भारतीय टेनिस के गुरु अख्तर अली, विजय अमृतराज से पेस तक को तराशा

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 05-09-2026
Akhtar Ali: From player to coach, the ‘Guru’ who shaped multiple generations of Indian tennis.
Akhtar Ali: From player to coach, the ‘Guru’ who shaped multiple generations of Indian tennis.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  
 
भारतीय टेनिस की कहानी सिर्फ उन खिलाड़ियों की कहानी नहीं है, जिन्होंने कोर्ट पर देश का नाम रोशन किया। इसके पीछे उन गुरुओं की मेहनत भी है, जिन्होंने पीढ़ियों के खिलाड़ियों को तैयार किया। ऐसे ही एक नाम थे अख्तर अली। उन्होंने खुद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया, डेविस कप खेला और बाद में कोच बनकर विजय अमृतराज, रमेश कृष्णन और लिएंडर पेस जैसे खिलाड़ियों के करियर को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2000 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

खिलाड़ी का परिचय

एस. अख्तर अली का जन्म 5 जुलाई 1939 को इलाहाबाद में हुआ था। भारतीय टेनिस में उनका सफर खिलाड़ी के रूप में शुरू हुआ, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान बाद में एक प्रशिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में बनी। कम उम्र में ही उन्होंने टेनिस में अपनी प्रतिभा दिखाई। उन्होंने जूनियर स्तर पर राष्ट्रीय खिताब जीता और विंबलडन जूनियर चैंपियनशिप के सेमीफाइनल तक पहुंचे।
 
इसके बाद उन्होंने भारतीय डेविस कप टीम में जगह बनाई और 1958 से 1964 के बीच भारत के लिए आठ डेविस कप मुकाबलों में हिस्सा लिया। उनकी खेल शैली में खास तौर पर बैकहैंड स्लाइस, तेज दिमाग और आक्रामक खेल की समझ दिखाई देती थी। बाद में यही व्यावहारिक अनुभव उनकी कोचिंग की सबसे बड़ी ताकत बना।
 
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शुरुआती जीवन और संघर्ष

अख्तर अली का टेनिस से रिश्ता बचपन से ही जुड़ गया था। उनके पिता सैटरडे क्लब में ट्रेनर के रूप में काम करते थे और यहीं से अख्तर को टेनिस के माहौल से परिचय मिला। उनका कद भले ही बहुत लंबा नहीं था, लेकिन उन्होंने अपनी खेल समझ, तकनीक और संघर्ष करने की क्षमता से इसकी भरपाई की।
 
शुरुआती दौर में उन्होंने जूनियर स्तर पर सफलता हासिल की और तेजी से भारतीय टेनिस के शीर्ष खिलाड़ियों में जगह बनाई। 1955 में उन्होंने इंडिया जूनियर चैंपियनशिप जीती। इसके बाद 1956 में उन्होंने इंग्लैंड का दौरा किया और उसी वर्ष ईस्टबोर्न में अपना पहला ज्ञात सिंगल्स टूर्नामेंट खेला।
 
उन्होंने न्यू माल्डेन ओपन में भारतीय खिलाड़ी अरविंद चारंजीवा को हराकर खिताब भी जीता। यह वह समय था जब भारतीय टेनिस खिलाड़ियों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना आज की तुलना में कहीं अधिक कठिन था। सीमित संसाधनों के बीच अक्ख्तर ने लगातार खुद को बेहतर बनाया।
 
खेल करियर: कोर्ट पर भारत का प्रतिनिधित्व

अख्तर अली का अंतरराष्ट्रीय करियर भारतीय टेनिस के महत्वपूर्ण दौर में सामने आया। वह 1958 से 1964 तक लगातार भारतीय डेविस कप टीम का हिस्सा रहे और कुल आठ डेविस कप मुकाबलों में खेले। उन्होंने विंबलडन में भी हिस्सा लिया। उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 1961 में आया, जब वह विंबलडन के दूसरे दौर तक पहुंचे। इससे पहले 1956 और 1958 में भी उन्होंने विंबलडन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था।
 
फ्रेंच चैंपियनशिप में भी उन्होंने हिस्सा लिया और अंतरराष्ट्रीय सर्किट पर भारत की मौजूदगी दर्ज कराई। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने कई खिताब जीते। इनमें सीलोन चैंपियनशिप के 1960 और 1962 के खिताब तथा सेंट-लुनेयर इंटरनेशनल और जयपुर इंटरनेशनल जैसे टूर्नामेंटों में जीत शामिल है। लेकिन अख्तर अली का खिलाड़ी के रूप में सफर धीरे-धीरे उन्हें एक दूसरी भूमिका की ओर ले जा रहा था कोच और मेंटर की भूमिका।
 
