राजीव सिंह/ नई दिल्ली
आज जब देश और दुनिया में धर्म, संप्रदाय और राजनीतिक तनाव के कारण सामाजिक दूरी और अविश्वास बढ़ता जा रहा है, ऐसे समय में बिहार का सीवान जिला आपसी भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक अद्भुत मिसाल पेश करता है। जिले के सिसवन प्रखंड के भीखपुर गांव से निकलने वाला ताजिया न केवल हिन्दू–मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है, बल्कि इसे दुनिया का सबसे ऊंचा ताजिया होने का गौरव भी प्राप्त है।
सिवान के दक्षिणी हिस्से में दाहा नदी के किनारे स्थित चैनपुर बाजार के समीप बसे भीखपुर गांव में लगभग 350 से 400 घर हैं। इस गांव की खास बात यह है कि यहां हिंदू और मुस्लिम आबादी लगभग बराबर है और दोनों समुदाय मिलकर सदियों पुरानी परंपराओं को आज भी जीवित रखे हुए हैं। ग्रामीणों के अनुसार, यहां ताजिया निकालने की परंपरा करीब 196 वर्षों पुरानी है और यह गर्व की बात है कि इतने लंबे इतिहास में कभी भी जुलूस के दौरान कोई अप्रिय घटना नहीं हुई।
हर वर्ष की तरह इस बार भी भीखपुर में ताजिए के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। गांव में दो प्रमुख इमामबाड़ों अंजुमन अब्बासिया और अंजुमन रजीविया के तत्वावधान में भव्य ताजिए बनाए जा रहे हैं। अंजुमन रजीविया, जिसे “छोटा इमामबाड़ा” कहा जाता है, में लगभग 80 फीट ऊंचा ताजिया तैयार किया जा रहा है, जबकि बड़ा इमामबाड़ा यानी अंजुमन अब्बासिया में करीब 84 फीट ऊंचा ताजिया बनाया जाता है, जो लगभग 16 मंजिल ऊंची इमारत के बराबर माना जाता है।
ताजिया निर्माण की एक विशेषता यह भी है कि इसमें स्थानीय कारीगरों के साथ-साथ हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग मिलकर काम करते हैं। यहां तक कि आसपास के गांवों से भी युवा ताजिया निर्माण में हिस्सा लेने के लिए भीखपुर पहुंचते हैं।

डॉ. एस.एम. जाहिद ताजिया की धार्मिक और सामाजिक भावना को स्पष्ट करते हुए कहते हैं, “इमाम हुसैन ने बुराई के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने न्याय, इंसानियत और अच्छाई को बचाने के लिए संघर्ष करते हुए अपने-आप को शहीद किया। आज भी उनके अनुयायी इस पैगाम को ताजिया के माध्यम से देते हैं कि हमेशा अच्छाई की जीत बुराई पर होती है। इंसान को ईमानदारी व सच्चाई के रास्ते पर चलना चाहिए।”
मुहर्रम के दौरान यहां दूर-दराज से मौलाना और धर्मगुरु मजलिस के लिए आते हैं, जिससे यह आयोजन और भी आध्यात्मिक महत्व प्राप्त कर लेता है।
भीखपुर में मातमी जुलूस की शुरुआत से पहले अलम निकाला जाता है, जिसे इमाम हुसैन का प्रतीक माना जाता है। स्थानीय निवासी सैयद मोहम्मद रिजवी बताते हैं, “मातमी जुलूस निकालने और ताजिया उठाने से पहले यहां के लोग अलम निकालते हैं। आगे-आगे अलम होता है और पीछे-पीछे छोटे-बड़े, बुजुर्ग और बच्चे जंजीरी मातम करते हुए चलते हैं।”
यह दृश्य पूरी तरह से धार्मिक भावनाओं, अनुशासन और सामूहिक एकता का प्रतीक बन जाता है।
भीखपुर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां केवल मुस्लिम ही नहीं, बल्कि कई हिंदू परिवार भी ताजिया निर्माण और जुलूस में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। चैनपुर बाजार के “चुन्नीलाल–मुन्नीलाल” के नाम से प्रसिद्ध ताजिया लगभग 70 वर्षों से लगातार बनाया जा रहा है।
इस परंपरा की शुरुआत एक प्रेरक कहानी से जुड़ी है। डॉ. एस.एम. जाहिद के अनुसार, चुन्नीलाल और मुन्नीलाल के घर संतान नहीं हो रही थी। वे दोनों भाई पहले चाय-पकौड़ी की दुकान चलाते थे और काफी निराश थे। इसी दौरान उन्होंने बड़े इमामबाड़े के मौलाना महरूम सैयद राहत हुसैन से अपनी समस्या साझा की। उन्होंने उन्हें बड़े इमामबाड़े में जाकर दुआ करने की सलाह दी। उनके अनुसार, मन्नत पूरी हुई और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इसके बाद से ही उनके परिवार ने अपने दरवाजे पर ताजिया रखना शुरू कर दिया।
आज भी ताजिया उठने से पहले ग्रामीण चुन्नीलाल के घर जाकर मजलिस और मातम करते हैं। उनके परिजन सुरेंद्र प्रसाद और वीरेंद्र प्रसाद बताते हैं कि यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
गांव की एक और रोचक घटना करीब 25 साल पुरानी है, जब विद्युतीकरण के दौरान ताजिया जुलूस के मार्ग में बिजली के खंभों और तारों को लेकर समस्या उत्पन्न हुई थी। ग्रामीणों के विरोध के बाद विद्युत विभाग ने आश्वासन दिया कि मुहर्रम के दिन बिजली आपूर्ति बंद रखी जाएगी और तारों को अस्थायी रूप से हटा दिया जाएगा। तभी जाकर गांव में विद्युतीकरण संभव हो सका।

