ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
कृष्ण की बांसुरी की धुन जब ब्रज की गलियों में गूंजती है तो उसमें सिर्फ भक्ति की आवाज नहीं सुनाई देती, बल्कि प्रेम की वह धुन भी सुनाई देती है, जिसने सदियों से अलग-अलग धर्मों और परंपराओं के लोगों को अपने करीब खींचा है। कृष्ण के प्रति यह आकर्षण केवल मंदिरों, संतों और हिंदू भक्त कवियों तक सीमित नहीं रहा। भारतीय साहित्य और संस्कृति के इतिहास में ऐसे कई मुस्लिम कवि, शायर, कलाकार और शासक हुए, जिन्होंने कृष्ण को अपने काव्य, संगीत और कला का विषय बनाया।
किसी ने उन्हें प्रियतम माना, किसी ने मित्रता और प्रेम का प्रतीक, तो किसी ने उनकी बाल लीलाओं में अपने आराध्य को देखा। इन नामों में अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना यानी रहीम से लेकर ताज बेगम, वाजिद अली शाह, काजी नजरुल इस्लाम और रसखान तक की परंपरा बेहद खास है। यह कहानी सिर्फ कृष्ण-भक्ति की नहीं, बल्कि उस साझा भारतीय संस्कृति की भी है, जहां प्रेम ने मजहब की सीमाओं से कहीं बड़ा संसार रचा।

रहीम: मुगल दरबार का सेनापति, कृष्ण प्रेम में डूबा कवि
मुगल बादशाह अकबर के दरबार का एक शक्तिशाली सेनापति, बड़ा अमीर और विद्वान व्यक्ति जब ब्रजभाषा में कृष्ण और राम पर काव्य लिखता है तो यह अपने आप में भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का अद्भुत अध्याय बन जाता है। नाम था—अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना, जिन्हें साहित्य की दुनिया रहीम के नाम से जानती है। रहीम की पहचान सिर्फ मुगल दरबार, राजनीति और सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं थी। वह संस्कृत, फारसी और भारतीय भाषाओं के ज्ञाता थे और ब्रजभाषा में उन्होंने ऐसा साहित्य रचा, जिसमें प्रेम, भक्ति, नीति और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर मेल दिखाई देता है।
रहीम के कृष्ण-विषयक काव्य में कृष्ण केवल किसी दूसरे धर्म के आराध्य नहीं हैं, बल्कि प्रेम और विरह के केंद्र हैं। उनके एक पद में विरहिणी की व्यथा प्रकृति के माध्यम से सामने आती है—“झूमि झूमि चहुँ ओर बरसत मेघ, त्यों त्यों पिय बिनु सजनी तड़पत देह।” चारों ओर बादल बरस रहे हैं, प्रकृति जैसे प्रेम और मिलन का संदेश दे रही है, लेकिन प्रिय के बिना विरहिणी का मन और शरीर और अधिक व्याकुल हो रहा है।
कृष्ण के प्रति एकनिष्ठ प्रेम
कृष्ण के प्रति एकनिष्ठ प्रेम का भाव उनकी इन प्रसिद्ध पंक्तियों में भी दिखाई देता है—“जेहि रहीम मन आपनो, कीन्हो चारु चकोर। निसि-वासर लाग्यो रहे, कृष्णचंद्र की ओर॥” यहां रहीम अपने मन को चकोर के रूपक में देखते हैं, जिसकी दृष्टि हमेशा चंद्रमा की ओर लगी रहती है। लेकिन रहीम के लिए वह चंद्रमा कृष्णचंद्र हैं। दिन-रात उनका मन कृष्ण की ओर ही लगा हुआ है।
कृष्ण-सुदामा की दोस्ती में समानता का संदेश
