NEET परीक्षा में मस्जिदों ने खोले इंसानियत के दरवाजे

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 24-06-2026
Mosques step up to support parents of NEET aspirants; Bhiwandi sets an example.
Mosques step up to support parents of NEET aspirants; Bhiwandi sets an example.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

ऐसे समय में जब देश के विभिन्न हिस्सों से धर्म और पहचान के आधार पर भेदभाव की खबरें सामने आती रहती हैं, महाराष्ट्र के भिवंडी शहर ने इंसानियत, मोहब्बत और सामाजिक एकता की ऐसी मिसाल पेश की है जिसने हर संवेदनशील इंसान का दिल जीत लिया। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) के दौरान शहर की मस्जिदों, मुस्लिम समाज की आवासीय समितियों और सामाजिक संस्थाओं ने सैकड़ों अभिभावकों के लिए अपने दरवाज़े खोल दिए और यह संदेश दिया कि जब बात बच्चों के भविष्य और शिक्षा की हो, तब मजहब, जाति और समुदाय की दीवारें अपने आप छोटी पड़ जाती हैं।

NEET परीक्षा में शामिल होने के लिए दूर-दराज़ इलाकों से हजारों विद्यार्थी अपने अभिभावकों के साथ भिवंडी पहुंचे थे। परीक्षा केंद्रों के बाहर तेज धूप, उमस भरी गर्मी और कई घंटों तक इंतजार की मजबूरी को देखते हुए स्थानीय मुस्लिम समाज आगे आया और उसने ऐसी व्यवस्था की, जिसकी आज के दौर में हर तरफ सराहना हो रही है।

शहर की कई मस्जिदों, दारुल उलूम दीनियात, मुस्लिम आवासीय समितियों और सामाजिक संगठनों ने अभिभावकों के बैठने, आराम करने और समय बिताने के लिए अपने परिसर उपलब्ध कराए। लोगों के लिए ठंडी और छायादार जगहों की व्यवस्था की गई। कई स्थानों पर पंखों से सुसज्जित हॉल खोले गए, जहां अभिभावक आराम से बैठ सके। पीने के लिए ठंडा पानी, चाय, नाश्ता और अन्य आवश्यक सुविधाएं भी पूरी निःस्वार्थ भावना के साथ उपलब्ध कराई गईं।

इस पहल का लाभ सैकड़ों अभिभावकों को मिला, जिन्हें भीषण गर्मी में घंटों सड़क किनारे खड़े रहने या इधर-उधर भटकने की परेशानी से राहत मिली। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इन व्यवस्थाओं में किसी भी प्रकार का धार्मिक या सामाजिक भेदभाव नहीं किया गया। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई—हर समुदाय के लोगों का समान सम्मान और आत्मीयता के साथ स्वागत किया गया।

इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं भी अपने बच्चों के साथ परीक्षा केंद्रों तक पहुंची थीं। उनके लिए भी अलग और सुरक्षित बैठने की व्यवस्था की गई। स्थानीय स्वयंसेवकों ने लगातार अभिभावकों की जरूरतों का ध्यान रखा और उन्हें घर जैसा माहौल देने की कोशिश की।

परीक्षा समाप्त होने के बाद का दृश्य अत्यंत भावुक और प्रेरणादायक था। कई हिंदू अभिभावकों ने मस्जिद प्रबंधन और स्वयंसेवकों का हाथ जोड़कर धन्यवाद किया। कुछ अभिभावक इतने भावुक हो गए कि उन्होंने सम्मान और कृतज्ञता के भाव से मस्जिद के जिम्मेदार लोगों के चरण स्पर्श कर उनका आभार व्यक्त किया। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि इंसानियत की भाषा किसी धर्म, जाति या समुदाय की मोहताज नहीं होती।

