निकहत जरीन: रूढ़ियां तोड़कर बॉक्सिंग की दुनिया में बनीं विश्व चैंपियन
Story by ओनिका माहेश्वरी | Published by onikamaheshwari | Date 12-09-2026
Nikhat Zareen: Shattering stereotypes to become a world champion in the boxing world
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
जब एक छोटी-सी लड़की ने बॉक्सिंग रिंग में उतरने का फैसला किया, तो सवाल सिर्फ यह नहीं था कि वह मुक्केबाजी में कितनी आगे जाएगी। सवाल यह भी था कि क्या एक मुस्लिम लड़की शॉर्ट्स पहनकर रिंग में उतर सकती है, चोटों की परवाह किए बिना मुक्केबाजी जैसे खेल को अपना सकती है और समाज की तय की हुई सीमाओं से बाहर निकलकर अपना करियर बना सकती है?
तेलंगाना के निजामाबाद की निकहत जरीन ने इन तमाम सवालों का जवाब अपने मुक्कों और उपलब्धियों से दिया। परिवार के मजबूत समर्थन के साथ उन्होंने न सिर्फ बॉक्सिंग को अपना करियर बनाया, बल्कि उन सामाजिक रूढ़ियों को भी तोड़ा, जो लड़कियों के सपनों के रास्ते में खड़ी थीं। आज वही निकहत दो बार की विश्व चैंपियन और अर्जुन अवॉर्डी हैं।
14 जून 1996 को तेलंगाना के निजामाबाद में जन्मीं निकहत जरीन का बचपन दूसरे बच्चों से कुछ अलग था। उनके पिता मोहम्मद जमील अहमद चाहते थे कि उनकी बेटियां जीवन में कुछ अलग करें। निकहत ने जब बॉक्सिंग को अपना रास्ता चुना, तब परिवार के सामने सिर्फ खेल से जुड़ी चुनौतियां नहीं थीं, बल्कि समाज की सोच भी एक बड़ी चुनौती थी। उस दौर में एक लड़की का बॉक्सिंग रिंग में उतरना, शॉर्ट्स पहनकर मुकाबला करना और चोटों से भरे इस खेल को करियर बनाना हर किसी को सहज नहीं लगता था।
लेकिन निकहत के पिता ने बेटी के सपने को समाज की बातों से ऊपर रखा। उन्होंने निकहत को रोकने के बजाय उसका हौसला बढ़ाया। यही समर्थन आगे चलकर निकहत के सफर की सबसे मजबूत नींव बना। निकहत ने भी साबित किया कि किसी लड़की की क्षमता उसके कपड़ों या समाज की बनाई धारणाओं से तय नहीं होती। उन्होंने बॉक्सिंग को चुना और रिंग में अपनी पहचान बनाई।
निकहत की शुरुआती ट्रेनिंग उनके चाचा और बॉक्सिंग कोच मोहम्मद शम्सुद्दीन से हुई। कम उम्र में ही उन्होंने बॉक्सिंग की बुनियादी तकनीक सीखनी शुरू कर दी।
साल 2009 में वह विशाखापत्तनम स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के प्रशिक्षण केंद्र से जुड़ीं। यहां उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता आई.वी. राव के मार्गदर्शन में अपनी प्रतिभा को निखारने का मौका मिला।
मेहनत का असर जल्दी दिखाई देने लगा और 2010 में उन्होंने करीमनगर में राज्य चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक जीता। लेकिन निकहत का सफर हमेशा आसान नहीं रहा।
महज 13 साल की उम्र में एक बॉक्सिंग मुकाबले में उन्हें चेहरे पर चोट लगी। नाक से खून बहा और आंख के पास भी चोट आई। वह मुकाबला हार गईं, लेकिन उस हार ने उनके भीतर जीत की ऐसी भूख पैदा की, जिसने आगे की पूरी यात्रा बदल दी। रिंग से बाहर निकलने के बजाय उन्होंने और कड़ी मेहनत करने का फैसला किया।
2011 में निकहत ने तुर्की के अंताल्या में आयोजित एआईबीए महिला यूथ एवं जूनियर विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी दस्तक दी। इसके बाद 2014 में सर्बिया के नोवी साद में आयोजित नेशंस कप में भी उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल किया। लगातार बेहतर प्रदर्शन के साथ वह भारतीय महिला बॉक्सिंग की प्रमुख युवा प्रतिभाओं में शामिल होती गईं।
करियर में एक बड़ा झटका तब आया जब कंधे की चोट ने उन्हें लंबे समय तक रिंग से दूर कर दिया। चोट के कारण उन्हें सर्जरी और रिहैबिलिटेशन से गुजरना पड़ा। ऐसे समय में किसी भी खिलाड़ी के लिए वापसी करना आसान नहीं होता, लेकिन निकहत ने हार नहीं मानी। उन्होंने फिटनेस पर काम किया और दोबारा रिंग में वापसी की। 2019 में एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने दिखाया कि चोट उनके करियर को रोक नहीं सकती।
निकहत के करियर का सबसे चर्चित दौर टोक्यो ओलंपिक की चयन प्रक्रिया के दौरान आया। वह छह बार की विश्व चैंपियन एमसी मैरी कॉम के खिलाफ ट्रायल चाहती थीं ताकि ओलंपिक टीम के चयन में उन्हें भी अपनी क्षमता साबित करने का मौका मिले। काफी चर्चा और विवाद के बाद ट्रायल हुआ, जिसमें मैरी कॉम ने जीत दर्ज की। निकहत ओलंपिक टीम में जगह नहीं बना सकीं, लेकिन उन्होंने इस हार को अपने सपनों का अंत नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी ऊर्जा अगले लक्ष्य पर लगाई।
