-डॉ. फ़िरदौस ख़ान
हिन्दुस्तान में शिया समुदाय मुस्लिम आबादी का एक अहम हिस्सा है। ईरान के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया आबादी हिन्दुस्तान में बसती है। सुन्नी मुसलमानों की तरह इनका भी इतिहास बहुत समृद्ध और गौरवशाली है। हिन्दुस्तानी कला, संस्कृति, साहित्य, उद्योग, राजनीति व ऐसे ही अन्य क्षेत्रों में इस समुदाय का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
आबादी
हिन्दुस्तान में शियाओं की कुल आबादी कितनी है, इस बारे में दावे से कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। इसका सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा सकता है, क्योंकि देश की जनगणना में मुस्लिम सम्प्रदायों यानी शिया और सुन्नी के आधार पर अलग से आधिकारिक आंकड़े एकत्र नहीं किए जाते।
इसलिए इनकी आबादी और इनकी सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक स्थिति का आकलन विभिन्न स्वतंत्र शोधों के आधार पर किया जाता है। सच्चर समिति की रिपोर्ट भी शिया समुदाय की हालत पर रौशनी डालती है।
अंतर्राष्ट्रीय संस्था प्यू रिसर्च सेंटर और विभिन्न हिन्दुस्तानी शिया संगठनों के मुताबिक़ हिन्दुस्तान में कुल मुस्लिम आबादी में शिया समुदाय की हिस्सेदारी तक़रीबन 10से 15फ़ीसद के दरम्यान है यानी ये आबादी तीन से चार करोड़ के बीच है।
देश के उत्तर में जम्मू कश्मीर के श्रीनगर, कारगिल और बडगाम आदि ज़िलों में शियाओं की अच्छी ख़ासी आबादी है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, अमरोहा, जौनपुर, संभल और शिकारपुर आदि में भी ख़ासी तादाद में शिया रहते हैं। दक्षिण भारत के हैदराबाद में बड़ी शिया आबादी है। पश्चिमी भारत में महाराष्ट्र के मुम्बई व पुणे और गुजरात के अहमदाबाद व सूरत में शियाओं की बड़ी आबादी रहती है।
जिस तरह मुसलमानों में शिया एक सम्प्रदाय है, उसी तरह हिन्दुस्तान में शियाओं में भी उप सम्प्रदाय हैं। एक है इसना अशरी सम्प्रदाय। शियाओं में सबसे ज़्यादा यानी तक़रीबन 80फ़ीसद आबादी इसी सम्प्रदाय की है।
इस सम्प्रदाय के लोग ज़्यादातर उत्तर भारत में रहते हैं। इसके बाद इस्माइली सम्प्रदाय आता है। इस सम्प्रदाय में ख़ासकर दाऊदी बोहरा और खोजा सम्प्रदाय आते हैं। इस सम्प्रदाय के लोग ज़्यादातर गुजरात और महाराष्ट्र में रहते हैं और कारोबार से जुड़े हैं।

