सहारनपुर का हस्तशिल्प उद्योग: लकड़ी पर नक्काशी की विरासत और वैश्विक पहचान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 04-07-2026
Saharanpur's Handicraft Industry: A Legacy of Wood Carving and Global Recognition
Saharanpur's Handicraft Industry: A Legacy of Wood Carving and Global Recognition

 

एच काजमी

उत्तर प्रदेश का एक ऐतिहासिक शहर सहारनपुर आज पूरी दुनिया में अपनी अनोखी पहचान रखता है। नई दिल्ली से करीब 170किलोमीटर दूर बसा यह शहर हाथ से नक्काशी किए गए लकड़ी के फर्नीचर और हस्तशिल्प का सबसे बड़ा केंद्र है। यहां की हर गली और कार्यशाला से लकड़ी तराशने की आवाजें गूंजती हैं। मध्यकाल में सुल्तान इल्तुतमिश के शासनकाल के दौरान यह क्षेत्र दिल्ली सल्तनत का एक मुख्य हिस्सा बना था। उसी समय से यहां लकड़ी पर बारीक नक्काशी की समृद्ध परंपरा की शुरुआत हुई।

18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में इस कला को एक नया आयाम मिला। यह शिल्प पूरी तरह मुगल सभ्यता और उसकी वास्तुकला से प्रभावित रहा है।मुगल काल के दौरान देश-विदेश से कई कुशल शिल्पकार और कश्मीरी उत्कीर्णक राजाओं के निमंत्रण पर यहां आकर बस गए थे।

वे अपने साथ नक्काशी और अलंकरण की बेहतरीन तकनीक लेकर आए। यही वजह है कि सहारनपुर के फर्नीचर में आज भी मुगलई वास्तुकला, जटिल फूल-पत्तियां और इस्लामी ज्यामितीय पैटर्न साफ दिखाई देते हैं। हैदराबाद के प्रसिद्ध चौमहला पैलेस में आज भी कश्मीरी शैली में बने सहारनपुरी लकड़ी के फर्नीचर के नायाब नमूने पर्यटकों के लिए प्रदर्शित किए गए हैं।

आजादी के बाद का संघर्ष और खट्टाखेरी का उदय

भारत की आजादी और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खात्मे के बाद इस पारंपरिक उद्योग को कई आर्थिक बदलावों और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी के हुनर और हाथ से बने उत्पादों की मांग के कारण यह शिल्प कभी खत्म नहीं हुआ।

साल 1960में स्थानीय कारीगरों के एक समूह ने अपनी पैतृक कला को बचाने के लिए एक विशेष कार्यशाला की नींव रखी। इसके बाद सहारनपुरी फर्नीचर में इतालवी, फ्रांसीसी, विक्टोरियन, मोरक्कन और ब्रिटिश शाही डिजाइनों का समावेश होने लगा। कुछ डिजाइनों में रोकोको और बारोक कला की झलक भी देखने को मिलती है जो विलासिता का अहसास कराती है।

आज के समय में सहारनपुर का खट्टाखेरी क्षेत्र इस पूरे फर्नीचर उद्योग और व्यापार का मुख्य दिल माना जाता है। कच्चा माल आसानी से उपलब्ध होने के कारण यह इलाका हाथ से तराशे गए आलीशान दरवाजों, मजबूत अलमारियों और डाइनिंग टेबल के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

स्थानीय आंकड़ों की मानें तो इस पूरे उद्योग से करीब 7लाख लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। शहर में 1200से अधिक पंजीकृत छोटे और मध्यम आकार के कारखाने रात-दिन काम कर रहे हैं। हाल के वर्षों में सरकार की 'मेक इन इंडिया' नीति, 'स्टार्टअप इंडिया' और 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' यानी एक जिला एक उत्पाद योजना ने इस उद्योग को एक नई ऊर्जा दी है। इंटरनेट और ई-कॉमर्स की क्रांति ने इन उत्पादों को सीधे वैश्विक बाजार से जोड़ दिया है।