1966: वह जीत जिसने भारतीय टेनिस का इतिहास बदल दिया

अख्तर अली के करियर से जुड़ी सबसे प्रेरक घटनाओं में 1966 का भारत-ब्राजील डेविस कप मुकाबला खास है। उस समय अख्तर भारतीय टीम से कोच के रूप में जुड़े थे। भारत को ब्राजील जैसी मजबूत टीम के खिलाफ मुकाबला करना था। निर्णायक डबल्स मुकाबले से पहले अक्ख्तर ने अनुभवी खिलाड़ी रमणाथन कृष्णन को जयदीप मुखर्जी के साथ जोड़ी बनाने के लिए मनाया, जबकि कृष्णन की नियमित जोड़ी प्रेमजीत लाल के साथ थी।
 
यह फैसला बेहद सफल रहा और भारत ने ब्राजील को हराकर डेविस कप के फाइनल तक पहुंचने का ऐतिहासिक रास्ता बनाया। खुद अख्तर अली ने बाद में इस जीत को अपने करियर की सबसे खास यादों में बताया। यही घटना दिखाती है कि एक अच्छे कोच की भूमिका सिर्फ खिलाड़ियों को अभ्यास कराने तक सीमित नहीं होती। सही समय पर सही रणनीतिक फैसला भी मैच का रुख बदल सकता है।
 
India tennis legend Akhtar Ali passes away | Tennis News - The Indian  Express
 
कोच बने और बदल दी भारतीय टेनिस की दिशा

अख्तर अली ने लगभग 27 वर्ष की उम्र में ही महसूस कर लिया था कि उनकी असली ताकत कोचिंग में है। उन्होंने खिलाड़ी के रूप में सक्रिय करियर से आगे बढ़ते हुए प्रशिक्षण की दुनिया में कदम रखा। कोचिंग को गंभीरता से समझने के लिए उन्होंने महान ऑस्ट्रेलियाई कोच हैरी हॉपमैन से भी प्रशिक्षण लिया।
 
बाद में जयदीप मुखर्जी ने उन्हें भारत का ‘हैरी हॉपमैन’ तक कहा। इसके बाद अख्तर अली ने भारतीय टेनिस की कई पीढ़ियों के खिलाड़ियों के साथ काम किया। उनके शिष्यों और उनसे मार्गदर्शन पाने वाले खिलाड़ियों में विजय अमृतराज, आनंद अमृतराज, रमेश कृष्णन, लिएंडर पेस, जीशान अली और सानिया मिर्जा जैसे नाम शामिल रहे। यानी उनका प्रभाव सिर्फ एक दौर तक सीमित नहीं रहा। वह लगातार बदलती पीढ़ियों के साथ भारतीय टेनिस को आगे बढ़ाते रहे।
 
देश के लिए उपलब्धियां

अख्तर अली की देश के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ उनके व्यक्तिगत खिताब नहीं थे। उन्होंने भारत के लिए डेविस कप में खेला, अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में देश का प्रतिनिधित्व किया और बाद में भारतीय डेविस कप टीम के कोच और गैर-खिलाड़ी कप्तान की भूमिका भी निभाई।
 
उनकी कोचिंग के दौरान भारतीय टेनिस ने कई महत्वपूर्ण मुकाबलों में सफलता हासिल की। 1966 में ब्राजील पर भारत की ऐतिहासिक जीत में उनके रणनीतिक योगदान को विशेष रूप से याद किया जाता है। बाद में उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक भारतीय डेविस कप टीम के कोच के रूप में काम किया और तीन-चार पीढ़ियों के खिलाड़ियों को तैयार किया। यही वजह है कि भारतीय टेनिस में उनकी विरासत को केवल उनके व्यक्तिगत रिकॉर्ड से नहीं मापा जाता।
 
अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर

अख्तर अली के लंबे खेल और कोचिंग करियर को आधिकारिक सम्मान तब मिला जब उन्हें वर्ष 2000 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। भारत सरकार की आधिकारिक अर्जुन अवॉर्ड सूची में उनका नाम 2000 के लॉन टेनिस पुरस्कार विजेता के रूप में दर्ज है।
 
ऑल इंडिया टेनिस एसोसिएशन की सूची भी अख्तर अली को 2000 का अर्जुन अवॉर्डी बताती है। यह सम्मान खास इसलिए था क्योंकि अक्ख्तर की पहचान सिर्फ एक पूर्व खिलाड़ी की नहीं थी। उन्होंने अपने अनुभव को कोचिंग में बदला और लंबे समय तक भारतीय टेनिस की प्रतिभाओं को निखारने का काम किया।
 
प्रेरक कहानी: खुद से ज्यादा अगली पीढ़ी की चिंता

अक्ख्तर अली की सबसे बड़ी प्रेरक कहानी शायद यही है कि उन्होंने अपनी पहचान को सिर्फ खिलाड़ी तक सीमित नहीं रहने दिया। जब उनके समकालीन खिलाड़ी अपने खेल करियर के चरम पर पहुंच रहे थे, अक्ख्तर ने अपेक्षाकृत कम उम्र में कोचिंग को अपना रास्ता बना लिया। उन्होंने अपनी ऊर्जा अगली पीढ़ी को तैयार करने में लगाई। उनकी कोचिंग शैली बेहद अनुशासित थी।
 