एक अभिभावक ने अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा, "पिछली बार जब हमारी बेटी NEET परीक्षा देने गई थी, तब हमें ऐसी कोई व्यवस्था देखने को नहीं मिली थी। लेकिन इस बार हम पूरा परिवार साथ आया था। बारिश और गर्मी दोनों की चिंता थी। हमें समझ नहीं आ रहा था कि घंटों तक कहां रुकेंगे। तभी यहां एक स्वयंसेविका शमा मिली, जिसने बहुत आत्मीयता से हमें बुलाया और बैठने की व्यवस्था दिखाई। सबसे पहले हमें पानी दिया गया, फिर नाश्ते की व्यवस्था की गई। आराम करने के लिए अलग कमरा दिया गया, जहां बिछौने तक मौजूद थे। हम घंटों तक बेहद आराम से रहे। आज के दौर में इंसानियत का ऐसा सच्चा रूप बहुत कम देखने को मिलता है। हमारा सारा डर, संकोच और घबराहट यहां आकर खत्म हो गई। हमने यहां सच्चा भाईचारा देखा है। यह अनुभव हम जीवनभर नहीं भूलेंगे और हमारी बेटी भी इसे हमेशा याद रखेगी।"

स्थानीय लोगों के अनुसार, मस्जिद प्रबंधन पहले भी ऐसे सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहा है। इस पूरे आयोजन में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। सभी ने मिलकर यह सुनिश्चित किया कि किसी भी अभिभावक को असुविधा न हो और वह अपने बच्चे की परीक्षा के दौरान मानसिक रूप से सहज रह सके।

एक अन्य अभिभावक ने कहा, "हम कल्याण से आए हैं। यहां हमारे लिए बहुत अच्छी व्यवस्था की गई। हमें धूप में खड़ा नहीं रहना पड़ा। पानी, बैठने की जगह और अन्य सभी सुविधाएं उपलब्ध थीं। सबसे बड़ी बात यह है कि यहां सभी लोगों को एक समान सम्मान दिया गया।" सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह सिर्फ सुविधाएं उपलब्ध कराने का मामला नहीं था, बल्कि यह समाज के प्रति जिम्मेदारी और मानवता के उच्च मूल्यों का परिचय भी था। जब बच्चे अपने भविष्य के लिए संघर्ष कर रहे हों, तब समाज का कर्तव्य है कि वह उनके परिवारों के साथ खड़ा हो और उनकी परेशानियों को कम करने का प्रयास करे।

गौरतलब है कि 21 जून को आयोजित NEET-UG परीक्षा में देशभर से लगभग 22 लाख (2.2 मिलियन) से अधिक अभ्यर्थी शामिल हुए। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) द्वारा यह परीक्षा भारत के 551 शहरों में स्थित 5,440 परीक्षा केंद्रों तथा 14 अंतरराष्ट्रीय केंद्रों पर आयोजित की गई थी। परीक्षा के दौरान अभिभावकों को कई घंटों तक बाहर इंतजार करना पड़ा, ऐसे में भिवंडी में की गई यह मानवीय पहल उनके लिए बड़ी राहत साबित हुई।

भिवंडी की यह घटना केवल एक सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत और गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीवंत उदाहरण है। यह वह तस्वीर है जो बताती है कि नफरत की आवाजें चाहे कितनी भी तेज क्यों न हों, मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे की ताकत उनसे कहीं अधिक बड़ी होती है।

 

मस्जिदों, मुस्लिम समाज और स्थानीय स्वयंसेवकों द्वारा किया गया यह कार्य यह संदेश देता है कि इंसान की पहचान उसका धर्म नहीं, बल्कि उसका चरित्र, संवेदनशीलता और दूसरों के लिए आगे बढ़कर मदद करने की भावना होती है। भिवंडी ने पूरे देश को दिखा दिया कि जब दिलों में इंसानियत जिंदा हो, तो हर दरवाज़ा अपने आप खुल जाता है और हर अजनबी अपना बन जाता है।

आज जब समाज को विभाजन नहीं, बल्कि संवाद और सहयोग की आवश्यकता है, तब भिवंडी की यह मिसाल आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी। यह घटना हमेशा याद दिलाएगी कि शिक्षा, मानवता और प्रेम के सामने हर प्रकार की दीवारें छोटी पड़ जाती हैं।