ग़ौस सिवानी
अल्लामा इक़बाल ने जब गायत्री मंत्र को उर्दू शायरी का रूप दिया, तो कुछ लोगों को उनका यह काम ग़ैर-इस्लामी लगा और शायर-ए-मशरिक़ पर कुफ़्र का फ़तवा लगा दिया गया। यह कितनी हैरानी की बात है कि आज इक़बाल सबसे अधिक इस्लाम पसंद करने वाले वर्गों में लोकप्रिय हैं, लेकिन अपने जीवनकाल में कुछ लोगों ने उन्हें मुसलमान मानने से भी इनकार कर दिया था। आख़िरकार उन्हें अपने अशआर की व्याख्या करनी पड़ी।
इक़बाल को आम तौर पर इस्लामी विचार, ख़ुदी, मिल्लत-ए-इस्लामिया और दीन के पुनर्जागरण के शायर के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उनकी शख़्सियत का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वे अलग-अलग सभ्यताओं, धर्मों और दार्शनिक परंपराओं का गहरा अध्ययन रखते थे और सबका सम्मान भी करते थे।
इक़बाल ने जहाँ क़ुरआन, हदीस और इस्लामी इतिहास से अपनी वैचारिक प्रेरणा ली, वहीं उन्होंने हिंदू दर्शन, वेदांत, बौद्ध धर्म, ईरानी सूफ़ी परंपरा और पाश्चात्य दर्शन का भी गंभीर अध्ययन किया।
यही कारण है कि उनकी शायरी में कभी-कभी ऐसी नज़्में भी मिलती हैं जो दूसरे धर्मों की आध्यात्मिक परंपराओं की सुंदरता को सम्मान देती हैं। इन्हीं में एक नज़्म "आफ़ताब" है, जिसे इक़बाल की ओर से गायत्री मंत्र का काव्यात्मक रूपांतरण या काव्यात्मक पुनर्सृजन माना जाता है।
गायत्री मंत्र क्या है?
गायत्री मंत्र हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन और सबसे पवित्र मंत्रों में से एक माना जाता है। इसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है और हिंदू धार्मिक परंपरा में इसे आध्यात्मिक जागृति, आत्मज्ञान और ईश्वर की कृपा की प्रार्थना माना जाता है। इस मंत्र में मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसकी बुद्धि और विवेक को प्रकाशित करे और उसे सही मार्ग दिखाए।
ऐसा माना जाता है कि इस मंत्र का उच्चारण करने और उसके अर्थ को समझने से ईश्वर का ज्ञान प्राप्त होता है। इसकी बहुत अधिक महिमा बताई जाती है और इसका एक कारण यह भी माना जाता है कि इसमें एकेश्वरवाद का विचार मिलता है।
वेदांत के विद्वानों का मानना है कि वेदों में एकेश्वरवाद का वर्णन है और गायत्री मंत्र में यह विचार अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। गायत्री मंत्र को हिंदुओं की धार्मिक परंपरा का आधार माना जाता है, जिसमें ईश्वर की स्तुति करने के बाद उससे सही मार्ग दिखाने की प्रार्थना की जाती है।
गायत्री मंत्र का मूल भाव यह है:"हे ईश्वर! आप हर जगह उपस्थित हैं, हर चीज़ पर आपकी शक्ति है और आप पूर्ण अधिकार के स्वामी हैं। आप पूर्ण प्रकाश हैं। आप ज्ञान, आत्मबोध और आनंद के स्रोत हैं। आप भय को दूर करने वाले हैं। आप ही इस सृष्टि के रचयिता हैं और सबसे श्रेष्ठ हैं। हम आपके प्रकाश को प्रणाम करते हैं और आपका ध्यान करते हैं। आप हमारी बुद्धि को सही मार्ग की ओर ले चलें।"
