Dr. Sheikh Mohammed: Commitment to education, social change and the future of daughters
अर्सला खान/नई दिल्ली
महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले के अरधापुर स्थित जिला परिषद हाई स्कूल के डॉ. शेख मोहम्मद वकिउद्दीन शेख हमीदुद्दीन उन शिक्षकों में से हैं, जिन्होंने पढ़ाने को सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि समाज बदलने का माध्यम बनाया।
28 वर्षों से अधिक के अपने शैक्षणिक सफर में उन्होंने हजारों बच्चों की जिंदगी को छुआ, लेकिन उनका सबसे बड़ा संघर्ष था—स्कूल छोड़ती बेटियों को फिर से शिक्षा से जोड़ना।
आज डॉ. शेख मोहम्मद का नाम केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे शिक्षा सुधारक के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने अकादमिक उत्कृष्टता, सामाजिक जागरूकता और समुदाय की भागीदारी को एक साथ जोड़कर बदलाव की एक मिसाल पेश की।
जब बेटियों की पढ़ाई बीच में छूटने लगी...
कई क्षेत्रों में लड़कियों की पढ़ाई छोड़ने की एक बड़ी वजह स्कूल की दूरी और सुरक्षित शिक्षा की कमी थी। इस समस्या को डॉ. शेख मोहम्मद ने सिर्फ एक आंकड़े के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसके पीछे छिपे हजारों बेटियों के अधूरे सपनों को महसूस किया। उन्होंने इसका समाधान खोजने का फैसला किया।
उनके प्रयासों से एक अस्थायी स्कूल शाखा स्थापित की गई, ताकि दूरदराज और जरूरतमंद क्षेत्रों की बेटियां सुरक्षित तरीके से अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। इस पहल का असर बेहद बड़ा हुआ। 2,000 से अधिक लड़कियों को सुरक्षित और निरंतर शिक्षा से जोड़ने में मदद मिली। जिन बच्चियों की पढ़ाई छूटने का खतरा था, उनके लिए स्कूल तक पहुंच आसान हुई और शिक्षा उनके जीवन का हिस्सा बनी रही।
सिर्फ शिक्षा नहीं, बेटियों के स्वास्थ्य की भी चिंता
डॉ. शेख मोहम्मद मानते थे कि लड़कियों की शिक्षा की बात तब तक अधूरी है, जब तक उनके स्वास्थ्य और सम्मान की जरूरतों को भी समझा न जाए। मासिक धर्म से जुड़ी झिझक, जागरूकता की कमी और सैनिटरी सुविधाओं के अभाव के कारण कई लड़कियां स्कूल आने से बचती थीं। इस चुनौती को देखते हुए उन्होंने स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ी कई पहल शुरू कीं।
उनके नेतृत्व में लगभग 5 लाख सैनिटरी नैपकिन वितरित किए गए और स्कूल में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन भी स्थापित कराई गई। यह केवल एक स्वास्थ्य अभियान नहीं था। इसका संदेश साफ था बेटियों की शिक्षा और उनका स्वास्थ्य, दोनों बराबर जरूरी हैं।
समुदाय को जोड़ा, स्कूल की तस्वीर बदली
एक अच्छे शिक्षक की पहचान केवल कक्षा तक सीमित नहीं होती। डॉ. शेख मोहम्मद ने यह साबित किया कि अगर शिक्षक समाज और समुदाय को अपने साथ जोड़ ले, तो सीमित संसाधनों में भी बड़े बदलाव किए जा सकते हैं। उन्होंने स्थानीय समुदाय और सहयोगियों को साथ लेकर स्कूल के विकास के लिए करीब 50 लाख रुपये के संसाधन जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस राशि का इस्तेमाल स्कूल के बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने और बच्चों तक आधुनिक व डिजिटल शिक्षा के साधन पहुंचाने में किया गया। जहां कभी संसाधनों की कमी चुनौती थी, वहां अब बेहतर शैक्षणिक सुविधाओं और डिजिटल टूल्स के जरिए बच्चों के लिए नए अवसर तैयार किए गए।
शिक्षा का मतलब सिर्फ अच्छे नंबर नहीं
डॉ. शेख मोहम्मद का काम एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि शिक्षा केवल किताबों, परीक्षाओं और अंकों तक सीमित नहीं है।सच्ची शिक्षा वह है जो बच्चों को स्कूल से जोड़कर रखे, बेटियों को सुरक्षित माहौल दे, स्वास्थ्य और स्वच्छता पर जागरूक करे,आधुनिक तकनीक तक पहुंच बनाए, और पूरे समुदाय को बदलाव का हिस्सा बनाए। उन्होंने अपने काम के जरिए शिक्षा को सामाजिक सुधार से जोड़ दिया।
सम्मान मिला, लेकिन सफर जारी रहा
शिक्षा और समाज के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए डॉ. शेख मोहम्मद को वर्ष 2018 में राज्य शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेकिन उनके लिए पुरस्कार मंजिल नहीं था।
उनका असली सम्मान शायद उन हजारों बच्चियों की मुस्कान है, जिनकी पढ़ाई जारी रह सकी। उन परिवारों का भरोसा है, जिन्होंने अपनी बेटियों को दोबारा स्कूल भेजा। और वह बदलाव है, जिसने एक स्कूल को सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का केंद्र बना दिया।
एक शिक्षक, जिसने जिम्मेदारी की परिभाषा बदल दी
डॉ. शेख मोहम्मद वकिउद्दीन शेख हमीदुद्दीन की कहानी बताती है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े पद या बड़ी ताकत की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक शिक्षक का एक फैसला... एक बच्ची की जिंदगी बदल देता है। एक छोटी पहल... हजारों परिवारों तक पहुंच जाती है। और शिक्षा के लिए किया गया एक सच्चा प्रयास... पूरे समाज की दिशा बदल सकता है।
अरधापुर के जिला परिषद हाई स्कूल से निकली डॉ. शेख मोहम्मद की यह कहानी हमें यही सिखाती है कि एक शिक्षक केवल भविष्य नहीं पढ़ाता वह भविष्य बनाता है।