रहीम ने कृष्ण और सुदामा की मित्रता के माध्यम से सामाजिक समानता और सच्चे प्रेम का संदेश भी दिया। उनकी पंक्तियां हैं—“जो गरीब सों हित करैं, धनि रहीम वे लोग। कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥” यानी जो गरीब और जरूरतमंद के साथ प्रेम और हित का व्यवहार करते हैं, वही वास्तव में धन्य हैं। कृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देते हुए रहीम बताते हैं कि सच्चे रिश्ते धन और पद के आधार पर नहीं बनते।

ताज बेगम: मुस्लिम पहचान, कृष्ण के प्रति बेइंतहा प्रेम
कृष्ण-भक्ति की यह कहानी सिर्फ पुरुष कवियों तक सीमित नहीं है। ब्रज की इसी प्रेम-परंपरा में ताज बेगम, जिन्हें कई साहित्यिक स्रोतों में ताज बीबी के नाम से भी याद किया जाता है, का नाम सामने आता है।
उनके नाम से जुड़ी ब्रजभाषा की कविताओं में कृष्ण के प्रति ऐसा प्रेम दिखाई देता है, जिसमें धर्म की पहचान पीछे छूट जाती है और प्रेम सबसे आगे आ जाता है। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां हैं “नंद के कुमार, कुर्बान तेरी सूरत पै… हौं तो मुगलानी, हिंदुआनी ह्वै रहूंगी मैं…”। इन पंक्तियों में ताज कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को बिना किसी संकोच के व्यक्त करती दिखाई देती हैं।
कृष्ण को प्रियतम मानने वाली ताज
ताज के काव्य में कृष्ण केवल पूजनीय देवता नहीं, बल्कि उनके सांवरे प्रियतम हैं। वह कहती हैं—“सुनो दिलजानी, मेरे दिल की कहानी तुम, हुस्न की बिकानी, बदनामी भी सहूंगी मैं।” इन पंक्तियों में प्रेम के लिए सामाजिक आलोचना और बदनामी तक सहने का साहस दिखाई देता है।
कृष्ण के प्रति उनका समर्पण इतना गहरा है कि वह धार्मिक पहचान की सीमाओं को भी चुनौती देती हुई नजर आती हैं। उनके नाम से जुड़ी एक अन्य रचना में आता है—“देव पूजा ठानी, मैं निवाज हूँ भुलानी, तजे कलमा कुरान, तेरे गुनन गहूँगी मैं।”
ताज बेगम की कृष्ण-भक्ति का महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि वह प्रेम को पहचान से ऊपर रखती हैं। एक मुस्लिम स्त्री का ब्रजभाषा में कृष्ण को अपना प्रियतम मानकर गाना भारतीय साहित्य की उस साझा विरासत का प्रमाण है, जिसमें भावनाएं धार्मिक सीमाओं से बड़ी हो जाती हैं।

वाजिद अली शाह: जब अवध के नवाब ने निभाया कृष्ण का किरदार
कृष्ण के प्रति मुस्लिम समाज के कुछ रचनाकारों का आकर्षण केवल कविता तक सीमित नहीं रहा। उन्नीसवीं सदी के लखनऊ में अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह ने कृष्ण की कथा को रंगमंच, संगीत और नृत्य के माध्यम से एक नया रूप दिया। वाजिद अली शाह केवल शासक नहीं थे, बल्कि कवि, संगीतप्रेमी, नर्तक और कला के बड़े संरक्षक भी थे। उनका तखल्लुस ‘अख्तर’ था और कृष्ण-राधा की प्रेमकथा से उनका विशेष लगाव था। उन्होंने “राधा कन्हैया का किस्सा” नाम से एक नाट्य-कृति तैयार की। इसका पहला मंचन 1843 में लखनऊ के हज़ूर बाग में हुआ था, जब वह अभी अवध के नवाब नहीं बल्कि युवराज थे। परंपरा में यह भी उल्लेख मिलता है कि वाजिद अली शाह ने स्वयं कृष्ण की भूमिका निभाई थी।
‘रहस’ के जरिए कृष्ण लीला को नया रंग