कीमती लकड़ियां और निर्माण की जटिल प्रक्रिया

सहारनपुर के स्थानीय कारखाना मालिक हरित बताते हैं कि इस शिल्प की सबसे बड़ी ताकत इसकी लकड़ी की गुणवत्ता है। कारीगर मुख्य रूप से सागौन, शीशम और आम जैसी कीमती और टिकाऊ लकड़ियों का इस्तेमाल करते हैं।

शीशम अपनी मजबूती और गहरे भूरे रंग के कारण छोटी और नाजुक सजावटी वस्तुएं बनाने के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है। दूसरी तरफ सागौन का उपयोग बड़े और आलीशान सोफा सेट या बेड बनाने में होता है क्योंकि यह हर मौसम को झेल सकती है। आम की लकड़ी का इस्तेमाल प्राचीन कलाकृतियों और खिलौनों के निर्माण में बड़े पैमाने पर किया जाता है।

एक कच्ची लकड़ी को आलीशान फर्नीचर में बदलने का सफर बेहद लंबा और धैर्य से भरा होता है। पेड़ों के तनों को काटने के बाद लकड़ी को कम से कम दो साल तक प्राकृतिक रूप से सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है ताकि उसकी नमी पूरी तरह खत्म हो जाए।

अगर ऐसा न किया जाए तो बाद में फर्नीचर में दरारें पड़ने का डर रहता है। इसके बाद लकड़ी को कीड़ों और दीमक से बचाने के लिए विशेष रसायनों से उपचारित किया जाता है। इसके बाद ही कटाई, डिजाइनिंग, नक्काशी और पॉलिशिंग का काम शुरू होता है।

नक्काशी और तर्कशी कला का जादू

पूरे निर्माण में नक्काशी का चरण सबसे महत्वपूर्ण होता है। कारीगर पहले कागज पर मनचाहा स्केच बनाते हैं और फिर उसे लकड़ी पर उकेरते हैं। हथौड़ी और छेनी जैसे पारंपरिक औजारों की मदद से पूरी नक्काशी हाथ से की जाती है। इस काम में इतनी बारीकी होती है जिसे दुनिया की कोई भी आधुनिक मशीन नहीं दोहरा सकती।

इसके बाद आती है जड़ाई की कला जिसे स्थानीय भाषा में 'तर्कशी' कहा जाता है। तर्कशी में तांबे या पीतल के पतले तारों को लकड़ी के भीतर बने बारीक खांचों में बहुत सावधानी से जड़ा जाता है। जब प्राकृतिक लकड़ी की गर्माहट और तांबे की चमक आपस में मिलती है तो वह उत्पाद कला का एक अद्भुत नमूना बन जाता है। अंतिम चरण में सैंडिंग और पॉलिशिंग की जाती है जिससे लकड़ी को एक शीशे जैसी चिकनी चमक मिलती है। यही कारण है कि सहारनपुर का फर्नीचर थोड़ा महंगा होता है क्योंकि यह पीढ़ियों तक खराब नहीं होता और एक मूल्यवान विरासत की तरह आगे बढ़ता है।

आधुनिक बदलाव और वैश्विक निर्यात

शाही महलों से लेकर आम घरों तक अपनी जगह बना चुका सहारनपुर आज अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और कई अरब देशों को बड़े पैमाने पर अपने उत्पादों का निर्यात करता है। बाजारों में आज पारंपरिक सोफा सेट, कुर्सियों और बिस्तरों के अलावा आभूषण के डिब्बे, दीवार की सजावट, मशराबिया स्क्रीन (जाली) और आधुनिक ट्रे की भारी मांग है।

समय के साथ बदलते हुए यहां के निर्माताओं ने अब लेजर कटिंग और डिजिटल डिजाइनिंग जैसी नई तकनीकों को भी अपना लिया है ताकि युवा पीढ़ी की पसंद के हिसाब से हल्के और समकालीन मॉडल बनाए जा सकें। कई कारखाने अब पर्यावरण के अनुकूल पॉलिश और टिकाऊ लकड़ियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। सहारनपुर की यह कला केवल एक आर्थिक जरिया नहीं है बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान का एक अटूट हिस्सा है जो सदियों पुराने हुनर को आज भी जिंदा रखे हुए है।