फिर आया साल 2022, जिसने निकहत जरीन को भारतीय बॉक्सिंग के इतिहास में एक खास मुकाम दे दिया। इस्तांबुल में आयोजित महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में उन्होंने 52 किलोग्राम वर्ग में शानदार प्रदर्शन किया। फाइनल में उन्होंने थाईलैंड की जुतामास जितपोंग को 5-0 के सर्वसम्मत फैसले से हराकर स्वर्ण पदक जीता और विश्व चैंपियन बन गईं।
विश्व चैंपियन बनने के बाद निकहत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसी साल बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने 50 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीता।
2022 एशियाई खेलों में भी उन्होंने कांस्य पदक हासिल किया। लगातार बड़े टूर्नामेंटों में पदक जीतने से उनकी पहचान भारत की शीर्ष महिला मुक्केबाजों में और मजबूत हुई।
2023 में निकहत ने नई दिल्ली में आयोजित विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में 50 किलोग्राम वर्ग का स्वर्ण पदक जीतकर अपने विश्व खिताब का सफलतापूर्वक बचाव किया। फाइनल में उन्होंने वियतनाम की गुयेन थी टैम को हराया। लगातार दूसरी बार विश्व चैंपियन बनना उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा।
इन शानदार उपलब्धियों के लिए निकहत जरीन को 2022 का अर्जुन पुरस्कार दिया गया। राष्ट्रीय खेल पुरस्कार समारोह में उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया। अर्जुन अवॉर्ड उनके लिए सिर्फ एक ट्रॉफी या सम्मान नहीं था, बल्कि उस संघर्ष की पहचान था, जो उन्होंने कम उम्र में शुरू किया था—एक ऐसा संघर्ष जिसमें खेल की कठिन ट्रेनिंग के साथ-साथ सामाजिक सोच से भी मुकाबला करना पड़ा।
निकहत की प्रेरक कहानी का सबसे खास पहलू यह है कि उन्होंने अपने सामने खड़ी हर दीवार को चुनौती में बदला। जिस उम्र में कई लड़कियां खेल को सिर्फ शौक के तौर पर देखती हैं, उस उम्र में निकहत ने बॉक्सिंग को अपना करियर चुना। उन्होंने चोटें झेलीं, हार का सामना किया, चयन विवाद के बीच अपनी आवाज उठाई और फिर विश्व चैंपियन बनकर अपनी क्षमता साबित की। इस पूरी यात्रा में उनके पिता का विश्वास लगातार उनके साथ रहा।
निकहत की कहानी उस सामाजिक सोच को भी चुनौती देती है, जिसमें लड़कियों के लिए कुछ खेलों को 'उपयुक्त' और कुछ को 'अनुपयुक्त' माना जाता है।
बॉक्सिंग रिंग में शॉर्ट्स पहनकर उतरने वाली निकहत ने यह संदेश दिया कि खेल में खिलाड़ी की पहचान उसके प्रदर्शन से होती है, कपड़ों से नहीं। उनके पिता ने भी इस सोच को तोड़ने में बेटी का साथ दिया। परिवार के इस भरोसे ने निकहत को वह आत्मविश्वास दिया, जिसकी बदौलत वह देश की बेटियों के लिए प्रेरणा बन गईं।
पेरिस ओलंपिक 2024 निकहत के लिए उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। वह ओलंपिक पदक नहीं जीत सकीं, लेकिन ओलंपिक का अनुभव उनके करियर का महत्वपूर्ण हिस्सा बना। हार के बाद भी उनका लक्ष्य बड़ा रहा और उन्होंने खुद को फिर से मजबूत करने पर ध्यान दिया।
2026 में भी निकहत का ध्यान बॉक्सिंग में आगे बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए बड़ी उपलब्धियां हासिल करने पर है। वह अपने वजन वर्ग और आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं को ध्यान में रखते हुए तैयारी कर रही हैं। दो बार की विश्व चैंपियन बनने के बाद अब उनकी नजर अपने अगले बड़े लक्ष्य पर है।
निजामाबाद की गलियों से बॉक्सिंग रिंग तक पहुंची निकहत जरीन की कहानी सिर्फ पदकों और खिताबों की कहानी नहीं है। यह उस लड़की की कहानी है जिसने समाज की बनाई सीमाओं को स्वीकार करने से इनकार किया। जिसने शॉर्ट्स पहनकर रिंग में उतरने पर उठे सवालों का जवाब अपने प्रदर्शन से दिया। जिसने चोट से वापसी की, हार से सीखा और आखिरकार दुनिया के सामने भारत का तिरंगा ऊंचा किया।
निकहत ने साबित किया कि जब परिवार का भरोसा, अपने सपने पर विश्वास और मेहनत एक साथ मिल जाएं, तो रूढ़ियां कितनी भी मजबूत क्यों न हों, उन्हें तोड़ा जा सकता है।
आज निकहत जरीन की पहचान सिर्फ एक बॉक्सर के रूप में नहीं, बल्कि हौसले, आत्मविश्वास और स्टीरियोटाइप तोड़ने वाली नई भारतीय महिला की पहचान के तौर पर भी होती है।