वाजिद अली शाह ने रासलीला की परंपरा से प्रेरित ‘रहस’ नाम की भव्य प्रस्तुतियों को भी विकसित किया। इनमें संगीत, नृत्य, अभिनय, कविता और दृश्य-सज्जा का संगम होता था। वाजिद अली शाह की यह कला-साधना लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब का एक महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है। उन्होंने कृष्ण की कथा को सिर्फ धार्मिक आख्यान की तरह नहीं देखा, बल्कि उसे संगीत और रंगमंच की भाषा में ढाला।
काजी नजरुल इस्लाम: अल्लाह की इबादत से कृष्ण की भक्ति तक
कृष्ण-भक्ति की यह धारा बंगाल तक भी पहुंचती है और वहां हमें काजी नजरुल इस्लाम जैसे महान कवि दिखाई देते हैं। नजरुल इस्लाम की पहचान ‘विद्रोही कवि’ के रूप में हुई, लेकिन उनका साहित्य केवल सामाजिक विद्रोह तक सीमित नहीं था। उन्होंने इस्लामी आध्यात्मिकता और हिंदू धार्मिक परंपराओं, दोनों से प्रेरणा लेकर रचनाएं कीं। उनकी कलम ने इस्लामी आध्यात्मिकता से जुड़े गीत भी लिखे और कृष्ण, राधा, शिव, काली और दुर्गा जैसे विषयों पर भी गीत रचे।
“कृष्ण कृष्ण बोल रसना”
कृष्ण के प्रति उनका भाव उनके गीत “कृष्ण कृष्ण बोल रसना” में साफ दिखाई देता है—“कृष्ण कृष्ण बोल रसना, राधा राधा बोल।” कृष्ण का नाम और राधा का स्मरण उनके गीत में भक्ति की पुकार बनकर सामने आता है। उनकी कल्पना में कृष्ण कभी मुरलीधर हैं, कभी प्रियतम और कभी उस आध्यात्मिक प्रेम के प्रतीक, जिसमें भक्त स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देता है। उनकी रचनाओं में कृष्ण के प्रति यह भाव उनकी धार्मिक सीमाओं से परे व्यापक मानवीय दृष्टि को सामने लाता है। नजरुल की खासियत यह थी कि उन्होंने कृष्ण-भक्ति को अपनाने के लिए अपनी मुस्लिम पहचान को छिपाया नहीं। उन्होंने इस्लामी और हिंदू दोनों आध्यात्मिक परंपराओं से प्रेरणा ली। उनके लिए धर्म इंसान की पहचान हो सकता था, लेकिन प्रेम और रचनात्मकता की सीमा नहीं।

रसखान: कृष्ण प्रेम में डूबा मुस्लिम कवि
और फिर आता है वह नाम, जिसे कृष्ण-भक्ति और मुस्लिम कवियों की चर्चा में सबसे प्रमुखता से याद किया जाता है—रसखान। रसखान का वास्तविक नाम सैयद इब्राहिम माना जाता है। उनके जीवन के बारे में प्रमाणिक ऐतिहासिक जानकारी सीमित है, लेकिन साहित्यिक परंपरा में उन्हें कृष्ण का अनन्य भक्त और ब्रजभाषा का महान कवि माना जाता है। कृष्ण के प्रति उनका प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने अपने काव्य में ब्रजभूमि, कृष्ण की बाल लीलाओं, गोपियों, गायों, यमुना और कदंब के वृक्षों को प्रेम और भक्ति के अद्भुत संसार में बदल दिया।
‘प्रेमवाटिका’ और ‘सुजान रसखान’
रसखान की प्रमुख रचनाओं में “प्रेमवाटिका” और “सुजान रसखान” का विशेष महत्व है। ‘प्रेमवाटिका’ में प्रेम को आध्यात्मिक अनुभूति के रूप में देखा गया है, जबकि ‘सुजान रसखान’ में कृष्ण की बाल लीलाओं और ब्रज के सौंदर्य का बेहद जीवंत चित्रण मिलता है।
“मानुष हौं तो वही रसखानि…”
