नशे के खिलाफ़ एकजुट हुए हिमंत सरमा और अजमल

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 15-07-2026
MLA Badruddin Ajmal meeting Chief Minister Himanta Biswa Sarma
MLA Badruddin Ajmal meeting Chief Minister Himanta Biswa Sarma

 

दौलत रहमान

ऐसे समय में जब असम की राजनीति अक्सर वैचारिक, जातीय और धार्मिक आधार पर तीखे मतभेदों से घिरी रहती है, राज्य की सबसे गंभीर सामाजिक चुनौतियों में से एक—बढ़ते नशे के कारोबार—को लेकर एक अप्रत्याशित सहमति सामने आई है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा और एआईयूडीएफ प्रमुख एवं प्रभावशाली मुस्लिम नेता बदरुद्दीन अजमल का एक ही स्वर में बोलना इस व्यापक संदेश को रेखांकित करता है कि मादक पदार्थों के खिलाफ़ लड़ाई राजनीति, जाति, पंथ और धर्म से ऊपर उठकर लड़ी जानी चाहिए।

इस बहस को नई गति तब मिली जब बदरुद्दीन अजमल ने असम विधानसभा और बाद में मीडिया के सामने ड्रग तस्करों को "समाज का हत्यारा" बताते हुए उनके खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई की मांग की। उन्होंने बड़े ड्रग तस्करों के खिलाफ़ पुलिस मुठभेड़ों तक का समर्थन किया और कहा कि केवल कानूनी प्रावधानों के भरोसे फल-फूल रहे नशीले पदार्थों के नेटवर्क को समाप्त नहीं किया जा सकता।

हालांकि, उनके इस बयान की कुछ वर्गों ने आलोचना भी की। तृणमूल कांग्रेस के विधायक शेरमैन अली अहमद ने इसे न्यायेतर हत्याओं का समर्थन बताया और कहा कि हर आरोपी के साथ कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई होनी चाहिए।

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शिक्षा से सामाजिक बदलाव तक

बदरुद्दीन अजमल लंबे समय से विशेष रूप से असम के आर्थिक रूप से कमजोर मुस्लिम समुदाय के छात्रों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के प्रयासों के लिए जाने जाते हैं। अजमल फाउंडेशन और उससे जुड़े शैक्षणिक कार्यक्रमों के माध्यम से हजारों छात्रों को छात्रवृत्ति, कोचिंग और शैक्षणिक सहायता मिली है।

फाउंडेशन की सबसे चर्चित पहल 'सुपर 40' कार्यक्रम रही है, जिसने अनेक मेधावी लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को देश के प्रतिष्ठित मेडिकल और इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश दिलाने में मदद की। इन प्रयासों से कई छात्र डॉक्टर और इंजीनियर बने हैं।

शिक्षा हमेशा से अजमल की सार्वजनिक पहल का केंद्र रही है। उनका मानना रहा है कि सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा है। ऐसे में नशे के बढ़ते खतरे के खिलाफ़ उनका मुखर रुख़ और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि जिसने दशकों तक युवाओं के भविष्य को संवारने में निवेश किया हो, वह स्वाभाविक रूप से उस नशे की समस्या को लेकर चिंतित होगा जो उसी पीढ़ी को बर्बाद कर सकती है।

मुख्यमंत्री का समर्थन

विधानसभा में जवाब देते हुए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने नशे के खिलाफ़ अजमल के रुख़ का स्वागत किया और सभी दलों के विधायकों से इस अभियान में एकजुट होने की अपील की। उन्होंने कहा कि मादक पदार्थों का मुद्दा कभी भी राजनीतिक ध्रुवीकरण या सांप्रदायिक बहस का विषय नहीं बनना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि जब किसी विशेष धार्मिक समुदाय से जुड़े ड्रग तस्करों के खिलाफ़ पुलिस कार्रवाई होती है तो उसे अक्सर सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जाती है। उनके अनुसार, राज्य की लड़ाई अपराध के खिलाफ़ है, किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ़ नहीं।

असम की लगातार कार्रवाई

2021 में भाजपा सरकार द्वारा व्यापक नशा-विरोधी अभियान शुरू किए जाने के बाद से असम पुलिस ने देश के सबसे बड़े ड्रग-विरोधी अभियानों में से एक चलाया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हजारों अभियान चलाए गए हैं और 20,000 से अधिक आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में हजारों करोड़ रुपये मूल्य की हेरोइन, मेथामफेटामाइन (याबा टैबलेट), गांजा, अफीम और अन्य मादक पदार्थ जब्त किए गए तथा न्यायिक निगरानी में नष्ट किए गए।

यह अभियान केवल बरामदगी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि असम की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का लाभ उठाने वाले अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय तस्करी गिरोहों को ध्वस्त करने पर भी केंद्रित रहा है।

मुस्लिम समाज से अजमल की अपील

अजमल के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पुलिस कार्रवाई का समर्थन नहीं, बल्कि मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व से उनकी अपील रही। उन्होंने असम के इमामों, इस्लामी विद्वानों और मस्जिद समितियों से आग्रह किया कि वे नशे के खिलाफ़ जनजागरूकता अभियान चलाएं और युवाओं को इसकी भयावहता से अवगत कराएं।