कुछ वेदांत विद्वानों के अनुसार इस मंत्र में एकेश्वरवाद का विचार स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, क्योंकि इसमें पूरे ब्रह्मांड के एक सर्वोच्च और एकमात्र प्रकाश-स्रोत की ओर प्रार्थना की गई है।
इक़बाल की नज़्म "आफ़ताब" का अर्थ
उर्दू के अनेक कवियों ने इसका स्वतंत्र काव्यात्मक रूपांतरण किया है, जिनमें इक़बाल भी शामिल हैं। उन्होंने गायत्री मंत्र के मूल भाव को अपनी काव्य-भाषा में ढालकर एक नई साहित्यिक रचना प्रस्तुत की, जो लगभग एक सदी से साहित्य-प्रेमियों का ध्यान आकर्षित करती रही है और जिस पर भाषा और साहित्य के विद्वानों ने बहुत कुछ लिखा है।
इक़बाल ने नज़्म "आफ़ताब" में सूर्य को सत्य के प्रकाश और जीवन के स्रोत का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया है। उर्दू शायरी उपमाओं और प्रतीकों की शायरी है। यहाँ सागर कहकर प्रिय की आँखों का संकेत किया जाता है और काली घटा कहकर प्रिय के बालों की ओर इशारा किया जाता है। इसलिए यदि सूर्य को प्रकाश के स्रोत का प्रतीक बनाया जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

नज़्म के शुरुआती अशआर में इक़बाल सूर्य को जीवन, चेतना और ब्रह्मांड की गति का प्रतीक बताते हैं:
ऐ आफ़ताब! रूह ओ रवान-ए-जहाँ है तू
शीराज़ा-बंद-ए-दफ़्तर-ए-कौन ओ मकाँ है तू
यहाँ आफ़ताब केवल भौतिक सूर्य नहीं है, बल्कि उस प्रकाश का प्रतीक है जो पूरे ब्रह्मांड को व्यवस्था, गति और जीवन प्रदान करता है।
इसी तरह वे कहते हैं:
हर शै में ज़िंदगी का तक़ाज़ा तुझी से है
हर शै को तेरी जल्वागरी से सबात है
ये अशआर इस विचार को व्यक्त करते हैं कि पूरा ब्रह्मांड एक सर्वोच्च प्रकाश से जुड़ा हुआ है और उसी की कृपा से जीवन बना हुआ है।
ऐ आफ़ताब हम को ज़ियाए-शऊर दे
चश्म-ए-ख़िरद को अपनी तजल्ली से नूर दे
यहाँ कवि ज्ञान, दूरदृष्टि और सही मार्गदर्शन की प्रार्थना करता है, जो गायत्री मंत्र के मूल संदेश के अनुरूप है।
कुल्लियात-ए-इक़बाल में पूरी नज़्म इस प्रकार है:
ऐ आफ़्ताब रूह-ओ-रवान-ए-जहाँ है तू
शीराज़ा-बंद दफ़्तर-ए-कौन-ओ-मकाँ है तू
बाइ'स है तू वजूद-ओ-अदम की नुमूद का
है सब्ज़ तेरे दम से चमन हस्त-ओ-बूद का
क़ाएम ये उंसुरों का तमाशा तुझी से है
हर शय में ज़िंदगी का तक़ाज़ा तुझी से है
हर शय को तेरी जल्वा-गरी से सबात है
तेरा ये सोज़-ओ-साज़ सरापा हयात है
वो आफ़्ताब जिस से ज़माने में नूर है
दिल है ख़िरद है रूह-ए-रवाँ है शुऊर है
ए आफ़्ताब हम को ज़िया-ए-शुऊर दे
चश्म-ए-ख़िरद को अपनी तजल्ली से नूर दे
है महफ़िल-ए-वजूद का सामाँ-तराज़ तो
यज़्दान-ए-साकिनान-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ तू
तेरा कमाल-ए-हस्ती हर जान-दार में
तेरी नुमूद सिलसिला-ए-कोहसार में
हर चीज़ की हयात का परवरदिगार तू
ज़ाईदन-ए-नूर का है ताजदार तू