वह खिलाड़ियों को बार-बार बुनियादी ड्रिल कराने पर जोर देते थे और गलतियों पर सीधे बात करते थे। लेकिन साथ ही वह खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरक और दोस्ताना व्यक्तित्व भी थे। रमणाथन कृष्णन ने उन्हें याद करते हुए कहा था कि अक्ख्तर का भारतीय टेनिस के लगभग हर अच्छे खिलाड़ी के विकास में कोई न कोई योगदान रहा। यही उनकी असली उपलब्धि थी—उन्होंने सिर्फ मैच नहीं जीते, बल्कि विजेता तैयार किए।
 
Akhtar Ali, former Indian tennis player and legendary coach, dies
 
पिता-पुत्र की अनोखी डेविस कप विरासत

अख्तर अली की कहानी में एक और खास अध्याय उनके बेटे जीशान अली से जुड़ा है। जीशान खुद भारत के राष्ट्रीय चैंपियन रहे और बाद में भारतीय डेविस कप टीम से कोच के रूप में जुड़े। इस तरह अक्ख्तर और जीशान ऐसी पिता-पुत्र जोड़ी बने, जिसने डेविस कप में खिलाड़ी और कोच—दोनों भूमिकाओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 2013 में इंटरनेशनल टेनिस फेडरेशन ने इस अनोखी उपलब्धि की पुष्टि की थी। यह सिर्फ एक पारिवारिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह दिखाती है कि अक्ख्तर अली की टेनिस विरासत अगली पीढ़ी तक कैसे पहुंची।
 
खेल के बाद की जिंदगी और कोचिंग का जुनून

अख्तरअली के लिए टेनिस नौकरी या पेशा भर नहीं था। वह जीवन के अंतिम वर्षों तक कोर्ट और खिलाड़ियों से जुड़े रहे। उन्होंने कोलकाता के साउथ क्लब में लंबे समय तक प्रशिक्षण दिया और युवा खिलाड़ियों के लिए विकास कार्यक्रम भी चलाया।
 
वह प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने और भारतीय टेनिस की नई पीढ़ी तैयार करने के लिए लगातार सक्रिय रहे। 2005 में भारतीय टेनिस में उनकी 50 वर्षों की सेवा के सम्मान में ‘गोल्डन अख्तर’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। उनका जीवन बताता है कि खेल में योगदान केवल तब तक सीमित नहीं होता, जब तक खिलाड़ी खुद मैदान पर उतरता है। एक खिलाड़ी का अनुभव अगर सही तरीके से अगली पीढ़ी तक पहुंचे, तो उसकी विरासत दशकों तक जीवित रह सकती है।
 
आज वे क्या कर रहे हैं?

अख्तर अली अब हमारे बीच नहीं हैं। 7 फरवरी 2021 को 81 वर्ष की उम्र में कोलकाता में उनका निधन हुआ। वह लंबे समय से भारतीय टेनिस से जुड़े रहे और अंतिम वर्षों तक भी खेल तथा खिलाड़ियों के संपर्क में रहे। उनके निधन पर भारतीय टेनिस जगत ने उन्हें सिर्फ एक पूर्व खिलाड़ी के तौर पर नहीं, बल्कि एक महान कोच, मेंटर और टेनिस गुरु के रूप में याद किया। रमणाथन कृष्णन से लेकर लिएंडर पेस तक, भारतीय टेनिस की कई पीढ़ियों के खिलाड़ियों पर उनकी छाप दिखाई देती है।
 

 
 
अक्ख्तर अली की विरासत

अक्ख्तर अली की कहानी भारतीय टेनिस के उस दौर की कहानी है, जब अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए खिलाड़ियों को सीमित सुविधाओं के बीच खुद को साबित करना पड़ता था। उन्होंने जूनियर चैंपियन से लेकर डेविस कप खिलाड़ी, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के प्रतिभागी से लेकर राष्ट्रीय टीम के कोच और फिर कई पीढ़ियों के खिलाड़ियों के गुरु तक का सफर तय किया। 1950 के दशक में जिस बच्चे ने टेनिस रैकेट पकड़ा था, उसने आगे चलकर भारतीय टेनिस की पूरी पीढ़ियों को रैकेट संभालना सिखाया। 2000 का अर्जुन अवॉर्ड उनके लंबे योगदान की आधिकारिक पहचान था, लेकिन उनकी सबसे बड़ी ट्रॉफी शायद वे खिलाड़ी थे, जिन्हें उन्होंने तैयार किया। अक्ख्तर अली का नाम इसलिए याद रखा जाएगा क्योंकि उन्होंने सिर्फ भारतीय टेनिस खेला नहीं—उन्होंने भारतीय टेनिस को गढ़ने में अपनी जिंदगी लगा दी।