आर्थिक स्थिति
हिन्दुस्तान के सभी शियाओं की आर्थिक स्थिति एक जैसी नहीं है। ये उनके भौगोलिक और उप-सम्प्रदायों के आधार पर एक-दूसरे से बहुत अलग है। जो सम्प्रदाय कारोबार से जुड़े हैं, उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी है।
गुजरात और महाराष्ट्र के दाऊदी बोहरा व खोजा सम्प्रदायों के शिया देश के सबसे समृद्ध कारोबारियों में शुमार किए जाते हैं। इनका मुख्य कारोबार विनिर्माण, कपड़ा, हार्डवेयर, रियल एस्टेट और वैश्विक व्यापार आदि है। इनकी प्रति व्यक्ति आय देश के राष्ट्रीय औसत से भी बेहतर मानी जाती है।
इसके बाद खेतीबाड़ी और नौकरीपेशा लोग आते हैं। कश्मीर के श्रीनगर, कारगिल और बडगाम ज़िले के शिया मुख्य रूप से बाग़वानी, खेतीबाड़ी, हस्तशिल्प आदि से जुड़े हैं। इनके फल-मेवों और केसर की दुनियाभर में मांग है। राजकीय सेवा में भी इनकी हिस्सेदारी है। यह मध्यम आय वर्ग में शामिल हैं।
तीसरे पायदान पर कारीगर और मज़दूर आते हैं। उत्तर भारत ख़ासकर उत्तर प्रदेश और इसके आसपास के इलाक़ों में एक बड़ी शिया आबादी कुटीर उद्योग, ज़री-ज़रदोज़ी, चिकनकारी, हस्तशिल्प, सिलाई और खिलौने बनाने आदि छोटे कारोबार से जुड़ी है।
मशीनीकरण के दौर में पारम्परिक उद्योगों के बंद होने के कारण इनकी आर्थिक स्थिति कमज़ोर हुई है। इसलिए रोज़गार की तलाश में इनके परिवारों के बहुत से युवा खाड़ी देशों में चले गए। विदेशी आमदनी ने इनकी आर्थिक स्थिति को पहले से बेहतर कर दिया है।
क़ाबिले ग़ौर बात ये भी है कि मूल शियाओं के मुक़ाबले परिवर्तित शियाओं की आर्थिक स्थिति बहुत कमज़ोर है। इनमें पिछ्ड़ी जातियों के वे लोग शामिल हैं, जो पहले सुन्नी थे और बाद में वे शिया बन गए।
शैक्षिक स्थिति
सुन्नी समुदाय के मुक़ाबले में शियाओं की शैक्षिक स्थिति बहुत बेहतर है। सुन्नी मुसलमानों के मुक़ाबले शियाओं का आधुनिक शिक्षा के प्रति सकारात्मक नज़रीया रहा है। लखनऊ, हैदराबाद और मुम्बई जैसे शहरों में शिया समुदाय के कई स्कूल, डिग्री कॉलेज और तकनीकी संस्थान चल रहे हैं।
लखनऊ का शिया पीजी कॉलेज इसकी एक मिसाल है। महिला शिक्षा के मामले में भी शियाओं की स्थिति बेहतर है। ख़ासकर शहरी इलाक़ों में शिया महिलाओं में साक्षरता दर और उच्च शिक्षा हासिल करने के अनुपात में काफ़ी सुधार देखने को मिला है।
पारम्परिक धार्मिक शिक्षा के मामले में भी शिया किसी से कम नहीं हैं। लखनऊ का मदरसा-ए-नाज़मिया इसकी बेहतर मिसाल है। यहां से पढ़ने वाले छात्र उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालयों में दाख़िला लेते हैं। कितने ही छात्र धार्मिक शोध के लिए ईरान और इराक़ भी जाते हैं।
जैसा कि पहले भी ज़िक्र किया गया है कि आर्थिक स्तर की तरह इनके शैक्षिक स्तर में भी काफ़ी फ़र्क़ देखने को मिलता है। जहां पश्चिम भारत के बोहरा और खोजा शियाओं में साक्षरता और व्यावसायिक शिक्षा की दर बहुत ऊंची है, वहीं उत्तर प्रदेश के देहात और क़स्बों में आज भी आर्थिक तंगी की वजह से शिया बच्चों का बीच में पढ़ाई छोड़ना जारी है। इसकी एक वजह बंद होते सरकारी स्कूल और निजी स्कूलों की लगातार बढ़ती फ़ीस है। निजी स्कूलों की किताबें भी बहुत महंगी होती हैं, जिन्हें ख़रीद पाना ग़रीबों के बस की बात नहीं है।

सामाजिक स्थिति
हिन्दुस्तान में शियाओं की पहचान हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और कर्बला के दीगर शहीदों का मातम बनाने से जुड़ी है। एक यही समुदाय है, जिसकी वजह से आने वाली नस्लें कर्बला के वाक़िये को जान पाती हैं।
वरना लोग कर्बला को कब का भूल चुके होते। शियाओं का ग़ैर-मुस्लिमों ख़ासकर हिन्दुओं के साथ बहुत अच्छा रिश्ता रहा है। मुहर्रम के जुलूसों में ग़ैर-मुस्लिमों की हिस्सेदारी इसका प्रमाण है और हुसैनी ब्राह्मण इसकी ज़िन्दा मिसाल हैं।
Faith, sacrifice, and remembrance.
— Sumit Kumar (@skphotography68) June 22, 2026
On the fifth day of Muharram, Shia Muslim devotees gathered at Shah Najaf Imambara in Lucknow to perform the traditional fire-walking ritual as part of the mourning commemorations for Imam Hussain (AS), the grandson of Prophet Muhammad.… pic.twitter.com/ALkLvrKh2m
सांस्कृतिक स्थिति
भारत के कोने-कोने में बने इमामबाड़े शिया संस्कृति के प्रतीक हैं। लखनऊ के इमामबाड़े शिया वास्तुकला और शिया संस्कृति की वैश्विक पहचान हैं। मध्यकाल में दक्षिण भारत शियाओं का मुख्य केन्द्र था, जिसे दक्ख न के नाम से जाना जाता था।
लेकिन जब औरंगज़ेब ने गोलकुंडा पर जीत हासिल की, तो शियाओं ने उत्तर भारत का रुख़ किया और अवध को अपना मुख्य केन्द्र बना लिया। इस तरह आहिस्ता-आहिस्ता लखनऊ शियाओं का प्रमुख केन्द्र बन गया।

राजनीतिक स्थिति
शिया समुदाय की आबादी सुन्नी मुसलमानों से बहुत कम है, इसलिए ये मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के साथ रणनीतिक संतुलन और संबंध बनाकर चलते हैं। जम्मू कश्मीर और उत्तर प्रदेश में शिया नेताओं को देखकर इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। शिया समुदाय के अपने अलग पर्सनल लॉ बोर्ड भी हैं, जैसे ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड और शिया वक़्फ़ बोर्ड। ये इनके धार्मिक और सम्पत्ति से जुड़े मामलों का प्रबंधन करते हैं।
दरअसल, शिया धार्मिक रूप से बहुत संगठित हैं। ये अपने कारोबार और शिक्षा पर ज़्यादा ध्यान देते हैं। ये कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि शिया हिन्दुस्तान के बहुलतावादी सांस्कृतिक समाज का एक अटूट और गौरवशाली हिस्सा बन चुके हैं।