नय इब्तिदा कोई न कोई इंतिहा तिरी
आज़ाद क़ैद-ए-अव्वल-ओ-आख़िर ज़िया तिरी
इक़बाल का उद्देश्य
गायत्री मंत्र का काव्यात्मक रूप देने का उद्देश्य किसी धार्मिक विश्वास का प्रचार करना नहीं था। वे मानव सभ्यताओं में मौजूद उन सार्वभौमिक मूल्यों को सामने लाना चाहते थे जो मनुष्य को ईश्वर, नैतिकता और आत्मज्ञान से जोड़ते हैं।
वे संकीर्ण सोच के विरोधी थे और विभिन्न धर्मों की उन शिक्षाओं का सम्मान करते थे जो मनुष्य को ऊँची सोच और श्रेष्ठ चरित्र की ओर ले जाती हैं। गायत्री मंत्र की यह काव्यात्मक प्रस्तुति भी उनकी व्यापक और उदार विचारधारा का प्रमाण है।
इक़बाल की नज़्म "आफ़ताब" इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि एक महान कवि अपनी धार्मिक पहचान बनाए रखते हुए भी दूसरी सभ्यताओं और धर्मों की आध्यात्मिक परंपराओं से प्रेरणा ले सकता है। गायत्री मंत्र की काव्यात्मक प्रस्तुति के माध्यम से इक़बाल ने वास्तव में ज्ञान, प्रकाश, मार्गदर्शन और ईश्वर-ज्ञान जैसे साझा मानवीय आदर्शों को सामने रखा है।
इक़बाल पर कुफ़्र का फ़तवा
अल्लामा इक़बाल की शायरी और विचारों पर कई फ़तवे लगाए गए। ये फ़तवे उनके जीवनकाल में भी लगाए गए और उनके निधन के बाद भी। एक फ़तवा उनकी नज़्म "आफ़ताब" को ध्यान में रखकर दिया गया।
यह नज़्म वास्तव में गायत्री मंत्र का स्वतंत्र काव्यात्मक रूपांतरण है। हालाँकि, इक़बाल की दूसरी नज़्मों के विषय और शैली पर भी आपत्तियाँ की गईं। उदाहरण के लिए, उनकी लंबी नज़्म "शिकवा" की शैली को कुछ लोगों ने अदब के ख़िलाफ़ बताया।
उनके दार्शनिक विचारों की भी आलोचना की गई। इसके अलावा, उन्होंने सूफ़ीवाद के नाम पर फैली अंधविश्वासपूर्ण बातों और आलस्य की भी आलोचना की, जो कुछ लोगों को पसंद नहीं आई। इसी कारण कुछ लोगों ने उन्हें सूफ़ीवाद का विरोधी समझ लिया और विवाद पैदा हो गया।
फिर भी, इक़बाल के बारे में सबसे अधिक चर्चित फ़तवा मौलवी दीदार अली का था। लाहौर की वज़ीर ख़ान मस्जिद के ख़तीब मौलवी दीदार अली अलवरी ने अल्लामा इक़बाल की कुछ नज़्मों और उनके फ़लसफ़ा-ए-ख़ुदी को कुफ़्र क़रार दिया था। उस समय की पत्र-पत्रिकाओं में भी इस फ़तवे पर काफ़ी चर्चा हुई थी।
दरअसल, मौलवी साहब से यह प्रश्न पूछा गया था कि एक व्यक्ति अपनी शायरी में आफ़ताब (सूर्य) को ईश्वर जैसे गुणों वाला बताता है और उससे प्रार्थना करता है। वह आख़िरत पर विश्वास नहीं रखता, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम जैसे महान पैग़ंबर का मज़ाक उड़ाता है, उलमा-ए-किराम पर तंज़ करता है और हिंदुओं के एक महान पुरुष, जिन्हें वे भगवान का अवतार मानते हैंI
उन्हें "इमाम" और "चराग़-ए-हिदायत" जैसे शब्दों से याद करता है। ऐसे व्यक्ति के बारे में शरीअत का क्या हुक्म है? क्या ऐसा व्यक्ति मुसलमान हो सकता है? और उसके साथ व्यवहार करने का क्या आदेश है?
