आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
अमेरिका और ईरान के बीच हाल में हुए शांति समझौते ने पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत दिया है। इस समझौते में न केवल दोनों देशों के बीच शत्रुता समाप्त करने का प्रावधान शामिल है, बल्कि इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच संघर्ष विराम तथा लेबनान की क्षेत्रीय संप्रभुता और अखंडता के सम्मान की बात भी कही गई है।
इस घटनाक्रम ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए एक जटिल राजनीतिक और रणनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखना उनकी सरकार की मौजूदा सुरक्षा नीति के केंद्र में रहा है जबकि नया समझौता इसके विपरीत दिशा में संकेत करता है।
खबर के अनुसार, 19 जून को इजराइल और हिजबुल्लाह के बीच एक और संघर्ष विराम पर सहमति बनी थी, लेकिन इसके अगले ही दिन इजराइल द्वारा लेबनान पर की गई बमबारी और उसके जवाब में ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किए जाने से स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई।
इजराइल ने मार्च 2026 से हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियान तेज किया है और दक्षिण व पूर्वी लेबनान में कई क्षेत्रों पर नियंत्रण भी स्थापित किया है। इस दौरान इजराइली रक्षा बल (आईडीएफ) ने हिजबुल्लाह के पारंपरिक गढ़ों को ध्वस्त करते हुए दक्षिण बेरूत में भी हमले किए हैं। इस संघर्ष में अब तक 4,000 से अधिक लेबनानी नागरिकों की मौत और लगभग 10 लाख लोगों के विस्थापन की खबरें हैं।
आईडीएफ ने कई रणनीतिक इलाकों पर कब्जा करते हुए स्थानीय निवासियों को लौटने से रोकने के आदेश जारी किए हैं। साथ ही इजराइली रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने कहा है कि सुरक्षा क्षेत्रों में इजराइली बल बिना किसी समय सीमा के तैनात रहेंगे और इन इलाकों को “आतंक ढांचे और स्थानीय आबादी से मुक्त” किया जाएगा।
इस सैन्य अभियान को इजराइल में व्यापक समर्थन प्राप्त है। एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 80 प्रतिशत इजराइली नागरिक हिजबुल्लाह के खिलाफ युद्ध जारी रखने के पक्ष में हैं, भले ही इससे अमेरिका के साथ तनाव बढ़े।