उन्होंने मुख्यमंत्री की इस बात के लिए भी सराहना की कि मुस्लिम बहुल इलाकों में भी अपराधियों के खिलाफ़ कार्रवाई की जा रही है। उनका कहना था कि अपराध का बचाव कभी सांप्रदायिक आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। असम के मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग पर उनके प्रभाव को देखते हुए पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि मस्जिदों में शुक्रवार के ख़ुत्बों के दौरान नियमित रूप से नशे के दुष्परिणामों पर चर्चा होने लगे, तो संवेदनशील क्षेत्रों में जनजागरूकता काफी मजबूत हो सकती है।

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इस्लाम में नशे की स्पष्ट मनाही

इस्लाम में नशीले पदार्थों के लिए कोई अस्पष्टता नहीं है। कुरआन में नशे की वस्तुओं को स्पष्ट रूप से निषिद्ध बताया गया है और कहा गया है कि इनमें कुछ सीमित लाभ दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इनकी हानि कहीं अधिक है। पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की अनेक हदीसों में भी हर प्रकार के नशे को हराम बताया गया है तथा ऐसी हर चीज़ से बचने की हिदायत दी गई है जो इंसान की समझ और समाज दोनों को नुकसान पहुंचाए।

इस्लामी विद्वानों का कहना है कि नशे की लत केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि परिवार, आजीविका और सामाजिक सौहार्द को भी नष्ट कर देती है। इसलिए नशे के खिलाफ़ संघर्ष केवल सामाजिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि धार्मिक दायित्व भी माना जाता है। इसी वजह से कई विशेषज्ञ मानते हैं कि मस्जिदें युवाओं को सही मार्गदर्शन देने, परिवारों को परामर्श प्रदान करने और नशाग्रस्त लोगों के पुनर्वास के लिए प्रभावी केंद्र बन सकती हैं।

समाज भी आगे आया

असम के कई मुस्लिम बहुल इलाकों में नशा-विरोधी अभियान अब सामाजिक आंदोलन का रूप लेने लगा है। हाल के वर्षों में कई गांवों और मस्जिद समितियों ने ड्रग तस्करी में शामिल लोगों के खिलाफ़ अभूतपूर्व फैसले लिए हैं। कुछ स्थानों पर ऐसे लोगों के लिए सार्वजनिक जनाज़े की नमाज़ या गांव के कब्रिस्तान में दफन की अनुमति नहीं देने का निर्णय लिया गया, जब तक कि वे तौबा न करें या समुदाय की सहमति न मिले। हालांकि इस पर इस्लामी विद्वानों के बीच अलग-अलग मत रहे, लेकिन इन फैसलों का उद्देश्य धार्मिक निर्णय देना नहीं, बल्कि समाज को नशे के खिलाफ़ मजबूत संदेश देना था।

होजाई और मध्य असम के कुछ अन्य इलाकों की मस्जिद समितियों के ऐसे प्रस्तावों ने व्यापक जनचर्चा को जन्म दिया और समुदाय आधारित नशा-विरोधी प्रयासों को नई दिशा दी। वर्ष 2025 में दक्षिण कामरूप जिले के गोरोइमारी क्षेत्र के जरपारा अंतर्गत छह गांवों के लोगों ने यह प्रस्ताव पारित किया कि प्रतिबंधित नशीले पदार्थों के सेवन से मरने वालों का जनाज़ा नहीं पढ़ाया जाएगा और उन्हें गांव के कब्रिस्तान में दफनाने की अनुमति भी नहीं दी जाएगी। साथ ही, ऐसे नशाग्रस्त लोगों के परिवारों के सामाजिक बहिष्कार का भी निर्णय लिया गया।

समुदाय के नेताओं का कहना था कि उद्देश्य परिवारों को अपमानित करना नहीं, बल्कि समाज को यह स्पष्ट संदेश देना है कि युवाओं का भविष्य बर्बाद करने वालों को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

राजनीति से ऊपर की लड़ाई

ड्रग्स की लत आज असम की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में से एक बन चुकी है। इसका शिकार हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, आदिवासी और हर सामाजिक वर्ग के लोग हो रहे हैं। ऐसे समय में राज्य के राजनीतिक नेतृत्व और प्रभावशाली मुस्लिम नेतृत्व का एक मंच पर आना यह संकेत देता है कि नशीले पदार्थों के खिलाफ़ लड़ाई केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं जीती जा सकती।

स्थायी सफलता के लिए सरकार, शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक नेताओं, नागरिक समाज संगठनों और स्थानीय समुदायों के बीच व्यापक सहयोग आवश्यक होगा। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा लगातार कहते रहे हैं कि नशे के खिलाफ़ अभियान को राजनीति या धर्म के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। वहीं, बदरुद्दीन अजमल द्वारा इस साझा संघर्ष का समर्थन और इमामों तथा इस्लामी विद्वानों से जनमत तैयार करने की अपील इस अभियान को एक नया सामाजिक आयाम देती है।

राजनीतिक मतभेदों से घिरे राज्य में उभरती यह सहमति इस बात का संकेत है कि जब असम के युवाओं को नशे की गिरफ्त से बचाने की बात आती है, तब पहचान की राजनीति से ऊपर मानवता और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर सामूहिक जिम्मेदारी को स्थान मिलना चाहिए।