दसवीं मुहर्रम के दिन दोपहर में ताजिया जुलूस गांव से निकलता है और सूर्यास्त से पहले करबला पहुंचता है। इस दौरान श्रद्धालु ताजिए पर बताशा, लड्डू, मलीदा, शर्बत, खिचड़ी-रोटी, तिलक, नारियल आदि चढ़ाते हैं। देश-विदेश में रहने वाले ग्रामीण भी इस अवसर पर गांव लौट आते हैं और जुलूस में भाग लेते हैं।
भीखपुर की एक और महत्वपूर्ण परंपरा यह है कि ताजिया निर्माण में लोहे की कीलों का प्रयोग नहीं किया जाता। इसे पूरी तरह बांस, रस्सी और कागज से बनाया जाता है, जो इसकी पारंपरिक और सांस्कृतिक शुद्धता को दर्शाता है।
डॉ. जाहिद के अनुसार, बड़े इमामबाड़े में मांगी गई मन्नतें पूरी होती हैं। उन्होंने कई उदाहरण भी दिए, जिनमें सारण जिले के मोहम्मदपुर के एक वकील और नवलपुर क्षेत्र के लोगों की मन्नतें पूरी होने की बातें शामिल हैं।
सीवान के ठेपहा गांव में भी मुहर्रम जुलूस निकाला जाता है। स्थानीय निवासी ललन चौधरी कहते हैं, “हम मुहर्रम मानते भी हैं और मुसलमानों के साथ ताजिया जुलूस भी निकालते हैं।” उनके अनुसार यहां पांच ताजिया बनाए जाते हैं, जिनमें चार मुस्लिम समुदाय द्वारा और एक हिंदू परिवार द्वारा बनाया जाता है।
गांव की मस्जिद के मौलवी शम्सुल हक का कहना है कि मुहर्रम में शामिल हिंदू लोग शांति, सद्भाव और भाईचारे का संदेश देते हैं।
इसी तरह मैरवा प्रखंड के इंग्लिश गांव में डोमा पासी बताते हैं कि उनके परिवार में करीब 40 वर्षों से मन्नत पूरी होने पर इमाम हुसैन की याद में ताजिया रखा जाता है और इससे परिवार में खुशहाली बनी रहती है।

यह उल्लेखनीय है कि मुहर्रम कोई उत्सव नहीं, बल्कि शोक का पर्व है। यह पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है। ताजिया इसी शहादत और करबला की घटना का प्रतीकात्मक स्वरूप है। भीखपुर गांव की यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता और आपसी भाईचारे में निहित है। आज जब दुनिया में विभाजन की दीवारें बढ़ रही हैं, ऐसे में भीखपुर का ताजिया जुलूस एक ऐसा संदेश देता है जो सीमाओं से परे जाकर मानवता को जोड़ता है। भीखपुर का यह ताजिया केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी साझा संस्कृति, विश्वास और एकता का जीवंत उदाहरण है।