The return of Sanskrit to Pakistan: New avenues opening up for the first time since Partition
अर्सला खान/नई दिल्ली
भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में भले ही दशकों से तनाव बना हुआ हो, लेकिन संस्कृति और ज्ञान की दुनिया अक्सर राजनीतिक सीमाओं से आगे निकल जाती है। इसका ताजा उदाहरण पाकिस्तान में देखने को मिल रहा है, जहां बंटवारे के करीब 79 साल बाद संस्कृत भाषा एक बार फिर विश्वविद्यालयों में अपनी जगह बना रही है।
पाकिस्तान के प्रतिष्ठित लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज़ (LUMS) ने संस्कृत को अपने शैक्षणिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाकर एक नई शुरुआत की है। यह पहल न केवल भाषा के अध्ययन तक सीमित है, बल्कि दक्षिण एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत को समझने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
अब तक विश्वविद्यालय में संस्कृत के दो वैकल्पिक पाठ्यक्रम संचालित किए जा चुके हैं। दोनों पाठ्यक्रमों में लगभग 32 छात्र-छात्राओं ने दाखिला लिया और इनकी प्रतिक्रिया उत्साहजनक रही। यही वजह है कि आगामी शैक्षणिक सत्र से संस्कृत को नियमित पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है। विश्वविद्यालय के बाहर आयोजित दो सार्वजनिक कार्यशालाओं में भी बड़ी संख्या में छात्रों और भाषा प्रेमियों ने भाग लिया, जिससे स्पष्ट है कि पाकिस्तान में संस्कृत को लेकर जिज्ञासा और रुचि लगातार बढ़ रही है।
इस पहल के पीछे सबसे महत्वपूर्ण नाम डॉ. शाहिद राशिद का है। उन्होंने स्वयं संस्कृत का अध्ययन किया है और अब इस भाषा को पाकिस्तान में पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। उनका मानना है कि संस्कृत किसी एक धर्म या देश की भाषा नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की साझा बौद्धिक और सांस्कृतिक धरोहर है। उनके अनुसार, यदि क्षेत्र के इतिहास, दर्शन, साहित्य, धर्म और सभ्यता को गहराई से समझना है तो संस्कृत का अध्ययन आवश्यक है।
डॉ. राशिद का कहना है कि संस्कृत सीखने का उद्देश्य अतीत को केवल याद करना नहीं, बल्कि उसे बेहतर ढंग से समझना है। वे मानते हैं कि भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसी सभ्यताओं का विकास एक साझा सांस्कृतिक आधार पर हुआ है और संस्कृत उस विरासत की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसलिए इस भाषा का अध्ययन लोगों के बीच संवाद और समझ को मजबूत कर सकता है।
विभाजन से पहले आज के पाकिस्तान में संस्कृत अध्ययन की समृद्ध परंपरा थी। लाहौर, पेशावर और रावलपिंडी जैसे शहरों में संस्कृत पढ़ाई जाती थी और कई विद्वान इस भाषा के विशेषज्ञ थे। लेकिन 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद परिस्थितियां बदल गईं। अधिकांश संस्कृत विद्वान भारत चले गए और पाकिस्तान में धीरे-धीरे इस भाषा का अध्ययन लगभग समाप्त हो गया। आने वाले दशकों में संस्कृत को केवल धार्मिक या ऐतिहासिक संदर्भों तक सीमित कर दिया गया।
हालांकि हाल के वर्षों में पाकिस्तान के कुछ शिक्षाविदों ने महसूस किया कि संस्कृत का अध्ययन केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि इतिहास, भाषाविज्ञान, पुरातत्व और तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसी सोच ने LUMS जैसी संस्था को इस दिशा में पहल करने के लिए प्रेरित किया।
संस्कृत दुनिया की सबसे प्राचीन और व्यवस्थित भाषाओं में मानी जाती है। वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, कालिदास के नाटक और पाणिनि का व्याकरण जैसे अनगिनत ग्रंथ इसी भाषा में रचे गए। आधुनिक भाषाविज्ञान में भी संस्कृत का विशेष स्थान है क्योंकि इसे इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की सबसे महत्वपूर्ण भाषाओं में गिना जाता है। यही कारण है कि दुनिया के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में आज भी संस्कृत पढ़ाई जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान में संस्कृत की वापसी केवल एक शैक्षणिक पहल नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की साझा विरासत को नए नजरिए से देखने का अवसर भी है। इससे दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और बौद्धिक संवाद के नए रास्ते खुल सकते हैं। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस पहल का व्यापक राजनीतिक प्रभाव पड़ेगा, लेकिन शिक्षा और संस्कृति के स्तर पर यह एक सकारात्मक संदेश जरूर देती है।
LUMS का यह कदम इस बात का संकेत है कि ज्ञान और शिक्षा की दुनिया में भाषाओं को राजनीतिक सीमाओं से परे देखा जा रहा है। यदि यह पहल सफल रहती है तो भविष्य में पाकिस्तान के अन्य विश्वविद्यालय भी संस्कृत अध्ययन को अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर सकते हैं।
बंटवारे के बाद लगभग आठ दशक तक पाकिस्तान के शैक्षणिक परिदृश्य से लगभग गायब रही संस्कृत अब फिर से अपनी पहचान बना रही है। यह पहल केवल एक भाषा को पुनर्जीवित करने का प्रयास नहीं, बल्कि साझा इतिहास, सांस्कृतिक संवाद और अकादमिक सहयोग की नई संभावनाओं का द्वार भी खोल रही है। ऐसे समय में, जब दक्षिण एशिया अनेक राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, संस्कृत जैसी प्राचीन भाषा दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक समझ और बौद्धिक संवाद का एक नया माध्यम बन सकती है।