अर्सला खान/नई दिल्ली
भारतीय सिनेमा में मां सिर्फ एक किरदार नहीं रही, बल्कि भावनाओं का सबसे मजबूत चेहरा बनकर उभरी है। हर दौर की फिल्मों में मां का किरदार दर्शकों के दिल के सबसे करीब रहा। कभी त्याग की प्रतिमूर्ति, कभी परिवार को जोड़ने वाली शक्ति और कभी अपने बच्चों के लिए हर मुश्किल से लड़ जाने वाली महिला के रूप में बॉलीवुड ने मां को बेहद खूबसूरती से पर्दे पर उतारा है। मदर्स डे के मौके पर उन अभिनेत्रियों और फिल्मों को याद करना जरूरी हो जाता है, जिन्होंने “मां” शब्द को अभिनय के जरिए अमर बना दिया।
निरूपा रॉय
पुराने दौर की बात करें तो निरूपा रॉय का नाम सबसे पहले याद आता है। दीवार (1975) में उनका किरदार सिर्फ एक मां का नहीं था, बल्कि संघर्ष और त्याग की मिसाल बन गया। अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के बीच खड़ी वह मां आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार छवियों में शामिल है। इसके बाद अमर अकबर एंथनी (1977) में भी उन्होंने बिछड़े बेटों की मां बनकर दर्शकों को भावुक कर दिया था। उनकी आंखों में दर्द और चेहरे पर ममता का जो भाव दिखता था, वही उन्हें “बॉलीवुड की मां” बना गया।
रीमा लागू
90 के दशक में रीमा लागू ने मां के किरदार को एक नया रूप दिया। वे सख्त नहीं, बल्कि दोस्त जैसी मां के रूप में नजर आईं। हम आपके हैं कौन..! (1994) और कुछ कुछ होता है (1998) में उनकी मुस्कान, अपनापन और परिवार को साथ रखने की शैली ने दर्शकों का दिल जीत लिया। उनकी मौजूदगी फिल्मों में घर जैसा एहसास देती थी।
फरीदा जलाल
इसी दौर में फरीदा जलाल भी मां के बेहद भावुक और स्नेह से भरे किरदारों के लिए पहचानी गईं। दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995) में उन्होंने एक ऐसी मां का किरदार निभाया, जो परिवार और बेटी के बीच उलझी हुई दिखाई देती है। वहीं कुछ कुछ होता है (1998) में उनका छोटा लेकिन यादगार रोल आज भी लोगों के जहन में जिंदा है।
जया बच्चन
समय के साथ मां के किरदार भी बदलते गए। कभी खुशी कभी ग़म (2001) में जया बच्चन ने भावनात्मक गहराई से भरी मां का रोल निभाया। बेटे के दूर जाने का दर्द और उसके लौटने की उम्मीद उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती थी। वहीं कल हो ना हो (2003) में उन्होंने आधुनिक परिवार की मजबूत मां की भूमिका निभाई।
किरण खेर
किरण खेर ने मां के किरदार में पंजाबी परिवारों की गर्मजोशी और ऊर्जा को पर्दे पर उतारा। देवदास (2002) में उनकी शाही मौजूदगी और दोसताना (2008) में उनका हल्का-फुल्का अंदाज दर्शकों को खूब पसंद आया।
राखी गुलजार
अगर मां के किरदार में शक्ति और दर्द दोनों की बात हो, तो राखी गुलजार को भुलाया नहीं जा सकता। करण अर्जुन (1995) में उनका संवाद “मेरे करण-अर्जुन आएंगे” हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर हो चुका है। वहीं राम लखन (1989) में भी उन्होंने संघर्षशील मां की भूमिका निभाई।
शफाली शाह
नई पीढ़ी में शफाली शाह जैसी अभिनेत्रियों ने मां के किरदार को और वास्तविक बनाया। दिल धड़कने दो (2015) और डार्लिंग्स (2022) जैसी फिल्मों में मां सिर्फ त्याग करने वाली महिला नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं और पहचान के साथ एक मजबूत इंसान के रूप में दिखाई दी।
बॉलीवुड की इन मांओं ने सिर्फ फिल्मों की कहानी को आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि दर्शकों को अपने परिवार, रिश्तों और मां के महत्व का एहसास भी कराया। मदर्स डे पर ये किरदार हमें याद दिलाते हैं कि मां सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि हर संघर्ष में साथ खड़ी रहने वाली सबसे बड़ी ताकत होती है।