इस इस्तिफ़्ता (धार्मिक प्रश्न) में इक़बाल के कुछ अशआर भी पेश किए गए थे, जैसे:
ऐ आफ़ताब हम को ज़ियाए-शऊर दे
चश्म-ए-ख़िरद को अपनी तजल्ली से नूर दे
ख़ुसूसियत नहीं कुछ इस में ऐ कलीम तेरी
शजर हजर भी ख़ुदा से कलाम करते हैं
ग़ज़ब हैं ये मुर्शिदान-ए-ख़ुदबीन, ख़ुदा तेरी क़ौम को बचाए
बिगाड़ कर तेरे मुसलमाँ को ये अपनी इज़्ज़त बना रहे हैं
है राम के वजूद पर हिंदोस्ताँ को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं इस का इमाम-ए-हिंद
ऐजाज़ इस चराग़-ए-हिदायत का है यही
रोशन तर अज़ सहर है ज़माने में शाम-ए-हिंद
इन सवालों के जवाब में मौलवी दीदार अली ने फ़ारसी और अरबी मिले-जुले अंदाज़ में एक फ़तवा जारी किया। उसका सीधा मतलब यह था कि शायर ने अपनी नज़्म में आफ़ताब (सूर्य) को यज़दान और परवरदिगार कहा है, जो खुला कुफ़्र है।
उनके अनुसार ख़ुदा के जन्म लेने का विश्वास भी कुफ़्र है और अल्लाह के नबी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का अपमान करना भी कुफ़्र है। इसलिए अगर यह बात कहने वाला तौबा न करे, तो उससे हर तरह का संबंध तोड़ लेना चाहिए।
ज़ाहिर है कि मौलवी दीदार अली के इस फ़तवे के बाद काफ़ी हंगामा मच गया। लोग कहने लगे कि अगर इक़बाल जैसा व्यक्ति भी मुसलमान नहीं रहा, तो फिर मुसलमान कौन है?
असल में, इक़बाल की शायरी के बारे में सवाल ही ग़लत तरीके से पूछा गया था। ख़ुद इक़बाल ने साफ़ लिखा था कि नज़्म "आफ़ताब" ऋग्वेद के एक मंत्र का अनुवाद है, जिसे गायत्री मंत्र कहा जाता है।
इस नज़्म में जिस सूर्य की बात की गई है, वह साधारण सूर्य नहीं है, बल्कि एक प्रतीक है। उससे पूरी सृष्टि शक्ति और प्रकाश प्राप्त करती है। यहाँ तक कि आकाश का दिखाई देने वाला सूर्य भी उसी प्रतीकात्मक सूर्य से प्रकाश पाता है।
क़ुरआन में भी कहा गया है कि अल्लाह आकाशों और धरती का नूर है। इसलिए, शायरी में इस्तेमाल किए गए प्रतीकों और उपमाओं को समझे बिना ही फ़तवा दे दिया गया था।हालाँकि, इक़बाल ने इन फ़तवों का कोई सीधा या आक्रामक जवाब नहीं दिया। आम मुसलमानों ने भी मौलवी साहब के फ़तवे को गंभीरता से नहीं लिया।
फिर भी, इन फ़तवों के बावजूद इक़बाल की शायरी आज भी उतनी ही लोकप्रिय है और पूरी दुनिया को प्रभावित कर रही है। दूसरी ओर, उन फ़तवों को आज शायद ही कोई याद करता हो। न उस समय लोगों ने उन्हें गंभीरता से लिया था और न आज उन्हें कोई विशेष महत्व देता है।