रसखान का सबसे प्रसिद्ध सवैया कृष्ण और ब्रजभूमि के प्रति उनके पूर्ण समर्पण को व्यक्त करता है—
“मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी-कूल-कदंब की डारन॥”
इन पंक्तियों में रसखान कहते हैं कि यदि उन्हें मनुष्य का जन्म मिले तो वह गोकुल के ग्वालों के बीच रहना चाहेंगे। यदि पशु बनें तो नंद की गायों के बीच चरना चाहेंगे। यदि पत्थर बनें तो उसी गोवर्धन पर्वत का हिस्सा बनना चाहेंगे, जिसे कृष्ण ने अपनी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। और यदि पक्षी बनें तो यमुना के किनारे कदंब की डाल पर अपना बसेरा बनाना चाहेंगे। यहां रसखान सिर्फ कृष्ण की पूजा नहीं कर रहे हैं, बल्कि ब्रज के हर उस कण से जुड़ना चाहते हैं, जिसे कृष्ण ने छुआ है। यही उनके प्रेम की गहराई है।
बाल कृष्ण की मनमोहक छवि
बाल कृष्ण की छवि को रसखान ने जिस तरह शब्दों में उतारा, वह हिंदी साहित्य में बेहद लोकप्रिय है—
“धूरि भरे अति शोभित श्यामजू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनियाँ कटि पीरी कछोटी॥
वा छवि को रसखानि बिलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी।
काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों लै गयो माखन रोटी॥”
इन पंक्तियों में धूल से सने बाल कृष्ण, उनके सिर की चोटी, पैरों की पायल और हाथ में माखन-रोटी की बाल-सुलभ छवि सामने आती है। रसखान के लिए कृष्ण किसी दूर बैठे देवता नहीं, बल्कि ब्रज की गलियों में खेलने वाले नटखट बालक हैं।
रहीम से रसखान तक, प्रेम की एक साझा विरासत
रहीम के कृष्ण में जहां प्रेम और विरह की अनुभूति है, ताज बेगम के कृष्ण में प्रेम के लिए सामाजिक बंधनों को तोड़ने का साहस है, वाजिद अली शाह के कृष्ण में कला और रंगमंच का संसार है, काजी नजरुल इस्लाम के कृष्ण में धार्मिक सीमाओं से परे आध्यात्मिक संवाद है और रसखान के कृष्ण में ब्रज की मिट्टी से जुड़ा आत्मसमर्पण दिखाई देता है।
इन सभी रचनाकारों को एक साथ देखने पर भारतीय संस्कृति की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर सामने आती है। यह तस्वीर बताती है कि कृष्ण केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं रहे, बल्कि भारतीय साहित्य, संगीत, कला और लोक-संस्कृति में प्रेम के ऐसे प्रतीक बने, जिनसे अलग-अलग समुदायों के रचनाकारों ने अपनी-अपनी भाषा में संवाद किया।
रहीम से रसखान और नजरुल तक की यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि साहित्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी सीमाओं को तोड़ने में है। कृष्ण के प्रति इन मुस्लिम रचनाकारों का प्रेम किसी धार्मिक पहचान को मिटाने की कोशिश नहीं था, बल्कि यह उस भारतीय परंपरा का हिस्सा था जहां अलग-अलग आस्थाएं एक-दूसरे से संवाद करती रही हैं।
सदियों बाद भी रहीम की कविता, ताज बेगम के पद, वाजिद अली शाह की रंगमंचीय परंपरा, नजरुल के गीत और रसखान की ब्रजभाषा हमें एक ही बात याद दिलाते हैं प्रेम की भाषा का कोई एक मजहब नहीं होता।