की अन्य प्रतिभाशाली छात्राओं को भी सम्मानित किया गया। साथ ही तीनों सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को भी बेहतर परिणाम के लिए सम्मान मिला। यह एक ऐसा मंच था जहां मेहनत, लगन और समर्पण को खुले दिल से सराहा गया।
आदिल खान की खास बात यह है कि वे कोई बड़े उद्योगपति नहीं हैं। उन्होंने यह पूरा खर्च अपनी मेहनत की कमाई से किया। यही वजह है कि उनकी पहल लोगों के दिलों को छू रही है। उन्होंने दिखाया कि समाज में बदलाव लाने के लिए सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि सोच और नीयत बड़ी होनी चाहिए।
आदिल खान का सपना साफ है। वे चाहते हैं कि उनके गांव की बेटियां आगे बढ़ें। वे आईएएस, आईपीएस और न्यायिक सेवा जैसे बड़े पदों तक पहुंचें। उनका कहना है कि रोलसाहबसर को अब सिर्फ राजनीति के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा के लिए भी जाना जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी घोषणा की है कि आने वाले तीन वर्षों तक वे इसी तरह मेधावी छात्राओं को सम्मानित करते रहेंगे। इस ऐलान के बाद गांव में एक नई ऊर्जा देखने को मिल रही है। अभिभावक अपनी बेटियों को स्कूल भेजने के लिए अधिक उत्साहित हैं। छात्राओं में भी बेहतर प्रदर्शन करने की होड़ बढ़ी है।
इस पहल का असर सिर्फ पुरस्कार तक सीमित नहीं है। यह गांव के सामाजिक ढांचे को भी बदल रहा है। जहां पहले बेटियों की पढ़ाई को लेकर संकोच होता था, अब वहां गर्व की भावना नजर आ रही है। लोग खुलकर कह रहे हैं कि बेटियां भी किसी से कम नहीं हैं।
समारोह में बड़ी संख्या में ग्रामीण, शिक्षक, छात्र और जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। हर किसी के चेहरे पर संतोष था। यह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक नई सोच का उत्सव था।आज जब शिक्षा और समान अवसरों की बात होती है, तो ऐसे उदाहरण उम्मीद जगाते हैं। रोलसाहबसर की यह कहानी बताती है कि बदलाव की शुरुआत किसी एक व्यक्ति से भी हो सकती है। जरूरत है तो बस पहल करने की।
आदिल खान की यह पहल अब सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं रही। यह एक संदेश बन चुकी है। एक ऐसा संदेश जो कहता है कि अगर बेटियों को सही अवसर मिले, तो वे हर मुकाम हासिल कर सकती हैं।